इसे जेनरेशन गेप कहें या अतीत के प्रति ललक कहें कि हर पीढ़ी को अपना बचपन ज्यादा मीठा महसूस होता है। ऐसा मेरे साथ भी है और मेरी पीढ़ी की ट्रेन में सवार लगभग सभी लोग भी मेरे इस विचार से सहमत हो सकते हैं। जब बचपन अपना आंचल छुडाने लगता है तो तरुणाई हमें इस बात को महसूसने का मौका भी नहीं देती कि आखिरी बार बचपन को जी भर के निहार ले। ये बाद में याद आता है और बहुत शिद्दत से अपनी कीमत का अहसास कराता है। गिप्पी देखते हुए मैं अपने बचपन में जा पहुंचा। हालांकि ये फिल्म की मेहरबानी नहीं थी बल्कि इसकी कडवाहट को भूलने के लिए ऐसा करना पड़ा। 80-90 के दशक की बात करें तो इन दस साल में बचपन सेलफोन और टीवी चैनल विहीन था। देखने को दूरदर्शन और पढने के लिए बेहतरीन कॉमिक्स। अमर चित्र कथा, डायमंड कॉमिक्स, टिंकल, लोटपोट और इंद्रजाल कॉमिक्स उस दिनों गर्मियां बिताने के बेहतरीन साधन हुआ करते थे। उस दौर में पढ़ी अनगिनत कॉमिक्स, बाल फ़िल्में और दूरदर्शन देखकर मुझे आज ये समझ में आता है कि उन दिनों रचनाकार इस बात के प्रति कितने सजग और जिम्मेदार थे कि उनकी रचनाओं के प्रभाव से कही बचपन विकृत ना हो जाये। उस दौर की बाल फिल्मे बच्चों को जीवन में कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करती थी। उस दौर में चाचा चौधरी और जादूगर मैन्ड्रेक थे और आज सिटचीन बच्चों को सिखाता है कि माता-पिता से अपशब्द कैसे कहे जाए। उस दौर की कॉमिक्स कथाओं और फिल्मों में खलनायक को भी जान से नहीं मारा जाता था। कार्टूनिस्ट प्राण से लेकर वेताल (फैंटम) के जनक ली तक इन सभी रचनाकारों ने बच्चों का मनोरंजन करते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कही उनकी गलती की सजा भविष्य की पीढ़ी को ना भोगनी पड़े। एक शिक्षक कहा करते थे ' हम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पेशे में हैं, चाहे तो पूरी पीढ़ी को खलनायकों की पीढ़ी बना सकते हैं। आज मनोरंजन के साधन ऐसे ही शिक्षको की भूमिका में आ गए हैं। अमेरिका का विडियो गेम सेन एन्द्रियाज़ बच्चों को किस करना सिखा रहा है, सिटचीन गाली देना सिखा रहा है, गिप्पी प्यार करना सिखा रही है। ये सब नये दौर के खतरनाक शिक्षक बन चुके हैं। वेताल कई लोगों के बचपन का प्रेरक नायक रहा है। ली फाक ने 1936 में फैंटम उर्फ़ वेताल को दुनिया के सामने पेश किया। बहुत ही कम समय में वेताल की कहानिया दुनियाभर के बच्चों को लुभा रही थी। इसकी स्टोरी लाइन ये थी कि 1536 में ब्रिटिश नाविक क्रिस्टोफर वाकर के पिता को समुद्री लुटेरे मार देते हैं। वाकर अपने पिता का कंकाल हाथ में लेकर कसम खाता है कि जिन्दगी भर बुराई के खिलाफ लडूंगा। दुसरे सुपर हीरो की तरह फैंटम के पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं है, वो केवल अपनी दो रिवाल्वर और हौसले के दम पर लड़ता है। बच्चों को ये किरदार उनकी जिन्दगी के ज्यादा करीब लगा, उन्हें लगा कि वे भी वेताल की तरह बुराई से लड़ सकते हैं। हो सकता हैं इनमे से कई बच्चे पुलिस में गए होंगे या किसी और ढंग से वेताल बनने की राह पर होंगे। कहने का मतलब साफ़ है की बचपन में जो मिलता है, उसमे से बहुत कुछ उसके भविष्य की राह तय कर देता है, फिर उसके अभिभावक उसके लिए फूल चुने या कांटे, ये समझ की बात है। हालांकि नए दौर में सुपरमैन, स्पाइडरमैन और बेटमेन अब भी बच्चों के लिए प्रेरक बने हुए हैं लेकिन मनोरंजन के बाज़ार में काफी कुछ ऐसा है जिसे बच्चो के लिए कतई ठीक नहीं कहा जा सकता। बचपन तो काल से मुक्त होता है बिलकुल ताज़ी मिटटी का लौंदा। उस दौर की कई कॉमिक्स दीवानों ने सहेज रखी है और आज भी ये बच्चो के लिए उतनी ही मनोरंजक और प्रेरणादायक हो सकती है जितनी उस दौर में हुआ करती थी। अपने मिटटी के लौन्दो के लिए वे कॉमिक्स आपके लिए उपलब्ध है। गौरव आर्य ने अपना एक ब्लॉग बनाया है 'वेताल शिखर'. यहाँ आपको बेहतरीन कॉमिक्स पढने के लिए मिल सकती हैं। लिकं दे रहा हूँ।

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