Friday, May 31, 2013

भारत निर्माण के लुभावने भ्रम


 कार्टूनिस्ट मंजुल की पोस्ट से साभार 
टीवी चैनलों पर अनवरत भागती विज्ञापनों की दुनिया लगातार बदलती रहती है। ये एक ऐसा आभासी जगत है, जो हमारे समाज में कही प्रतिबिंबित नहीं होता लेकिन असर सौ फीसदी छोड़ रहा है। नब्बे प्रतिशत विज्ञापन मोबाइल, टैब बेचने के लिए बनाये जा रहे हैं और बाकी बीमा कंपनी, तेल शेम्पू, कार, बाइक के हिस्से में चला जाता है। विज्ञापन एक समय में अपना 'माल' बेचने की कला मानी जाती थी लेकिन अब ये झूठ को सच बना रही है। सही शेम्पू और सही डीओ उपयोग में लाने से बगल में जल्द ही एक गर्ल फ्रेंड आने की ग्यारंटी है। एक खास कंपनी की बाइक आपको सडक पर सबसे ख़ास बना देती है। डीओ की ही बात करे तो एक कम्पनी तो दावा करती है कि दो बूंद छिड़को तो लड़की कमरा तोड़ कर आपकी बाहों में समा जायेगी। ऐसे झूठ जब ' सच' बनने लगे तो राजनितिक दल कहा पीछे रहते हैं। पहले आपने '' इंडिया शाइनिंग ' देखा और अब देख रहे हैं ' हो रहा भारत निर्माण'. जब मैंने ये विज्ञापन देखे तो सन्न रह गया कि अभिव्यक्ति की सर्वथा शक्तिशाली विधा का ऐसा घनघोर दुरूपयोग किया जा रहा है। घोटालो की माला गले में लटकाए ये सरकार अपने विज्ञापनों में ऐसा खुशहाल भारत दिखा रही है, जो कही 'एक्सिस्ट' ही नहीं करता। ये यूटोपियाई विज्ञापन देखकर एक आम भारतवासी अब अपने पडोसी से हर सुबह मजाक में कहने लगा है ' क्या आपने लिया अपना हक़'. दरअसल मौजदा सरकार को सुचना विस्फोट के कारण सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ है और उसके कई नेताओ के कारनामे उजागर हो गए। ऐसे में उसने खुद को बचाने के लिए उसी सुचना तंत्र का बेजा सहारा लिया है। भारत निर्माण के मेट्रो ट्रेन के एक विज्ञापन में जब संभावित मेट्रो प्रोजेक्ट वाले शहरों में मेरे शहर इंदौर का नाम नज़र आया तो मैं सन्न रह गया। हकीकत ये है कि इंदौर का प्रशासन अभी तक उनका महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बीआरटीएस ही सफल नहीं करवा पाया है और मेट्रो की तो दूर दूर तक कोई आहट नहीं सुनाई दे रही। क्या जिस तरह से कंपनिया युवाओं के सपनो को हाईजेक कर उनमे व्यावसायिक रंग भरने में लगी है, क्या उसी तरह अब सरकारे आमजन का वोट भी हासिल कर लेगी। इन सारे विज्ञापनों के समन्दर में दो विज्ञापन ऐसे हैं जो सच के बेहद करीब लगते हैं। पहला विज्ञापन एक डीओ का है, जो ये कतई दावा नहीं करता कि उसे प्रयोग करने से लड़की मिलने की ग्यारंटी है। इस विज्ञापन में भोंदू सा दिखने वाला युवक इस कम्पनी का डीओ इसलिए प्रयोग कर रहा है क्योकि उसे इसकी महक बहुत पसंद है। दिखाया जाता है कि ये डीओ उसे इतना पसंद है कि वह उसकी बोतल के साथ नाचता है। कही कोई लड़की नहीं, सन्देश साफ़ है कि लड़के वही पहनते-ओढ़ते है जो उन्हें पसंद आता है, लड़की को नहीं। एक औसत मर्द वाकई में ऐसा ही होता है , उसे लड़की की पसंद से कोई मतलब नहीं होता। दूसरा विज्ञापन मस्क्युलर सलमान का है , जिसमे वे एक पहलवान से पंजा लड़ा रहे हैं। पहलवान चित होने ही वाला है कि सलमान की नज़र पहलवान के अपंग बेटे की ओर जाती है जो बेसब्री से पापा के जीतने का इंतज़ार कर रहा है। ये देख सलमान की पकड़ ढीली पड़  जाती है और पीछे से एक संवाद उभरता है ' हारो मगर दिल जीत लो'. ऐसा परोपकार एक इंसान अपनी वास्तविक जिन्दगी में कर सकता है लेकिन ' बच्ची का धर्म वो बड़े होकर खुद ही तय कर लेगी' जैसे जुमले आसानी से पचते नहीं है। कहने काआशय  यही है कि विज्ञापन विधा का गलत प्रयोग हमारी युवा पीढ़ी के लिए जहर बुझे इंजेक्शन का काम कर रहा है। अभिभावकों को गहराई से सोचना है कि उनके युवा बेटे के सपने यदि केवल अदद गर्ल फ्रेंड, बाइक और पैसे वाली नौकरी तक ही सीमित रहते हैं तो कल का भारत किनके कन्धों पर होगा। 


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