Wednesday, May 1, 2013

हमारे गलो की मिठास क्या अब कम हो गई है

भारतीय संगीत उद्योग  क्या पाकिस्तानी गायक कलाकारों के भरोसे चल रहा है। 2001 में अदनान सामी के रूप में शुरू हुई ये घुसपैठ अब खुले आम वाघा बॉर्डर के रास्ते स्वागत द्वारों में बदल गई है। हर तीसरा गाना आज एक पाकिस्तानी गायक गा रहा है। यदि मैं ये बात उन ' तथाकथित महेश भट्ट टाइप लोगो से करता हूँ तो वही पुराना रटा रटाया जवाब सुनने को मिलता है कि संगीत सरहदें नहीं मानता। बिलकुल ठीक बात है लेकिन पाकी सिंगर्स का गाना अपने मोबाईल पर् सुनते समय कोई ये नहीं सोचता कि इन्ही सरहदों से संगीत लहरियों के अलावा भी बहुत कुछ इस देश में पहुचाया जा रहा है। 2001 में अदनान सामी के हिट होने के बाद जैसे ये तय करना मुश्किल हो रहा था कि पकिस्तान से आतंक ज्यादा आ रहा है या मौसिकी।  आतिफ असलम, राहत फतेह खान, शफाकत अमानत अली का करियर इन दिनों पुरे शबाब पर है। संगीतकार प्रीतम, हिमेश रेशमिया, रहमान सभी अपनी फिल्म का हर दुसरा गाना इन मीठे गलो से गवा रहे हैं। फिर मेरा सवाल होता है कि उदित नारायण, अभिजित, सोनू निगम, विनोद राठोड के गलो की मिठास क्या अब कम हो गई है या फिर ये कलाकार पाकिस्तानी कलाकारों से किसी भी रूप में कमतर हैं। कई लोगो का तर्क है कि पाकिस्तानी संगीत ज्यादा प्रयोगवादी है। तो फिर मेरा सवाल होता है की पाकिस्तानी कलाकार अपनी आवाज में विविधता क्यों नहीं दिखा पा रहे है। उनकी आवाज में सुफिज्म के अलावा और किसी चीज के दर्शन क्यों नहीं होते। इस आलेख से साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाया जा सकता है लेकिन मैं यही कहना चाहता हूँ की यदि कोई हिन्दू कलाकार भी पकिस्तान की ओर से फिल्म उद्योग का रुख करता है तो उसे भी रोक जाना चाहिए। संगीत हमारी भी रग रग में बहता है लेकिन देश हमारे लिए पहले आता है। इस बात को हमारे मशहूर संगीत निर्देशकों और सरकार को भी समझनी चाहिए। ये बात उन युवाओं को भी समझनी चाहिए जो देश में हुए किसी भी अन्याय के लिए बेजिझक सडको पर उतर आते हैं लेकिन आतिफ असलम के गीतों पर वाह-वाह करते समय ये नहीं सोचते कि यही बाहरी कलाकार हमारे कलाकारों का हक़ मार रहे है। क्या कोई सोचेगा 

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