Tuesday, May 14, 2013

संवादों के भी सौ साल का सफर


           औरंगजेब का एक दृश्य 

सिनेमा के सौ साल का सफर  उनमे कहे जाने वाले संवादों के भी सौ साल का सफर है। सिनेमा की एक सदी पूरी होने पर वरिष्ठ फिल्म समालोचक जयप्रकाश चौकसे ने बीबीसी के लिए इन सौ सालों के संवादों का एक दिलचस्प संकलन तैयार किया है। जब हम इन पर नज़र डालते हैं तो उनके भीतर पल-पल बदलते भारतीय समाज की झलक सहज ही मिल जाती है। सबसे पहला संवाद फिल्म रोटी (1941) से लिया गया है जिसमे नायक एक भूखे इंसान से कह रहा है ' रोटी मांगने से ना मिले तो छीन कर ले लो, मार कर ले लो। इस संवाद की अनुगूँज 1983 में मनमोहन देसाई की फिल्म कुली में सुनाई दी, जब अमिताभ एक चुनाव प्रचार के दौरान कहते हैं ' कोई किसी के लिए दो जून रोटी का इंतजाम नहीं करता, मैं तो कहता हूँ चीर दे धरती का सीना और निकाल ले अपने हिस्से की दो जून रोटी। यानि कि आज़ादी के कई साल बाद भी एक गरीब आदमी को रोटी मयस्सर नहीं हुई थी। लाखों फिल्मों में कहे गए करोडो संवाद सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं है, बल्कि वे हमें अपने अतीत की कहानी सुनाते हैं।मैं यहाँ उन संवादों का जिक्र हरगिज नहीं करने जा रहा, जो आये दिन हम कॉमेडी शो में सुनते रहते है,और उनके हास्यात्मक दोहराव ने उनसे उनका मूल अर्थ छीन लिया है। आज़ादी के बाद भारत का सफर भूख से शुरू होकर वर्तमान में जारी ओद्योगिक क्रांति तक निर्बाध जारी है।फिल्म नया दौर (1957) के ही  एक संवाद में भारत में आने वाले मशीनी युग की झलक मिलती है। सडक बनाने वालो से बहस होने पर दिलीप कुमार कहते हैं ' ये अमीर गरीब का झगड़ा नहीं है बाबु, ये तो मशीन और हाथ का झगड़ा है। अब दो बीघा जमीन (1957) के एक दृश्य में जमींदार के जमीन बेचने की बात सुनकर बलराज साहनी कहते हैं ' जमीन तो किसान की माँ होती है हुजुर और माँ को भी भला कोई बेचता है' . जैसे जैसे सिनेमा अपनी यात्रा तय करता गया, संवाद भी बदलने लगे। भूख से एक हद तक उबरे भारत ने अब मनोरंजन करना सीख लिया था। गुलामी की कडवी यादें भी अब धुंधली पड़ने लगी थी। ये सत्तर का दशक था और प्यार के मामले  में दकियानूसी भारत अब खुलने लगा था। ये बात इस दशक में भी नज़र आई, जो प्रेम कहानियों से लबरेज़ था। हालाँकि जो संकलन बीबीसी ने तैयार किया है, उसमे दर्जन भर संवाद राजकपूर के हैं। उनकी छवि संवादों के कारण नहीं बल्कि अभिनय और निर्देशन कला के कारण बनी है। और वे संवाद इतने प्रभावशाली भी नहीं थे। इसके अलावा संकलन में कई चर्चित संवाद भी नहीं मिलने के कारण मुझे थोड़ी निराशा हुई। जैसे मिथुन चक्रवर्ती का मशहूर संवाद ' कोई शक़' इस संकलन में नहीं है। माचिस में चन्द्रचुड सिंह जब ओम पुरी से उनके परिवार के बारे में पूछते हैं तो उनका ज़वाब होता है ' आधे सैतालिस खा गया और आधे चौरासी'. लिस्ट में फिल्म खुद गवाह (1957) का वो मशहूर संवाद भी नदारद है जिसमे अमिताभ यानि बादशाह खान पहली बार हिन्दुस्तान की सरहद देखकर कहते हैं ' सर जमीन-ए- हिन्दुस्तान, मैं बादशाह खान काबुल से आया है, दोस्ती मेरा मजहब, मोहब्बत मेरा ईमान। लिस्ट में तो ग़दर (1957) में सनी देओल के गर्मागर्म संवादों में एक भी दिखाई नहीं दिया।  खैर संवादों की यात्रा तो चलती रहेगी और वे देश की बदलती तस्वीर के साथ बदलते भी रहेंगे। इस हफ्ते प्रदर्शित हो रही फिल्म औरंगजेब में एक गरमागरम संवाद है, जो भारत सरकार के साथ साथ हर उस नाकाबिल इंसान के लिए कहा जा सकता है, जो नाकाम लीडर साबित हुआ है। ' चार पैर की कुर्सी पर बैठने से कोई लीडर नहीं हो जाता, जो दो पैरों पर खड़े होकर लड़ता है, वो लीडर होता है'

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