आज शाम को जब सरबजीत का शव अमृतसर लाया जा रहा था तब आँखों के सामने रह-रह कर यश चोपड़ा की फिल्म वीर जारा के दृश्य उभर रहे थे। क्या वीर जारा के वीरेंद्र प्रताप और सरबजीत की कहानी में गजब की समानता नहीं दिखाई देती। हालांकि यह काल्पनिक कथा है लेकिन इसके धागे बिलकुल सरबजीत की दुखद जिन्दगी के सिरों से मिलते हैं। सरबजीत 23 साल पहले गलती से सीमा पार करते हुए पाकिस्तानी सीमा में गिरफ्तार हुआ था। यश चोपड़ा का वीर प्रताप भी सीमा पार की जेल में 22 साल बिताता है। दरअसल यश चोपड़ा का वीर प्रताप पाकिस्तानी जेलों में बंद उन बेकसूर भारतीयों का युनिवर्सल चेहरा है, जो देख ही नहीं पाए कि कब उनके पैरों ने अपने मुल्क की सरहद का साथ छोड़ दिया। वीर जार विशुद्ध प्रेम कथा है लेकिन कई मर्मस्पर्शी दृश्यों में घर को याद करते वीर प्रताप में ऐसे जाने कितने सरबजीत दिखाई देते हैं, जो अब जेल में भयानक अत्याचार सहते इस उम्मीद में जिन्दा हैं कि आतंकवादियों को उनके घर छोड़ कर आने वाली सरकारे किसी दिन उन्हें भी विशेष विमान से लेने आएगी। विशेष विमान इस्लामाबाद जा तो रहे हैं लेकिन साथ में ला रहे हैं हैं बेजान लाशें। वीर प्रताप सिंह ने पुरे 22 साल जेल में बिताये लेकिन किसी से एक शब्द नहीं कहा। रिहाई वाले दिन उसे अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है। बूढा हो चूका वीर कांपते हाथों से जेब से एक कागज निकालता है और कहना शुरू करता है। '' मैं कैदी नंबर 786, जेल की सलाखों से बाहर देखता हूँ, दिन महीने सालों को युग में बदलते देखता हूँ। इस मिटटी से मेरे बाउजी के खेतों की खुशबू आती है। ये धुप मेरी वादी की ठंडी छाह सी याद दिलाती है। ये बारिश मेरे सावन के झूलों को संग संग लाती है। ये सर्दी मेरी लोहिडी की आग सेंक कर जाती है। क्या यही अनुभूति सरबजीत को नहीं होती होगी, जब वो जेल की खिड़की से बाहर देखता होगा। पकिस्तान की जेलों में इस वक़्त लगभग 400 कैदी ऐसे हैं जो गलती से सरहद पार कर गए और अब रिहाई की उमीद में जिन्दगी होम किये दे रहे हैं। अब वक़्त आ गया है कि मनमोहन सरकार सख्ती से पेश आये और स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारत के आम आदमी के लिए विशेष विमान तेयार करे ताकि वक़्त रहते पकिस्तान से ज़िंदा भारतीय वापस लौट सके, सरबजीत की तरह उनकी लाशें नहीं।

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