Saturday, May 18, 2013

फिल्म समीक्षा - उफ़! ये औरंगजेब की उबाऊ कैद



साल 1993, दिसम्बर का महीना और यशराज की नई फिल्म ' डर' रिलीज़ होने जा रही थी। टीवी चेनलो पर इसके प्रोमोज आना शुरू हो चुके थे। इस फिल्म के लिए ख़ास तौर से यशराज ने प्रचार की दुनिया में एक कदम आगे बढाते हुए तकनीक से भरपूर प्रोमो पेश किये। दर्शकों के लिए ये एक नया अनुभव था क्योकि अब तक वे 'लो' पिक्चर क्वालिटी के ' ट्रेलर' ही देखते आये थे। दर्शक को थियेटर तक खींच लाने का ये फार्मूला कामयाब रहा। धीरे-धीरे यशराज दर्शकों को रिझाने वाले ऐसे प्रोमो बनाने में माशा अल्लाह हो गए और उनकी फिल्मों की क्वालिटी का सेंसेक्स लगातार झुकता ही चला गया। शुक्रवार को प्रदर्शित हुई ' औरंगजेब' के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला है। चमकदार पन्नी में दर्शक को आधी कच्ची डिश परोस दी गई। अब वो चमकदार पन्नी हाथ में लिए सर धुनता रहे, यशराज फिल्म्स का क्या जाता है, उसने तो एक कम लागत में बनी इस फिल्म की लागत तो वसूल ही ली है। हालांकि कई बार धोखा खा चुके दर्शक इस बार सयाने निकले और प्रोमो के झांसे में नहीं आये और इसका असर पहले दिन के व्यवसाय में दिखाई दिया। इंदौर के एक थियेटर में  शनिवार को आखिरी शो में मुट्ठी भर दर्शक बेसब्री से फिल्म खत्म होने का इंतज़ार करते पाए गए। सभी औरंगजेब की इस उबाऊ कैद से जल्द से जल्द निकल जाना चाहते थे। फिल्म शुरू होती है एक गैंगस्टर यशवर्धन सिंह की प्रेम कहानी के बाद पैदा हुए दो जुड़वाँ बच्चों के बिछुड़ जाने से। वैसे ये मेले में नहीं बिछुड़ते हैं लेकिन जुदाई का फील वही 1970 वाला है। एक अपराधी पिता के पास पलकर कुख्यात अपराधी बन जाता है तो दूसरा एक पुलिस अधिकारी के यहाँ परवरिश पाता है। फिल्म ' परवरिश ' की याद आ गई ना। इस फिल्म को देखते हुए आपके मन में और भी कई पुरानी कई फिल्मों की स्मृतियाँ उभरेंगी। एक पुलिस अधिकारी योजना के तहत हर्षवर्धन के जुड़वाँ बेटों को साजिश कर बदल देता है। गेंगस्टर के घर उसका दूसरा बेटा पहुच जाता है और किसी को भनक तक नहीं लगती। हैरानी होती है कि हिस्ट्रीशीटर का बेटा  चंद पलों में पुलिस की गिरफ्त में होता है। इतनी तेज़ पुलिस तो हमने अमिताभ की डाँन में भी नहीं देखी थी। सब कुछ इतनी नाटकीयता के साथ घटता है कि कहानी पर यकीन करने का मन नहीं करता। फिल्म के निर्देशक अतुल सभरवाल हैं। माय वाइफ्स मर्डर फिल्म की बेहतरीन स्क्रिप्ट लिखने वाले अतुल अपनी फिल्म को बेहतर नहीं बना पाए हैं। उन्होंने मुख्य किरदारों की इमेज बिल्डिंग में गंभीर गलतियाँ की है। दो जुड़वाँ भाइयों के स्वभाव में गहरा अंतर है लेकिन अर्जुन कपूर उस अंतर को अपने अभिनय से रेखांकित नहीं कर पाए हैं। वो दोनों जगह एक से ही नजर आते हैं, कोई सिर्फ एक फिल्म पुराने अर्जुन कपूर को  जाकर बताओ कि हाथ में रिवाल्वर रखने और झल्लाने से परदे पर गैंगस्टर को जिन्दा नहीं किया जा सकता। ऋषि कपूर जैसी अद्भुत प्रतिभा का ऐसा दुरूपयोग मैंने आज तक नहीं देखा जितना इस फिल्म में किया गया है। सलमा आगा की बेटी साशा आगा ने इस फिल्म से अपना सफर शुरू किया है लेकिन लगता नहीं कि उनका सफर ज्यादा लम्बा रहने वाला है। वे खुद को कलाकारों के खानदान का बताती हैं लेकिन उन्होंने जिस्म दिखाने के सिवा कुछ नहीं किया है। हम फिर लौट आते हैं फिर उसी सवाल पे कि दर्शक को कब तक चमकदार पन्नी पकड़ाई जाती रहेगी। हजारों  थियेटर बुक कर के वाहियात फ़िल्में दिखाकर अपना मुनाफा काटना। लगता है कंपनी चला रहे आदित्य चोपड़ा अब फिल्मों के लिए भी कंपनी वाली मानसिकता पर चल रहे हैं। पहले कभी उनके हाउस में बनी एक फिल्म देशभर में जूनून पैदा करती थी लेकिन अब एक कतरा शोर नहीं होता। ऐसी फिल्मों को सफल माना जाये या हिट सवाल बड़ा है। 



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