बॉम्बे टाकिज क्या सिनेमा के चमकदार सौ सालों की प्रतिनिधि फिल्म बनने लायक है, ये सवाल उस वक्त मेरे मन में गूंजा जब परदे पर इस एंथोलोजी (कहानियों के संकलन ) की पहली कहानी शुरू हुई। करण जोहर की ये फिल्म शुरू होते ही हर दर्शक सोचने लगता है कि इस कहानी के विषय का, सिनेमा की सदी से क्या ताल्लुक हो सकता है। कहानी के सिरे कुल मिलाकर इतने हैं कि एक राजनितिक विश्लेषक को एक समलैंगिक युवा के प्रति आकर्षण महसूस होने लगता है जबकि ये गे बन्दा उसकी पत्नी का सहकर्मी है। बीच में तीसरा आ जाने के बाद लम्बे वक्त से ठंडे पड़े पति-पत्नी के अन्तरंग रिश्तों में कुछ गर्माहट आने लगती है और जब पत्नी को मालूम होता है कि इसकी वजह उसका गे सहकर्मी है तो ये रिश्ता टूटने की कगार पर पहुच जाता है। पिछले दो दशको से मुल्क में इस तरह के रिश्तों की एक बाढ़ सी आ गई है और परम्परानुसार इनका रिफ्लेक्शन हमारी फिल्मों में भी झलकने लगा है। यदि इस फिल्म को स्वतंत्र प्रदर्शित किया जाता तो इस तरह के रिश्तों के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की जा सकती थी लेकिन बॉम्बे टाकिज के संकलन में शामिल होते ही कहानी अपना असर खो देती है। पूरी फिल्म के दौरान बस एक ही ऐसा किरदार नज़र आया जो, हिंदी सिनेमा की एक झलक दिखाता है। मुंबई के दोनों सिरों को जोड़ने वाले एक रेलवे पुल पर पुराने गाने गाने वाली एक बच्ची, जो इतने भाव के साथ गाती है कि लोग ठिठक कर सुनने लगते हैं। पुराने गीतों को इतनी त्वरा से प्रस्तुत करने के लिए संगीतकार अमित त्रिवेदी बधाई के पात्र हैं। करण ने गाना गाकर भीख मांगने वाली इस बच्ची के किरदार को खूबसूरती के साथ कथा का मुख्य किरदार बना दिया है। सच कहे तो समलैंगिकता पर आधारित इस कहानी की असली नायक वही बच्ची है जो अपने गड़बड़ मुम्बइया उच्चारण के बावजूद हमें सिनेमा की असली रूह का दीदार कराती है। जब उसकी आवाज में हम 'अजीब दास्ताँ है' सुनते हैं तो उसके सुरों के भटकाव के बावजूद आवाज की मिठास और भोलापन हमें उस सिनेमा की ताकत का अहसास कराते हैं, जो हमें ख्वाब देखने और उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करती है।
( जारी है)

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