दूसरी कहानी देखते हुए महसूस होता है कि इसके सिरे भी फिल्म की विषयवस्तु से जरा भी मेल नहीं खाते। एक स्कूल जाने वाले बच्चे को उसका पिता फुटबाल खिलाड़ी बनाना चाहता है जबकि उसका सपना कुछ और है। जोया अख्तर इस कहानी की निर्देशिका हैं लेकिन कहानी में कही भी उनकी चिर-परिचित छुअन नज़र नहीं आती। एक बार फिर ऐसा विषय चुन लिया गया जो आम भारतीय दर्शक के समझ से बाहर है। दरअसल जोया अपने किरदार के मनोविज्ञान को ठीक ढंग से परिभाषित नहीं कर पाती। बच्चे को डांस पसंद है और केटरीना कैफ उसकी आदर्श है। बच्चे को लड़कियों के कपडे पहनना और मेकअप करना पसंद है। मुझे लगा कि जोया अपने किरदार के जरिये उस दिमागी विकार के बारे में बात कर रही हैं जो तेज़ी से महानगरों में अपने पैर पसार रहा है। इस तरह के दिमागी विकार के लोगों को क्रॉस ड्रेसर कहा जाता है। जोया यहाँ स्पष्ट नहीं करती कि उनका किरदार वाकई में इस बीमारी का शिकार है या अबोध बचपन उससे ऐसा करवा रहा है। यहाँ फिर वही बात कहना चाहूँगा कि यदि ये कहानी अलग से फिल्म के रूप में पेश की जाती तो इस विषय के साथ न्याय होता। एक क्रॉसड्रेसर की कहानी का सिनेमा की एक सदी से क्या ताल्लुक हो सकता है। बॉम्बे टाकिज में पेश की गई कहानियों में निर्देशकों की सोच और उनका बेकग्राउंड साफ़ झलकता है। करण जौहर और जोया की कहानिया मुंबई की कैद से बाहर ही नहीं निकल पाती। ना उनमे सिनेमा के दीवाने भारत देश के दर्शन होते हैं और ना ही मुंबई का वो वर्ग दिखाई देता है, जिसके दम पर फिल्म उद्यॊग खड़ा है। ऐसा लगता है करण और जोया की कहानियां मुंबई के अभिजात्य वर्ग की अँधेरी सुरंगों से बाहर ही नहीं झाँक पाती। इसके विपरीत फिल्म में दिबाकर बेनर्जी और अनुराग कश्यप की कहानियां जरुर फिल्मों के दीवाने भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। सपनों और आकांशाओ को दिखाने के लिए समलैंगिकता या क्रॉसड्रेसिंग जैसे विकारों की बैसाखियों की क्या आवश्यकता हो सकती है। हालांकि दो बेदम कहानियों के बावजूद बॉम्बे टाकिज लोगो के दिलों पर राज करने में कामयाब हो गई है और उसका कारण है दिबाकर और अनुराग के शानदार प्रयास, जिनकी बदौलत इस नीरस से लगने वाली फिल्म में भी जान आ जाती है। ( जारी है)Monday, May 6, 2013
एक क्रॉसड्रेसर की कहानी- फिल्म समीक्षा-2
दूसरी कहानी देखते हुए महसूस होता है कि इसके सिरे भी फिल्म की विषयवस्तु से जरा भी मेल नहीं खाते। एक स्कूल जाने वाले बच्चे को उसका पिता फुटबाल खिलाड़ी बनाना चाहता है जबकि उसका सपना कुछ और है। जोया अख्तर इस कहानी की निर्देशिका हैं लेकिन कहानी में कही भी उनकी चिर-परिचित छुअन नज़र नहीं आती। एक बार फिर ऐसा विषय चुन लिया गया जो आम भारतीय दर्शक के समझ से बाहर है। दरअसल जोया अपने किरदार के मनोविज्ञान को ठीक ढंग से परिभाषित नहीं कर पाती। बच्चे को डांस पसंद है और केटरीना कैफ उसकी आदर्श है। बच्चे को लड़कियों के कपडे पहनना और मेकअप करना पसंद है। मुझे लगा कि जोया अपने किरदार के जरिये उस दिमागी विकार के बारे में बात कर रही हैं जो तेज़ी से महानगरों में अपने पैर पसार रहा है। इस तरह के दिमागी विकार के लोगों को क्रॉस ड्रेसर कहा जाता है। जोया यहाँ स्पष्ट नहीं करती कि उनका किरदार वाकई में इस बीमारी का शिकार है या अबोध बचपन उससे ऐसा करवा रहा है। यहाँ फिर वही बात कहना चाहूँगा कि यदि ये कहानी अलग से फिल्म के रूप में पेश की जाती तो इस विषय के साथ न्याय होता। एक क्रॉसड्रेसर की कहानी का सिनेमा की एक सदी से क्या ताल्लुक हो सकता है। बॉम्बे टाकिज में पेश की गई कहानियों में निर्देशकों की सोच और उनका बेकग्राउंड साफ़ झलकता है। करण जौहर और जोया की कहानिया मुंबई की कैद से बाहर ही नहीं निकल पाती। ना उनमे सिनेमा के दीवाने भारत देश के दर्शन होते हैं और ना ही मुंबई का वो वर्ग दिखाई देता है, जिसके दम पर फिल्म उद्यॊग खड़ा है। ऐसा लगता है करण और जोया की कहानियां मुंबई के अभिजात्य वर्ग की अँधेरी सुरंगों से बाहर ही नहीं झाँक पाती। इसके विपरीत फिल्म में दिबाकर बेनर्जी और अनुराग कश्यप की कहानियां जरुर फिल्मों के दीवाने भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। सपनों और आकांशाओ को दिखाने के लिए समलैंगिकता या क्रॉसड्रेसिंग जैसे विकारों की बैसाखियों की क्या आवश्यकता हो सकती है। हालांकि दो बेदम कहानियों के बावजूद बॉम्बे टाकिज लोगो के दिलों पर राज करने में कामयाब हो गई है और उसका कारण है दिबाकर और अनुराग के शानदार प्रयास, जिनकी बदौलत इस नीरस से लगने वाली फिल्म में भी जान आ जाती है। ( जारी है)
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