Thursday, May 16, 2013

ये सजा सबक बन जाएगी


आज संजय दत्त को 16 जनवरी 1993 की वो सुबह बार-बार याद आ रही होगी, जब अबू सालेम उनके घर एके-56 देने आये थे। उस दिन यदि संजू अपना फैसला बदल लेते तो आज बदकिस्मती उनकी जिन्दगी के साढ़े तीन साल यूं नहीं चुराती। ये साढ़े तीन साल तो एक तरह से उनके लिए मुक्ति कही जाएगी क्योकि इन बीस सालों में वे रोज ईश्वर के न्यायालय में पेश हुए हैं।  एक तरह से पैरोल पर छूटे कैदी की तरह वे जिंदगी जीते रहे। मुन्ना भाई सिरीज़ की दो फिल्मों ने उन्हें फिर स्टारडम में लौटा दिया और शायद वे मुन्नाभाई को जीते हुए अपनी गलतियों पर पछतावा भी करते रहे। संजू की जिन्दगी शुरू से ही भटकाव का शिकार रही है। सभी को मालूम है कि कम उम्र में ही संजू ड्रग एडिक्ट हो गए थे और पिता सुनील दत्त की मदद से वे ये बुरी लत छोड़ पाए। एक सितारा पुत्र होने के नाते उन्हें शोहरत उसी वक्त मिलने लगी थी, जब उनकी नशाखोरी और मारपीट के किस्से अख़बारों और फ़िल्मी पत्रिकाओं की सुर्खी बनने लगे थे। एक तरह से उनके भीतर का खलनायक उस दौर के युवाओं को खासा पसंद आ रहा था। 1981 में संजू की पहली फिल्म रॉकी प्रदर्शित हुई। इसी साल उनकी माँ नर्गिस का देहांत हो गया और माँ से बेहद लगाव रखने वाले संजू को ड्रग में अपने दुःख से राहत मिलती दिखी। इसके बाद वे एक मामले में पांच महीने जेल में भी बिताकर आये। इस दौर में उनकी जो फिल्मे प्रदर्शित होती, उनमे संजू बाबा की एंट्री पर युवा चिल्लाते थे ' आ गया चरसी'. धीरे-धीरे उनको अपने भीतर का खलनायक भाने लगा था। संजू की कहानी खुद किसी फ़िल्मी कथा की तरह है, जिसमे जबरदस्त ऊँचाइया हैं तो विपत्ति की घनघोर खाईया भी हैं। आज जब वो मीडिया के  कैमरों से लड़ते हुए कोर्ट में जाने का प्रयास कर रहे थे तो ये दृश्य देखकर उनके दीवानों का कलेजा मुह तक आ गया होगा। एक गंभीर अपराध में लिप्त होने के बाद भी उनके प्रशंसकों ने लंबे समय तक उन्हें जितना प्यार दिया, वो हैरतअंगेज़ है। पुणे के येरवडा जेल में संजू बावर्ची का काम करना पसंद करेंगे। वो एक बेहतरीन कूक हैं और उनके इस शौक के किस्से मुंबई में बहुत सुने जाते हैं। एक किस्सा ये है कि माहिम के होटल में जब आप मांसाहारी भोजन मांगेंगे तो वो कहेगा 'संजय दत्त चिकन करी' ट्राय कीजिये, बहुत लज़ीज़ है। ये बात बिलकुल सच है कि एक दिन संजू बाबा ने इस होटल की किचन में जाकर चिकन करी बनाई और शेफ से कहा जब भी ये बनाओ इसे मेरे नाम से सर्व करना। ऐसी कई कहानिया है जो संजू की दरियादिली और दादागिरी की तस्वीर बयां करती हैं। जिस येरवडा जेल में संजू जा रहे हैं, वहा कभी महात्मा गाँधी भी रह चुके हैं। लगे रहो मुन्ना भाई फिल्म में महात्मा गाँधी की आत्मा मुन्ना  को राह दिखाती है। येरवडा की दीवारों  भी अब तक गाँधी को विस्मृत नहीं किया होगा। शायद साढ़े तीन साल का येरवडा प्रवास संजू को सही मायने में मुन्ना बना दे और जब वो वापस आये तो बिलकुल बदला हुआ इंसान हो। संजू की ये सजा सलमान समेत उन सभी हस्तियों के लिए सबक बन जाएगी, जो खुद को कानून के ऊपर समझते हैं। ईश्वर के बही खाते में कभी भेदभाव नहीं होता और ये फैसला इस बात को साबित करता है। 


No comments: