Friday, May 31, 2013

फिल्म समीक्षा- एक सफ़र खुद को जानने का


     ये जवानी है दीवानी 

कबीर थापर (रणबीर कपूर) का एक ही ख्वाब है कि वो वैसे ही दुनिया के हर शहर की सैर करे, जैसे एक नवयुवा प्रवासी पक्षी अपने पंख फैलाए, मैदानों, समंदर और नदियों के ऊपर से उडऩा चाहता हो। हवा के झोंके की रफ्तार से वो सरहदों को नाप लेना चाहता हो। शादी और बच्चों के बारे  में उसके ख्याल वैसे ही हैं, जैसे जवानी के उफान में एक आम युवा के होते हैं। उन्हें बंधनों में बंधना कतई अच्छा नहीं लगता।  कबीर दुनिया के सफर पर है और पीछे छूट गए हैं उसके अपने, जिन्हें वो कतई याद नहीं करता। ऐसा लग रहा होगा कि कबीर का अक्स हम यश चोपड़ा और करण जौहरनुमा फिल्मों में खूब देख चुके हैं। पहले हीरो का कहना कि वो शादी करना ही नहीं चाहता, आजाद रहना चाहता है। फिर बाद में प्रेमिका की गैर-मौजूदगी में अपने अंदर पनप रहे प्यार का अहसास होना, ये सब दर्शक कई फिल्मों में देख चुके हैं। तो फिर 'ये जवानी है दीवानी' में नया क्या है। खास ये है कि अयान मुखर्जी ने एक साधारण कहानी को अपने जादूई स्पर्श से एक जीवंत छूने वाली कहानी बना दिया है और इसलिए इस फिल्म को निर्देशक की फिल्म कहना चाहिए। कबीर अपने दोस्तों के साथ मनाली ट्रिप पर जाता है, वहां उसकी मुलाकात नैना (दीपिका पादुकोण) से होती है। नैना एक पढ़ाकू लडक़ी है और मौज मस्ती से उसका कोई वास्ता नहीं। दो विपरित स्वभाव के लोग मनाली की वादियों में घूम रहे हैं लेकिन उनके दिल साजिश कर रहे हैं और दोनों को ही खबर नहीं होती। नैना अपने घर लौट आती है और कबीर दुनिया नापने निकल पड़ता है, एक बार फिर लौटकर आने के लिए। फिल्म में कई ऐसे सीन हैं, जिन्हें देखकर निर्देशक की समझ की तारीफ करने का दिल करता है। एक सीन जो मुझे बेहद छू गया, वो था उदयपुर के किले के बुर्ज पर ढलती शाम में फिल्माया गया सीन। इसमें कबीर और नैना ऊंचाई पर बैठे सुनहरे होते शहर को निहार रहे हैं। कबीर जब वापस विदेश जाने की बात कहता है तो नैना का जवाब होता है, 'कब तक सपनों को पूरा करने के लिए भागते रहोगे कबीर, आखिर में कुछ न कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा'। कैमरा धीमे-धीमे दोनों को छोड़ते हुए डूबते हुए सूरज पर केंद्रित हो जाता है। निर्देशक ने अपना हुनर दिखाते हुए ऐसे दृश्य रचे हैं कि बिना एक संवाद कहे भी इंसानी रिश्तों की दुश्वारियों को वे केवल विजुअल के माध्यम से समझा देते हैं। फिल्म के दोनों मुख्य पात्रों में दीपिका पादुकोण रणबीर से आगे नजर आती है। दीपिका ने अपने कैरेक्टर के सारे शेड्स स्क्रीन पर बखूबी दिखाए हैं लेकिन कई जगह रणबीर एक से ही दिखाई देते हैं। आदित्य राय कपूर ने अपना किरदार ठीक से निभाया है लेकिन बतौर सह-अभिनेता प्रस्तुत होकर वे अपने कॅरियर की गाड़ी धीमी कर रहे हैं। करण थापर का ये सफर हमें सुखद नजारे दिखाता है और साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति भी करवाता है। अयान की ' ये जवानी दीवानी' एक खुबसूरत सन्देश देती है कि आँखों में ढेर सारे ख्वाब हो लेकिन एक छोटा सा ख्वाब ' अपनों' के साथ भी देखा गया हो. इस खुबसूरत सफ़र में बस एक ही गलती हुई है और वो है  इसकी लम्बाई। पूरी फिल्म में बस यही एक बात अखरने वाली है। 

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