Monday, May 6, 2013

बच्चा- बच्चा गाये फ्रॉम बचपन-बचपन-फिल्म समीक्षा-4



चौथी कहानी में अनुराग कश्यप हमें लिए चलते हैं देश के उस हिस्से में जहा फ़िल्मी सितारों के लिए दीवानगी की कहानिया अब किवदंती का रूप ले चुकी हैं। ख़ास तौर से सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के लिए फिल्म का ये गीत बिलकुल सटीक बैठता है '' बच्चा- बच्चा गाये फ्रॉम बचपन-बचपन, बच्चन बच्चन बोल बच्चन बच्चन। उत्तरप्रदेश में अमिताभ का दीवाना हर दुसरे घर में भौतिकी के अटल नियमो की तरह पाया जाता है। ऐसा ही एक दीवाना अनुराग की इस कहानी में भी है, जो अपने बेटे से कहता है कि यदि वो घर के मुरब्बे में से आधा अमिताभ को खिला कर वापस ले आएगा तो बच्चन का जूठा मुरब्बा खाकर वह ठीक हो जायेगा। बेटा विजय  पिता की आज्ञा मान घर से मुंबई के लिए निकल पड़ता है, इस आस में कि उसके घर का मुरब्बा बच्चन जरुर खायेंगे। विजय को भी उन सभी हालातों से गुजरना पड़ता है, जिन तकलीफों से फ़िल्मी सितारों के दीवाने गुजरते हैं। अनुराग कश्यप अकेले ऐसे निर्देशक रहे, जो एक प्रशंसक के नजरिये से अपनी कहानी दिखाते हैं। कैसे कोई  सितारा अपनी फिल्मों के जरिये अपने दिवानो के परिवार का हिस्सा बन जाता है। सितारों के लिए यही प्यार ही सौ साल के सिनेमा की असली नीव है. विजय का किरदार निभा रहे विनीत कुमार सिंह को देखकर लगता है वाकई में इलाहबाद का कोई भइया अमिताभ से मिलने भोलेपन में चला आया हो। असीम संभावनाओ वाला ये अभिनेता बहुत सहज अभिनय करता है और हिंदी सिनेमा के लिए नई खोज साबित हो सकता है। अमिताभ से मुलाकात वाले दृश्य में तो  उन्होंने कमाल कर दिया है। इन चार कहानियों में अनुराग  की कहानी सबसे ज्यादा छूती है। फिल्म दिखाती है कि बच्चन तो केवल प्रतीक मात्र है और वो मुरब्बा भी, जो विजय मुंबई लेकर पहुचता है। यहाँ बच्चन का नायकत्व सिनेमा के उन सभी सितारों के युनिवर्सल नायकत्व में बदल जाता है, जो एक आम भारतीय को सपने और उम्मीदे बांटते हैं और मुरब्बा उस मिठास का प्रतीक है, जो समय-समय पर इन कलाकारों के लिए आमजन के बीच झलक जाती है। अनुराग कश्यप का ये मुरब्बा कभी खराब नहीं होगा और इसकी मिठास वक्त के साथ और बढती चली जाएगी। फिल्म समाप्त होने पर ख्याल आता है कि सबसे बेहतरीन कहानी, सबसे आखिर में क्यों? फिर समझ में आता है कि इस मसालेदार भोज का अंत इसी स्वीट डिश के साथ ही होना चाहिए था। 

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