पीरियड फिल्म बनाने का आकर्षण हर दौर में फिल्मकारों को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता रहता है। कई निर्देशकों ने बेहतरीन फिल्मे बनाई तो कई अपनी गाढ़ी कमाई डूबा बैठे। भारतीय फिल्मकारों में बहुत कम नाम ऐसे हैं जिन्होंने असरदार पीरियड फिल्मो का निर्माण किया। आशुतोष गोवारिकर का नाम ऐसे फिल्मकारों में सबसे ऊपर आता है। लगान और जोधा अकबर के बाद वे निसंदेह ऐसे निर्देशक बन चुके हैं , जो किसी भी बीते कालखंड को परदे पर फिर सांसे भरते दिखा सकते हैं। यहाँ पीरियड सीरियल मालगुडी डेज का जिक्र भी जरुरी है। यदि इस सीरियल को एक फिल्म की तरह पेश किया जाता तो इसके निर्देशक शंकर नाग का नाम शायद गोवारिकर से भी पहले आता। आज मैं एक और पीरियड फिल्म लुटेरा का जिक्र करने जा रहा हूँ। बहुत जल्द प्रदर्शित होने जा रही लुटेरा के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने हैं। उन्होंने अपनी पिछली फिल्म उड़ान से दिखा दिया था कि उनके पंखो में हौसलों की उड़ान भरने का दम है. हाल ही में इसका प्रोमो देखा तो वाकई लगा कि सत्तर के दशक की किसी पुरानी फिल्म का ट्रेलर देख रहे हो। कहानी के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है लेकिन ये जरुर पता चल रहा है कि आशुतोष गोवारिकर अब अपने पीरियड क्लब में अकेले नहीं रहेंगे। इस फिल्म की एक-एक फ्रेम में आपको भारत का गुजरा कालखंड नजर आएगा। पात्रो की वेशभूषा और परिवेश से लेकर हर चीज में निर्देशक की मेहनत साफ़ झलक रही है। दर्शक को किसी विशेष कालखंड में ले जाने के लिए बहुत बारीकियो की दरकार होती है। जैसे मंगल पाण्डे में उस दौर की ब्रिटिश रायफल का सही लुक और आवाज के बारे में जानने के लिए आमिर खान और निर्देशक केतन मेहता ने लन्दन के एक म्यूजियम का दौरा किया और उसके बाद ही मंगल पांडे की बगावत में सुनाई देने वाली गोलियों की गूंज असली जैसी ही लगी। हम बीते समय में वापास तो नहीं लौट सकते लेकिन ऐसी फिल्मो के जरिये उस बीते हुए काल को बेहतर ढंग से महसूस कर सकते है। याद कीजिये शंकर की फिल्म हिन्दुस्तानी के कुछ दृश्यों को। फिल्म में लगभग दस मिनट के दृश्य गुलाम भारत से सम्बंधित है। इन दृश्यों को ब्लेक एंड व्हाइट में फिल्माया गया है। मेरे ख़याल में जितना शोध और मेहनत शंकर ने इन दृश्यों में की, उतना परिश्रम बाकी फिल्म को बनाने में नहीं लगा होगा। याद कीजिये प्रियदर्शन की क्लासिक फिल्म काला पानी को। एक जबरदस्त कहानी और जबरदस्त फिल्म। एक डाक्टर को केवल इसलिए काला पानी की सजा होती है क्योकि वह एक अंग्रेज का भारतीय की पीठ का पैरदान की तरह इस्तेमाल करते देख नहीं पाता और कहता है '' इंडियन बेक इज नॉट योर फुटबोर्ड ''. ये एक संवाद डाक्टर को काला पानी पंहुचा देता है। जब कैदियों को गिनती के लिए लाया जाता है तो उस दृश्य में उस काल में इस्तेमाल होने वाला टाइपरायटर भी दिखाई देता है। कालखंड की यात्रा एक सम्मोहन है और इसे हकीकत बना देना केवल और केवल फिल्म निर्देशक के बूते की बात है।
Sunday, April 28, 2013
कालखंड की यात्रा एक सम्मोहन है
पीरियड फिल्म बनाने का आकर्षण हर दौर में फिल्मकारों को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता रहता है। कई निर्देशकों ने बेहतरीन फिल्मे बनाई तो कई अपनी गाढ़ी कमाई डूबा बैठे। भारतीय फिल्मकारों में बहुत कम नाम ऐसे हैं जिन्होंने असरदार पीरियड फिल्मो का निर्माण किया। आशुतोष गोवारिकर का नाम ऐसे फिल्मकारों में सबसे ऊपर आता है। लगान और जोधा अकबर के बाद वे निसंदेह ऐसे निर्देशक बन चुके हैं , जो किसी भी बीते कालखंड को परदे पर फिर सांसे भरते दिखा सकते हैं। यहाँ पीरियड सीरियल मालगुडी डेज का जिक्र भी जरुरी है। यदि इस सीरियल को एक फिल्म की तरह पेश किया जाता तो इसके निर्देशक शंकर नाग का नाम शायद गोवारिकर से भी पहले आता। आज मैं एक और पीरियड फिल्म लुटेरा का जिक्र करने जा रहा हूँ। बहुत जल्द प्रदर्शित होने जा रही लुटेरा के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने हैं। उन्होंने अपनी पिछली फिल्म उड़ान से दिखा दिया था कि उनके पंखो में हौसलों की उड़ान भरने का दम है. हाल ही में इसका प्रोमो देखा तो वाकई लगा कि सत्तर के दशक की किसी पुरानी फिल्म का ट्रेलर देख रहे हो। कहानी के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है लेकिन ये जरुर पता चल रहा है कि आशुतोष गोवारिकर अब अपने पीरियड क्लब में अकेले नहीं रहेंगे। इस फिल्म की एक-एक फ्रेम में आपको भारत का गुजरा कालखंड नजर आएगा। पात्रो की वेशभूषा और परिवेश से लेकर हर चीज में निर्देशक की मेहनत साफ़ झलक रही है। दर्शक को किसी विशेष कालखंड में ले जाने के लिए बहुत बारीकियो की दरकार होती है। जैसे मंगल पाण्डे में उस दौर की ब्रिटिश रायफल का सही लुक और आवाज के बारे में जानने के लिए आमिर खान और निर्देशक केतन मेहता ने लन्दन के एक म्यूजियम का दौरा किया और उसके बाद ही मंगल पांडे की बगावत में सुनाई देने वाली गोलियों की गूंज असली जैसी ही लगी। हम बीते समय में वापास तो नहीं लौट सकते लेकिन ऐसी फिल्मो के जरिये उस बीते हुए काल को बेहतर ढंग से महसूस कर सकते है। याद कीजिये शंकर की फिल्म हिन्दुस्तानी के कुछ दृश्यों को। फिल्म में लगभग दस मिनट के दृश्य गुलाम भारत से सम्बंधित है। इन दृश्यों को ब्लेक एंड व्हाइट में फिल्माया गया है। मेरे ख़याल में जितना शोध और मेहनत शंकर ने इन दृश्यों में की, उतना परिश्रम बाकी फिल्म को बनाने में नहीं लगा होगा। याद कीजिये प्रियदर्शन की क्लासिक फिल्म काला पानी को। एक जबरदस्त कहानी और जबरदस्त फिल्म। एक डाक्टर को केवल इसलिए काला पानी की सजा होती है क्योकि वह एक अंग्रेज का भारतीय की पीठ का पैरदान की तरह इस्तेमाल करते देख नहीं पाता और कहता है '' इंडियन बेक इज नॉट योर फुटबोर्ड ''. ये एक संवाद डाक्टर को काला पानी पंहुचा देता है। जब कैदियों को गिनती के लिए लाया जाता है तो उस दृश्य में उस काल में इस्तेमाल होने वाला टाइपरायटर भी दिखाई देता है। कालखंड की यात्रा एक सम्मोहन है और इसे हकीकत बना देना केवल और केवल फिल्म निर्देशक के बूते की बात है।
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