Friday, May 24, 2013

फिल्म समीक्षा: कृपया अपनी सीट बेल्ट बाँध लें

                                     फ़ास्ट एंड फ्यूरियस-6


इस फिल्म को देखते हुए ऐसा महसूस होता है, जैसे हम 1200  हार्स पॉवर की सुपर कार बुगाटी में सवार  हो गए हैं और रफ़्तार   हमारी रगों में शामिल हो गई है। हर मोड़ पर चिंघाड़ते टायरों की आवाज़ और हवा में उडती कारे दिल की धक-धक को टॉप गियर में ले जाती है। फ़ास्ट एंड फ्यूरियस की ये छठवी क़िस्त किसी भी मामले में पिछली ' फ्यूरियस' फिल्मों से  कम नहीं दिखाई देती। निर्देशक जस्टिन ली की ये फिल्म हॉलीवुड के परम्परागत स्टंट को ख़ारिज कर बिलकुल ही नए अंदाज़ में प्रस्तुत होती है। कहानी वही से शुरू होती है, जहा पर पिछले भाग में समाप्त हुई थी।तेज़ तरार्र कारों को अपनी उँगलियों पर नचाने वाला पुराना अपराधी डोमिनिक टोरेटो गुमनाम जिन्दगी जी रहा है। एक दिन उसके पास सिक्यूरिटी सर्विस एजेंट ल्युक आता है। वह उसे बताता है कि एक पुराना सीक्रेट एजेंट शॉ बागी हो गया है और अत्यंत महत्वपूर्ण आर्मी डिवाइस चुराना चाहता है। शॉ और उसके लोग इतने तेज़ हैं कि उन्हें केवल टोरेतो ही रोक सकता है। जंग फिर शुरू होती है, अपराधी को खत्म करने के लिए अपराधी का सहारा लिया जाता है। रोलर कोस्टर राइड की तरह बलखाती ये कहानी जब अंत की ओर जाती है तो एक सनसनाता क्लाइमेक्स दर्शको को इस रोमांचक यात्रा  के  सर्वोच्च स्तर पर ले जाता है। अभिनय के मामले में वेन डीजल और ड्वेन जॉनसन जबरदस्त रहे हैं लेकिन मुख्य खलनायक का किरदार निभा रहे ल्युक इवांस अपनी स्क्रीन प्रेजेंस और अद्भुत अभिनय के दम पर सभी कलाकारों पर भारी पड़ते हैं। निर्देशक ने उनके किरदार को बहुत शक्तिशाली बनाया है जिसके कारण फिल्म में अंत तक खलनायक नायकों को धुल चटाता रहता है। 600 करोड़ के टाईटेनिक बजट से बनी इस फिल्म में पैसे को पानी की तरह समझा गया है, जब आप फिल्म देखेंगे तो समझ जायेंगे कि किसी एक्शन फिल्म को इस कदर भव्यता के साथ भी बनाया जा सकता है। ये फिल्म मैंने किसी मल्टीप्लेक्स के बजाय एक सिंगल थियेटर में देखना तय किया। मैंने पाया कि  इस फिल्म ने महज पांच किश्तों में अपने ऐसे दीवाने दर्शक बना लिए हैं जो वेन डीजल और ड्वेन जॉनसन( द रॉक ) की एंट्री पर ठीक वैसे ही चीखते हैं जैसे सलमान खान की फिल्मों में चीखते हैं। मैं हैरान था कि कैसे कुछ कलाकार अपनी भूमिकाओ के जरिये दुसरे देशों में भी प्रशंसक बना लेते हैं। जब फिल्म खत्म होती है तो सीटियो और तालियों से पूरा हाल गूंज उठता है लेकिन उसके साथ रिलीज हुई 'इश्क इन पेरिस', ' हम हैं राही कार के', फ्यूरियस के अंधड़ में कही खो जाती हैं। हाल से बाहर आने के बाद लम्बे समय तक कानों में आवाज गूंजती रहती है ' व्रूम....   व्रूम.... व्रूम.... 




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