Sunday, July 12, 2015

आओ चले आठवीं सदी में खो जाए


मैं हैरान हूँ ये देखकर कि हिंदी बेल्ट में आने वाले सिनेमाघरों में जब बाहुबली प्रदर्शित हुई तो बाहर वैसा ही हंगामा और सीटियों का शोर बाहर सुनाई दे रहा था जैसा हम अक्सर सलमान खान की फिल्मों में देखते और सुनते  हैं. सम्भवत ये पहली बार हुआ है जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्म को हिंदी बेल्ट में छप्पर फाड़ सफलता हासिल हो रही है. हर दशक में एक ऐसी फिल्म तो बनती ही है कि उसका शोर बस स्टैंड पर लगी लाइन से होता हुआ पान की दुकानों और वहां से निकल कर कॉलेज कैंटीन तक पहुँच जाता है. ऐसी फिल्मों को पेड रिव्यू की जरुरत नहीं होती। हवाओं में उसका शोर होता है. बाहुबली एक ऐसी ही फिल्म है जो इस वक्त देश के लिए एक क्रेज बन गई है.

फिल्म की कहानी को आठवीं सदी में स्थापित किया गया है. भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली राज्यों में से एक महिष्मति के राजसिंहासन की लड़ाई है बाहुबली। वीर राजा बाहुबली को धोखे से मार दिया गया है और किसी तरह उसके बेटे शिवा को बचा लिया गया है. शिवा के सामने दो ही लक्ष्य है. एक तो  महिष्मति के क्रूर राजा भलाल देव को मारकर प्रजा को मुक्त करवाना और दूसरा अपनी माँ देवसेना को मुक्त करवाना। अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) राज्य के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है जबकि दूसरा भाई भल्लाल (राना डगुबत्ती) है. लेकिन साज़िशों के चलते क्रूर राजा भल्लाल का राज होता है. बाहुबली  मारा जाता है मगर उसके बेटे शिव को राजमाता एक दूसरे गांव तक छोड़ आती है जहां एक दूसरी मां उसे पालती है.

निर्देशक ने कहानी को पीरियड लुक देने के लिए बहुत मेहनत और पैसा खर्च किया है. चरित्रों को इस तरह से गढ़ा गया है कि लम्बे समय तक इन किरदारों की याद ताज़ा रहेगी। जब फिल्म हमें अपने सम्मोहन में खींच लेती है तो महसूस होता है कोई बूढ़ा साधु किसी पौराणिक गाथा का आख्यान गा रहा हो. जैसे-जैसे सीन-दर-सीन फिल्म आगे बढ़ती है, हम खुद को आठवीं सदी के खूबसूरत भारत में पाते हैं. फिल्म के सबसे सशक्त चरित्रों की बात करे तो सबसे पहले जेहन में बाहुबली (प्रभास), राजमाता (रम्या कृष्नन), कट्टप्पा( सथ्यराज) ही आते हैं. इनमे से राजमाता का किरदार दिल जीत लेता है. रम्या ने इतने आत्मविश्वास से ये किरदार निभाया है कि उनके सारे दृश्यों में और कोई कलाकार उनका सामना नहीं कर पाता। वफादार गुलाम के रूप में सथ्यराज बहुत प्रभावित करते हैं. प्रभास अपने नए किरदार में बहुत ताज़ादम नज़र आये हैं.

मगधीरा और एगा के बाद से तेलगु फिल्म निर्देशक एसएस राजमौली को हिट मशीन की संज्ञा दी जाने लगी है। बाहुबली-द बिगनिंग ने आय के तमाम कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया है। लगभग 205 करोड़ की लागत से बनी भारत की सबसे महंगी फिल्म सफलता के रथ पर रफ्तार से दौड़ रही है। राजमौली और उनकी टीम अब फिल्म निर्माण के दौरान गुजरे बुरे अनुभवों को भूल कर चैन की नींद सो सकेगी। आज भारतीय सिनेमा गर्व से कह सकता है कि उसके पास भी हॉलीवुड के स्तर की, बल्कि उससे बेहतर फिल्म बनाने की क्षमता है। महाबली का विजयगान बता रहा है कि हम फिल्म निर्माण में तकनीकी और कल्पनाशक्ति के स्तर पर और ऊंचा उठ गए है।

यदि आप 'मसान' टाइप दर्शक नहीं है और भारतीय तकनीक  से बनी बेहद खूबसूरत फिल्म देखना चाहते हैं तो बाहुबली का मज़ा आपको बड़े परदे पर लेना चाहिए। ढाई घंटे की इस कथा में आपको सुन्दर कहानी, आला दर्जे के स्पेशल इफेक्ट्स से सजे लड़ाई के दृश्य और बेहतरीन चरित्र देखने को मिलेंगे। तेलगु में बनी इस फिल्म ने पहले से सिनेमाघरों में चल रही सारी हिंदी फिल्मों को कोने में बैठा दिया है. शुक्र है 'बजरंगी भाईजान' इस हफ्ते पाकिस्तान में नहीं घुसे।




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