आज भारतीय सिनेमा की नीव का पहला पत्थर रखने वाले दादा साहेब फाल्के का 144वा जन्मदिन है। इसी मौके पर भारतीय सिनेमा अपने लम्बे सफर का शतक पूरा कर रहा है और इसी मौके पर बॉम्बे टाकिज भी प्रदर्शित होने जा रही है। बॉम्बे टाकिज ने उस पौधे को सींच कर बड़ा किया, जिसे कभी बहुत जतन से फाल्के दादा ने बोया था। सिनेमा को भारत लाने के लिए उनके अनथक प्रयास अब परी कथाओ का हिस्सा लगते हैं। इस महान फिल्मकार को सेल्युलाइड पर सही मायने में परेश मोकाशी ने ज़िंदा किया है। उनकी फिल्म हरिशचंद्रा ची फेक्टरी को देखते हुए ऐसा लगता है हम फिर उस सदी के मुहाने पर खड़े है, जिसमे धुंदीराज फाल्के ने भारत को फिल्म उद्योग में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा था। फिल्म का सम्मोहन हमें इस कद्र जकड़ लेता है कि 1913 की मुंबई नजरो के सामने नाचने लगती है। यु तो पूरी फिल्म कमाल की है लेकिन इसके कुछ सीन जैसे भारतीय सिनेमा की थाती बन चुके हैं। शहर में पहली बार सिनेमा आया है, धुन्दिराज अपने बेटे के साथ मेले में घूमते हुए अचानक एक विज्ञापन देखकर ठिठक जाता है। विज्ञापन में लिखा है चलती फिरती तस्वीरे देखिये। कुछ देर बाद फाल्के अपने बेटे के साथ थियेटर में बैठा है। बाहर आने के बाद वह दुबारा टिकट लेकर हाल में घुस जाता है। ये सिलसिला लगातार चलता रहता है और फाल्के कुछ समय के लिए देखने की दृष्टि खो बैठता है। ठीक होने पर उसे वही धुन लगी है कि कैसे भी हो इस सिनेमा को भारत लाना है। जब सब बोलते है तुम पागल हो गए हो फाल्के, तो फाल्के कहते हैं कि आज तुम मुझे भले ही पागल कह लो लेकिन आने वाले समय में भारत मेरे ही प्रयासों से इस विधा में आत्मनिर्भर बनेगा। दीवानगी बहुत बड़ी चीज है, यदि फाल्के में ये नहीं होती तो आज हमारा फिल्म उद्योग इतना संगठित नहीं होता। परेश मोकाशी की फिल्म देखते हुए अनायास ही फाल्के के प्रति खुद ही श्रद्धा उपजती है। शुक्रवार को बॉम्बे टाकिज प्रदर्शित हो रही है और ये फिल्म भारतीय सिनेमा के सौ साल के सफर को रेखांकित करती है। हालाँकि प्रोमो देखकर लग नहीं रहा कि ये फिल्म गुणवत्ता में परेश मोकाशी की फिल्म के आसपास भी टिक पाएगी, क्योकि इसके गीत संगीत और प्रोमो देखकर लग रहा है कि ट्रिब्यूट भारतीय सिनेमा को नहीं बल्कि बालीवुड को दिया जा रहा है।

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