फेसबुक पर विचरते हुए अचानक एक पोस्ट ने ध्यान आकर्षित कर लिया। एक जागरूक व्यक्ति ने ये पोस्ट दो दिन पहले ही डाली थी। इसमें औरंगाबाद की एक फोटो थी, जिसमे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता मांग कर रहे हैं कि जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही फिल्म औरंगजेब का नाम बद्ला जाये। इनका कहना था कि औरंगजेब एक सूफी संत (!) था। जो भी इतिहास के बारे में थोडा बहुत भी जानता हो, उसे ये मालूम है कि औरंगजेब ने भारत में किस तरह का सुफिज्म फैलाया था। फिल्मे विश्वभर में बनाई जाती हैं लेकिन अपने देश में हर चौथी फिल्म का विरोध अर्नगल कारणों से किया जा रहा है। एक फिल्मकार बहुत मेहनत से फिल्म बनाता है , यदि उसमे कुछ आपत्तिजनक होता है तो सेंसर बोर्ड की जवाबदेही बनती है कि वह अपनी और से सेंसर की कैंची चलाए। लेकिन अपने देश में बेवजह सड़कों पर उतरने वाले इन आंदोलनकारियो को पूरी छूट है कि वे विरोध करें, टाकिज जला दे या अभिनेता के घर पत्थर फेंके। आये दिन ऐसे अर्थहीन विरोध हमें बताते हैं कि वैश्वीकरण के इस दौर में हमारी सोच अब भी मध्ययुग में विचरण करती है। यशराज फिल्म्स की फिल्म में एक पात्र का नाम औरन्जेब है तो इस पर इतना बवाल मचाने की क्या जरुरत है। इसके विपरीत हम वैश्विक सिनेमा को देखे तो एक अलग ही तस्वीर नज़र आती है। एक उदाहरण देना चाहूँगा फिल्म दा विन्ची कोड का। 2006 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म में निर्देशक रान हावर्ड ने अपनी कहानी के जरिये ये बताने की कोशिश की कि ईसा मसीह अविवाहित नहीं बल्कि शादीशुदा थे। रोमन कैथोलिक चर्च ने इस फिल्म का पुरजोर विरोध किया लेकिन इसके बावजूद न फिल्म पर रोक लगाई गई और न ही फिल्मकार पर किसी तरह की क़ानूनी कारवाई की गई। बाक्स ऑफिस पर फिल्म ने जबरदस्त कमाई की और समीक्षकों की तारीफ भी पाई। एक कलाकार के लिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सबसे जरुरी चीज होती है लेकिन हमारे यहाँ ना केवल फिल्मों में बल्कि संगीत, चित्रकला में भी ये स्वतंत्रता दिखाई नहीं देती। संविधान तो कहता है की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन ताकतवर सत्ता उसे मानने से इनकार कर देती है। जब निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राइडे प्रदर्शित होने वाली थी तो कुछ समुदायों ने इसकी कहानी और संवादों को लेकर अनुराग को कोर्ट में घसीट लिया था। अनुराग ने भी हार न मानते हुए लम्बी क़ानूनी लड़ाई लड़ी और जीते। जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो दर्शकों ने पाया कि मुंबई के बम धमाको पर आधारित एक बेहतरीन फिल्म को बेवजह रोका जा रहा था। अनुराग ने अपनी फिल्म पूरी तरह मुंबई पुलिस के दस्तावेजों के आधार पर बनाई थी और इसका विरोध करना समझ के बाहर था। जब कुछ मुट्ठी भर बददिमाग लोग किसी कलाकार की रचना पर सवाल उठाते है तो यही महसूस होता है की सरकारें और लोग आज भी मध्ययुग में ही सांस ले रहे हैं।
Tuesday, May 7, 2013
हमारी सोच अब भी मध्ययुग में विचरण करती है
फेसबुक पर विचरते हुए अचानक एक पोस्ट ने ध्यान आकर्षित कर लिया। एक जागरूक व्यक्ति ने ये पोस्ट दो दिन पहले ही डाली थी। इसमें औरंगाबाद की एक फोटो थी, जिसमे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता मांग कर रहे हैं कि जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही फिल्म औरंगजेब का नाम बद्ला जाये। इनका कहना था कि औरंगजेब एक सूफी संत (!) था। जो भी इतिहास के बारे में थोडा बहुत भी जानता हो, उसे ये मालूम है कि औरंगजेब ने भारत में किस तरह का सुफिज्म फैलाया था। फिल्मे विश्वभर में बनाई जाती हैं लेकिन अपने देश में हर चौथी फिल्म का विरोध अर्नगल कारणों से किया जा रहा है। एक फिल्मकार बहुत मेहनत से फिल्म बनाता है , यदि उसमे कुछ आपत्तिजनक होता है तो सेंसर बोर्ड की जवाबदेही बनती है कि वह अपनी और से सेंसर की कैंची चलाए। लेकिन अपने देश में बेवजह सड़कों पर उतरने वाले इन आंदोलनकारियो को पूरी छूट है कि वे विरोध करें, टाकिज जला दे या अभिनेता के घर पत्थर फेंके। आये दिन ऐसे अर्थहीन विरोध हमें बताते हैं कि वैश्वीकरण के इस दौर में हमारी सोच अब भी मध्ययुग में विचरण करती है। यशराज फिल्म्स की फिल्म में एक पात्र का नाम औरन्जेब है तो इस पर इतना बवाल मचाने की क्या जरुरत है। इसके विपरीत हम वैश्विक सिनेमा को देखे तो एक अलग ही तस्वीर नज़र आती है। एक उदाहरण देना चाहूँगा फिल्म दा विन्ची कोड का। 2006 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म में निर्देशक रान हावर्ड ने अपनी कहानी के जरिये ये बताने की कोशिश की कि ईसा मसीह अविवाहित नहीं बल्कि शादीशुदा थे। रोमन कैथोलिक चर्च ने इस फिल्म का पुरजोर विरोध किया लेकिन इसके बावजूद न फिल्म पर रोक लगाई गई और न ही फिल्मकार पर किसी तरह की क़ानूनी कारवाई की गई। बाक्स ऑफिस पर फिल्म ने जबरदस्त कमाई की और समीक्षकों की तारीफ भी पाई। एक कलाकार के लिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सबसे जरुरी चीज होती है लेकिन हमारे यहाँ ना केवल फिल्मों में बल्कि संगीत, चित्रकला में भी ये स्वतंत्रता दिखाई नहीं देती। संविधान तो कहता है की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन ताकतवर सत्ता उसे मानने से इनकार कर देती है। जब निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राइडे प्रदर्शित होने वाली थी तो कुछ समुदायों ने इसकी कहानी और संवादों को लेकर अनुराग को कोर्ट में घसीट लिया था। अनुराग ने भी हार न मानते हुए लम्बी क़ानूनी लड़ाई लड़ी और जीते। जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो दर्शकों ने पाया कि मुंबई के बम धमाको पर आधारित एक बेहतरीन फिल्म को बेवजह रोका जा रहा था। अनुराग ने अपनी फिल्म पूरी तरह मुंबई पुलिस के दस्तावेजों के आधार पर बनाई थी और इसका विरोध करना समझ के बाहर था। जब कुछ मुट्ठी भर बददिमाग लोग किसी कलाकार की रचना पर सवाल उठाते है तो यही महसूस होता है की सरकारें और लोग आज भी मध्ययुग में ही सांस ले रहे हैं।
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