Monday, May 6, 2013

मद्धम रोशनी के तले जन्मते ख्वाब-फिल्म समीक्षा-3

हकीकत में इस फिल्म का असली रोमांच तो दिबाकर बनर्जी की कहानी से शुरू होता है। इस कहानी के जरिये दिबाकर भारतीय सिनेमा को सच्चे अर्थों में आदरांजली देने में शत-प्रतिशत सफल हुए हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी और सदाशिव अमरापुरकर का मंच लुट अभिनय इस कहानी को और ऊँचे आयाम पर ले जाता है। एक संघर्षरत अभिनेता को जब मन माफिक सफलता नहीं मिलती तो वो एक असफल बिजनेसमैन बन जाता है। घर में पत्नी और एक प्यारी बेटी हैं। बेटी हमेशा बीमार रहती है और पिता को उसे हमेशा नई फिल्मों की कहानियाँ सुनानी पड़ती हैं। एक दिन पिता वाचमैंन की नौकरी के लिए जाता है लेकिन हमेशा की तरह नौकरी उसे नहीं मिलती। वापस लौटते समय वो रणवीर कपूर की एक फिल्म की शूटिंग देखने लगता है। यहाँ उसे एक्स्ट्रा कलाकार का रोल करने के लिए कहा जाता है। ये एक मिनट का किरदार उसकी जिन्दगी को नए मायने दे देता है। कहानी सुनने में बहुत साधारण लगती होगी लेकिन दिबाकर, सदाशिव और नवाजुद्दीन की तिकड़ी इस कहानी को ना भूलने वाला अनुभव बना देती है। दरअसल इसकी रग-रग से भारतीय सिनेमा परिलक्षित होता है। ऐसा कौनसा रसायन है जो एक आम भारतीय को फिल्मों से इतना आत्मीय जुड़ाव देता है, इसी सवाल का जवाब निर्देशक दिबाकर अपनी कहानी में खोजते नजर आते हैं। अब कहानी पर वापस लौटते हैं। नवाजुद्दीन जब अपने एक मिनट के किरदार का संवाद निर्देशक से मांगते हैं तो उसे एक कागज पर 'ऐ' लिखकर दे दिया जाता है। उनका सीन बस इतना है कि सामने से आ रहे रणवीर कपूर और उनकी टक्कर होती है और नवाज को ऐ कहकर निकल जाना है। स्टूडियो के पीछे इस सीन की प्रेक्टिस करने आया कलाकार अपना संवाद देखकर निराश हो जाता है और कागज कूड़ेदान में फेंकने ही वाला होता है कि एक आवाज सुनकर वो ठिठक जाता है। आवाज उसके गुरु की है, वो कहता है '' मुझे मालुम है तू ये रोल नहीं करेगा, क्योकि तुझे तो हर चीज गिफ्ट में चाहिए '' ये सुनकर कलाकार बिफरते हुए कहता है '' आपने भी तो मुझसे मेरा हक़ छीन लिया। इस पर गुरु का जवाब होता है, जिसने रंगमंच पर मेहनत की, उसने फिक्स डिपाजिट कमाया। अब दुसरे का फिक्स डिपाजिट तुझे कैसे दे दू। सदाशिव अमरापुरकर इस छोटे से किरदार में भी सबसे असरदार साबित होते हैं। ये सीन आने वाले वक्त में सदाशिव और नवाजुद्दीन की जबरदस्त जुगलबंदी के लिए जाना जायेगा। कहानी के अंतिम सीन में दिबाकर के सशक्त हस्ताक्षर दिखाई देते हैं। शाम का वक्त है और एक चाल में नवजुद्दीन अपनी बेटी को फिल्म शूटिंग की नई कहानी सुना रहे हैं। कैमरा धीमे-धीमे पीछे हट रहा है। अब फ्रेम में नवाज़ और उनकी बेटी नज़र नहीं आ रहे। टिमटिमाते बल्बों की रोशनी में मद्धम होती चाल के पीछे रंग बिरंगी रोशनियों में लदी ऊँची इमारते नजर आ रही है। शायद दिबाकर ये कहना चाहते हैं कि ख्वाब तो इन् टिमटिमाते बल्बों की रोशनी के तले जन्मते हैं लेकिन पुरे वहां होते है,जहाँ इन ख्वाबो के सौदागर रहते हैं। 

                           ( जारी है) 
                                                        

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