Tuesday, April 30, 2013

दीवानगी बड़ी चीज है

आज भारतीय सिनेमा की नीव का पहला पत्थर रखने वाले दादा साहेब फाल्के का 144वा जन्मदिन है। इसी मौके पर भारतीय सिनेमा अपने लम्बे सफर का शतक पूरा कर रहा है और इसी मौके पर बॉम्बे टाकिज भी प्रदर्शित होने जा रही है। बॉम्बे टाकिज ने उस पौधे को सींच कर बड़ा किया, जिसे कभी बहुत  जतन से फाल्के दादा ने बोया था। सिनेमा को भारत लाने के लिए उनके अनथक प्रयास अब परी कथाओ का हिस्सा लगते हैं। इस महान फिल्मकार को सेल्युलाइड पर सही मायने में परेश मोकाशी ने ज़िंदा किया है। उनकी फिल्म हरिशचंद्रा ची फेक्टरी को देखते हुए ऐसा लगता है हम फिर उस सदी के मुहाने पर खड़े है, जिसमे धुंदीराज फाल्के ने भारत को फिल्म उद्योग में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा था। फिल्म का सम्मोहन हमें इस कद्र जकड़ लेता है कि 1913 की मुंबई नजरो के सामने नाचने लगती है। यु तो पूरी फिल्म कमाल की है लेकिन इसके कुछ सीन जैसे भारतीय सिनेमा की थाती बन चुके हैं। शहर में पहली बार सिनेमा आया है, धुन्दिराज अपने बेटे के साथ मेले में घूमते हुए अचानक एक विज्ञापन देखकर ठिठक जाता है। विज्ञापन में लिखा है चलती फिरती तस्वीरे देखिये। कुछ देर बाद फाल्के अपने बेटे के साथ थियेटर में बैठा है। बाहर आने के बाद वह दुबारा टिकट लेकर हाल में घुस जाता है। ये सिलसिला लगातार चलता रहता है और फाल्के कुछ समय के लिए देखने की दृष्टि खो बैठता है। ठीक होने पर उसे वही धुन लगी है कि कैसे भी हो इस सिनेमा को भारत लाना है। जब सब बोलते है तुम पागल हो गए हो फाल्के, तो फाल्के कहते हैं कि आज तुम मुझे भले ही पागल कह लो लेकिन आने वाले समय में भारत मेरे ही प्रयासों से इस विधा में आत्मनिर्भर बनेगा। दीवानगी बहुत बड़ी चीज है, यदि फाल्के में ये नहीं होती तो आज हमारा फिल्म उद्योग इतना संगठित नहीं होता। परेश मोकाशी की फिल्म देखते हुए अनायास ही फाल्के के प्रति खुद ही श्रद्धा उपजती है। शुक्रवार को बॉम्बे टाकिज प्रदर्शित हो रही है और ये फिल्म भारतीय सिनेमा के सौ साल के सफर को रेखांकित करती है। हालाँकि प्रोमो देखकर लग नहीं रहा कि ये फिल्म गुणवत्ता में परेश मोकाशी की फिल्म के आसपास भी टिक पाएगी, क्योकि इसके गीत संगीत और प्रोमो देखकर लग रहा है कि ट्रिब्यूट भारतीय सिनेमा को नहीं बल्कि बालीवुड को दिया जा रहा है। 

Monday, April 29, 2013

झलकनी चाहिए आशिकी

 हाल ही में आशिकी-२ देखकर शिद्दत से ये महसूस हुआ कि परदे पर नायक-नायिका में केमिस्ट्री का झलकना कितना जरुरी है। इस फिल्म में मुझे कही भी इस केमिस्ट्री के दर्शन नहीं हुए। एक फिल्म का जिक्र करना चाहूँगा, टॉम क्रूज़ की नाईट एंड डे। यहाँ नाईट का मतलब रात नहीं बल्कि योद्धा वाला नाईट। निर्देशक जेम्स मेनगोल्ड ने एक सीक्रेट एजेंट नाईट और मासूम लड़की जून हेवन्स की प्रेम कहानी को एक्शन दृश्यों की पृष्ठभूमि में रचा है। इस फिल्म के एक सीन का जिक्र करना चाहूँगा, इसके हर शॉट में बस इश्क, इश्क और इश्क झलकता है, जबकि चारो ओर से गोलिया चल रही हैं। जून को एक खतरनाक आतंकी अपहरण कर स्पेन ले आया है, सयोंगवश यहाँ नाईट पहुच जाता है। नाईट को देखकर जून की जुबान पर वो बात आ जाती है जो वह हमेशा कहने से बचती रही है. कुछ देर पहले ही जून को सच उगलवाने के लिए नशे के इंजेक्शन लगाए गए है। जून तो मीरा की तरह नाईट के लिए बावली है। आज इतने खतरे में होने के बाद भी वह नाईट से कह देती है कि जाने कबसे वह नाईट पर फ़िदा है। नाईट भोचक्का है क्योकि इस ये समय तो जान बचाकर भागने का है। लेकिन नाईट भागता नहीं, वो उठता है और जून की ओर चलना शुरू करता है। इतने में दो गोलिया लगभग उसके कान के पास से होकर गुजर जाती है। नाईट बढ़ता है और फ़ौरन जून को चूम लेता है। इस सीन की रग रग  में एक्शन है लेकिन टॉम क्रूज़ और केमरान डियाज़ की केमेस्ट्री प्यार के गुलाब खिला देती है। इस सीन में निर्देशक ने हिंसा के अतिरेक के बावजूद प्रेम को तीव्रता को सर्वोपरि रखा है। आशिकी से खाली आशिकी-2 बनाने वाले यदि ऐसी निर्देशकीय समझ रखे तो दर्शक कहानी से जरुर जुड़ेगा, वरना बेडा गर्क तो होना ही है।

इसे कहते है धोखाधड़ी

पहले ये कोशिश होती थी कि फिल्म में ऐसा क्या डाला जाये जिससे कि तगड़ी ओपनिंग लग जाये, आज फिल्म को बेहतर बनाने की नहीं बल्कि पैकेज बेहतर बनाने की कोशिशे होती हैं और कामयाब भी। भाई अब सीधा सा हिसाब है कि देशभर के हजारो स्क्रीन एक साथ बुक कर लो, फिल्म में सलमान या अक्षय को ले लो। अब करना ये है कि किसी पुरानी फिल्म का नाम जोड़ लो और जोर जोर से ये झूठ बोलो कि ऐसी फिल्म आज तक बनी ही नहीं। दर्शक सयाना नहीं है और ऐसी त्लिस्मी पैकेजिंग में वो फंस जाता है। बस यदि पहले दिन ओपनिंग लग गई तो बाद में क्या करना है। एक हफ्ते में पैसा वसूल और कई टीवी चेनल तो आपकी फिल्म खरीदने के लिए लाइन में खड़े ही हैं। जब दर्शक अपना पैसा लुटाकर बाहर आता है तो किसी से नही कहता कि मैं ठगा गया हूँ। दर्शक को अपना घटिया माल बेचने का ये नया तरीका है जो खूब चल रहा है। ये खुरापात सबसे पहले यशराज फिल्म्स ने शुरू की और बाद में सभी को दर्शक को लूटने की ये तरकीब पसंद आई। ऐसी कुछ फिल्मे है जब तक है जान, दबंग-2, आशिकी-2, रेडी, एजेंट विनोद आदि। ये भी एक ऐसा धोखा है, जिससे हमें उपभोक्ता फोरम भी नहीं बचा सकता। कम बजट में प्रदर्शित आशिकी-2 को रविवार तक स्मेश हिट घोषित कर दिया गया है। आधे से ज्यादा दर्शको को ये फिल्म किसी सर दुखाऊ अभियान से ज्यादा नहीं लगी। भट्ट परिवार ने तो आशिकी का इस्तेमाल कर माल कूट लिया, अब आप अपना दिल कुटा करें, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

Sunday, April 28, 2013

कालखंड की यात्रा एक सम्मोहन है


पीरियड फिल्म बनाने का आकर्षण हर दौर में फिल्मकारों को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता रहता है। कई निर्देशकों ने बेहतरीन फिल्मे बनाई तो कई अपनी गाढ़ी कमाई डूबा बैठे। भारतीय फिल्मकारों में बहुत कम नाम ऐसे हैं जिन्होंने असरदार पीरियड फिल्मो का निर्माण किया। आशुतोष गोवारिकर का नाम ऐसे फिल्मकारों में सबसे ऊपर आता है। लगान और जोधा अकबर के बाद वे निसंदेह ऐसे निर्देशक बन चुके हैं , जो किसी भी बीते कालखंड को परदे पर फिर सांसे भरते दिखा सकते हैं। यहाँ पीरियड सीरियल मालगुडी डेज का जिक्र भी जरुरी है। यदि इस सीरियल को एक फिल्म की तरह पेश किया जाता तो इसके निर्देशक शंकर नाग का नाम शायद गोवारिकर से भी पहले आता। आज मैं एक और पीरियड फिल्म लुटेरा का जिक्र करने जा रहा हूँ। बहुत जल्द प्रदर्शित होने जा रही लुटेरा के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने हैं। उन्होंने अपनी पिछली फिल्म उड़ान से दिखा दिया था कि उनके पंखो में हौसलों की उड़ान भरने का दम है. हाल ही में इसका प्रोमो देखा तो वाकई लगा कि सत्तर के दशक की किसी पुरानी फिल्म का ट्रेलर देख रहे हो। कहानी के बारे में अंदाजा लगाना  मुश्किल है लेकिन ये जरुर पता चल रहा है कि आशुतोष गोवारिकर अब अपने पीरियड क्लब में अकेले नहीं रहेंगे। इस फिल्म की एक-एक फ्रेम में आपको भारत का गुजरा कालखंड नजर आएगा। पात्रो की वेशभूषा और परिवेश से लेकर हर चीज में निर्देशक की मेहनत साफ़ झलक रही है। दर्शक को किसी विशेष कालखंड में ले जाने के लिए बहुत बारीकियो की दरकार होती है। जैसे मंगल पाण्डे में उस दौर की ब्रिटिश रायफल का सही लुक और आवाज के बारे में जानने के लिए आमिर खान और निर्देशक केतन मेहता ने लन्दन के एक म्यूजियम का दौरा किया और उसके बाद ही मंगल पांडे की बगावत में सुनाई देने वाली गोलियों की गूंज असली जैसी ही लगी। हम बीते समय में वापास तो नहीं लौट सकते लेकिन ऐसी फिल्मो के जरिये उस बीते हुए काल को बेहतर ढंग से महसूस कर सकते है। याद कीजिये शंकर की फिल्म हिन्दुस्तानी के कुछ दृश्यों को। फिल्म में लगभग दस मिनट के दृश्य गुलाम भारत से सम्बंधित है। इन दृश्यों को ब्लेक एंड व्हाइट में फिल्माया गया है। मेरे ख़याल में जितना शोध और मेहनत शंकर ने इन दृश्यों में की, उतना परिश्रम बाकी फिल्म को बनाने में नहीं लगा होगा। याद कीजिये प्रियदर्शन की क्लासिक फिल्म काला पानी को। एक जबरदस्त कहानी और जबरदस्त फिल्म। एक डाक्टर को केवल इसलिए काला पानी की सजा होती है क्योकि वह एक अंग्रेज का भारतीय की पीठ का पैरदान की तरह इस्तेमाल करते देख नहीं पाता और कहता है '' इंडियन बेक इज नॉट योर फुटबोर्ड ''. ये एक संवाद डाक्टर को काला पानी पंहुचा देता है। जब कैदियों को गिनती के लिए लाया जाता है तो उस दृश्य में उस काल में इस्तेमाल होने वाला टाइपरायटर भी दिखाई देता है। कालखंड की यात्रा एक सम्मोहन है और इसे हकीकत बना देना केवल और केवल फिल्म निर्देशक के बूते की बात है। 

चूहे बिल्ली का खेल-4



अब लड़ाई आर पार की बन चुकी थी। वासिल जानता था कि इरविन घंटो एक मूर्ति की तरह किसी भी कोने में खड़ा रह सकता है। उसने  किसी बौद्ध की तरह अपनी साँसों पर नियंत्रण पाना सीख लिया था और इसलिए जब भी उसकी ऊँगली ट्रिगर पर दबती, अगले ही पल गोली दुश्मन के सर में धंस जाती थी। फिर भी उसने तान्या और साशा की खातिर इस असाधारण योद्धा के नाम अपनी रायफल लोड कर ली थी। कहानी अब अपने अंतिम छोर पर आ चुकी है, जर्मनी का घेरा स्टॅलिनग्रेड पर कसता जा रहा है। वासिल अपने कमिश्नर डानिलोव  के साथ एक बंकर में दुबका है। सामने ही एक और बंकर में इरविन इत्मीनान से गुस्से में पागल वासिल का इंतज़ार कर रहा है। वो जानता है कि साशा की मौत का बदला लेने के लिए वासिल उसे खोजने के लिए बाहर जरुर आएगा। वासिल को ये मालुम नहीं है कि उनके बेस केम्प पर जबरदस्त हमला हुआ है और तान्या फौजी अस्पताल में मौत से संघर्ष कर रही है। इधर वासिल के सब्र का बाँध टूट रहा है क्योकि इरविन अब तक नज़र नहीं आया है। ऐसे में डानिलोव अचानक एक निर्णय लेता है और ये सब इतनी तेज़ी से होता है की वासिल उसे रोक नहीं पाता। डानिलोव उठता है और बंकर के झरोखे के पास जाकर कहता है, तुम्हारे और देश के लिए वासिल, इतना कहकर डानिलोव बाहर झांकता है, अगले ही पल बीस्ट की रायफल से निकली गोली डानिलोव के माथे के आर-पार हो जाती है। वासिल डानिलोव को सेल्यूट मारता है और सोचता है कि डानिलोव ने अपना बलिदान देकर जंग की वो चाल चली है, जिसे दुनिया चेक मेट के नाम से जानती है। वासिल के जबड़े भींच जाते है, अब बदला लेने का वक्त आ गया है। दुश्मन ये सोचकर बाहर आएगा कि वासिल मारा गया है और बस वही पहला और आखिरी मौका होगा इस चूहे बिल्ली के खेल को खत्म करने का।रेलवे ट्रेक पर बने बंकर से बाहर निकलकर इरविन वासिल के बंकर की और बढ़ रहा है। तभी वह ठिठकता है, उसे आभास होता है कि वो पकड़ा गया है। थोड़ी ही दूर वासिल बन्दुक ताने खड़ा है और उसका निशाना इरविन का सर है। इरविन समझ गया है कि अब अंत आ चुका है। वह सर से अपनी केप निकाल कर जताता है कि वो मरने के लिए तेयार है। अगले पल गोली चलती है और इरविन ढेर हो जाता है। आखिरकार डोनिलोव का बलिदान काम आया। अगले दृश्य में इरविन की बन्दुक लिए फौजी हस्पताल में वासिल व्यग्रता से तान्या को खोज रहा है। तभी उसकी निगाह एक बेड पर पड़ती है जहा तान्या उसे ही देख रही है। इस तरह वासिल ने एक जर्मन मिथक का अंत अपनी अक्ल और हिम्मत के साथ किया। 

Saturday, April 27, 2013

चूहे बिल्ली का खेल-3




अंपने साथी की मौत से दुखी वासिल अब चाहकर भी वापस नहीं लौट सकता। रूसियो की नज़र में वो एक हीरो बन चुका है और अब वो अपना फैसला नहीं बदल सकता। वासिल को याद है कि इरविन के अचूक निशाने ने किस तरह उसके साथी को परलोक पंहुचा दिया था। वो जिसे सामान्य दुश्मन समझ रहा था, वो इतना खतरनाक शूटर है कि इसे  चकमा देना बहुत मुश्किल है। वासिल को नहीं मालूम था कि चूहे बिल्ली का ये खेल उसे एक बार फिर मौत के मुह में धकेल देने वाला है। उधर नाज़ी खेमे में इरविन कुछ परेशान सा अपने नन्हे दोस्त साशा का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। साशा के आते ही इरविन ने उससे कहा कि वो चाहे तो हर गुप्त सुचना के लिए पहले से ज्यादा चाकलेट कमा सकता है। वासिल इस बात से बेखबर है कि इरविन उसकी हर हरकत पर निगाह रख रहा है। इस बीच एक बार और वासिल इरविन की गोली से बच निकलता है लेकिन इस बार वह इरविन द बीस्ट को पहली बार घायल करने में सफल हो जाता है। इस लड़ाई में वासिल की गोली इरविन के हाथ में जा धसती है और वासिल का आत्मविश्वास और बढ़ जाता है। दूसरी बार नाकाम रहने पर इरविन सोचता है कि साशा उसे धोखा दे रहा है। शाम ढलने लगी है लेकिन साशा अब तक घर नहीं लौटा है, वासिल भी परेशान है कि वो कहा रह गया है। वसिल… तान्या की घबराहट भरी आवाज़ सुनकर वासिल समझ जाता है कि तान्या के भाई साशा के साथ कुछ गड़बड़ हुआ है। तान्या अर्धविक्षिप्त सी नाज़ी खेमे की ओर इशारा करती है। वो नजारा देख वासिल को अपने अन्दर खून जमता महसूस होने लगा। नाज़ी खेमे के पास बनी एक खंडहर हो चुकी चिमनी के ऊपर गिद्ध मंडरा रहे थे। साशा की लटकी लाश के इर्दगिर्द मंडराते गिद्धों का नज़ारा बड़ा भयानक था, वासिल अब तान्या को ढांढस बंधा रहा था। वासिल की माँ को बताया जाता है कि साशा पैसो के लालच में दुश्मनों के साथ मिल गया है क्योकि ये नज़ारा उसकी माँ कभी नहीं देख पाती। अगले दृश्य में वासिल अपनी टेलिस्कोप गन दुरुस्त कर रहा है, तभी उदास तान्या वह आती है। वासिल उससे वादा करता है कि इरविन को मारकर उसकी बन्दुक तान्या को लाकर देगा, तभी उसका बदला पूरा होगा। हालांकि वासिल अब भी ये नहीं जानता है कि साशा को मारकर इरविन ने अपनी सबसे खतरनाक चाल चली है। उसे मालुम है कि अब वासिल बदला लेने के लिए बाहर आएगा और उसकी कहानी भी खत्म हो जाएगी।
 ( अगले भाग में समाप्त)
                                

Friday, April 26, 2013

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