गिप्पी स्कूल की हेड गर्ल बनने के लिए चुनाव लड़ने जा रही है। उसका छोटा भाई उसे सिखाता है कि जीतने के लिए हॉट बॉडी, प्रसिद्धी और एक अदद बॉयफ्रेंड होना बेहद जरुरी है। यही नहीं गिप्पी का पहला बॉयफ्रेंड गिप्पी को डेट पर ले जाने के लिए उसके घर आता है और गिप्पी की मम्मी से इजाज़त मांगता है और गिप्पी की ' समझदार' मम्मी ख़ुशी से इजाजत दे भी देती है। पूरी फिल्म के दौरान मैं लगातार यही सोचता रहा कि आखिरकार देश का कौनसा ऐसा घर है, जहा बॉयफ्रेंड तेरह साल की उम्र की लड़की को डेट पर ले जाने के लिए उसके घर आता है। निर्माता करण जौहर की ये फिल्म हमें उस समाज के दर्शन कराती है, जो मुंबई और दुसरे महानगरों में जरुर दिखाई देता है लेकिन इन शहरों से कटे शेष परम्परावादी भारत में करण का ये आर्टिफिशियल ' समाज' एक्जिस्ट ही नहीं करता। शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजरती गुरप्रीत कौर उर्फ़ गिप्पी इसलिए परेशान है कि मोटी होने की वजह से उसे कोई पसंद नहीं करता और उसका कोई बॉयफ्रेंड भी नहीं है। कहानी का सार यही है कि फिल्म देखकर सारी मोटी लड़कियों को अपनी उम्र से बड़ा स्मोकिंग करने वाला प्रेमी खोजना चाहिए और उनके अभिभावकों को अपनी बेटियों को डेट पर ले जाने की इज़ाज़त ख़ुशी-ख़ुशी दे देना चाहिए। हो सकता है कई पाठक मुझे यहाँ दकियानूसी समझ रहे होंगे, लेकिन सच यही है कि यदि ये फिल्म तेरह साल के बच्चो को कुछ सार्थक करने के लिए प्रेरित नहीं करती हो तो कम से कम उन्हें प्यार करना और डेट पर जाना तो सिखा ही सकती है। इस उम्र के बच्चो को यदि ये भ्रम भी है कि उम्र के इस दौर में ये सब होना चाहिए तो सोनम जैसी फिल्मकार ऐसी फ़िल्में बनाकर उनके भ्रम को और पोषित कर रही हैं। मैंने इंटरवल के दौरान कुछ ऐसे दर्शक देखे, जो अपने मासूमों के साथ इस उम्मीद में चले आये थे कि उनके बच्चों को स्वस्थ मनोरंजन और कोई सीख मिलेगी। मैंने देखा कई अभिभावकों के चेहरों पर हवाइया उडी हुई थी। अब बीच में फिल्म छोड़कर जाने पर वे ' दकियानूसी' समझे जाते। सवाल ये उठता है कि क्या सेंसर बोर्ड ने पूरी फिल्म नहीं देखी। सिर्फ ' समोसे' वाला वाहियात संवाद काटकर उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। क्या बोर्ड सदस्यों को फिल्म देखते हुए जरा भी महसूस नहीं हुआ कि पूरी फिल्म का मूल प्रभाव कोमल मन के बच्चों के लिए कितना घातक हो सकता है। निर्देशिका सोनम ने एक साक्षात्कार में कहा है कि गिप्पी उनकी जिन्दगी से प्रेरित है, मगर क्या प्रेरित करने के लिए केवल लवस्टोरी ही बची थी। स्कूली जीवन बहुत प्रेरणादायक होता है और कई प्रसंग इस फिल्म की विषय वस्तु बन सकते थे लेकिन अवयस्क बच्चों को व्यस्क कथा परोस दी गई। फिल्म में जब माँ और बेटी के बीच बेहद मेच्योर संवाद सुनने को मिलते तो मैं यही सोचने लगता कि तेरह साल की बेटी इतनी समझदार हो गई है कि माँ और अलग हुए पिता के संबंधों के बारे में बातें करने लगी हैं, उसे डिच किये जाने का मर्म मालुम हो ना हो लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ जानती है। क्लासरूम में बच्चो को केवल एक दुसरे पर कमेन्ट पास करते और लव लेटर का आदान-प्रदान करते देखा जा सकता है। पूरी फिल्म में शिक्षक एक बार नज़र आती है जो मानव अंगों के बारे में पढ़ा रही होती है और क्लास में से मुह दबाकर हंसने की आवाजे आने लगती है। फिर हम समझ जाते है कि फिल्म निर्देशिका की मानसिकता उनके स्कूली दिनों में कैसी रही होगी। सोनम नायर ने तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लेकर अपनी फिल्म बना डाली है लेकिन हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए अपने कोरी स्लेट जैसे मन के बच्चों को इस फिल्म से बचाने की जरुरत है। यदि निर्देशिका इस विषय को बॉयफ्रेंड और लड़कियों की आपसी राजनीति पर केन्द्रित करने के बजाय वाकई में उस खास उम्र की मुश्किलों पर केन्द्रित करती तो शायद गिप्पी को सराहा जा सकता था। बस यही कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति के सबसे शक्तिशाली माध्यम की क्षमता को सोनम नायर समझ ही नहीं पाई।

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