Friday, April 26, 2013

डैडी का यूं आशिकी हो जाना बड़ा खलता है

एक वक़्त का मशहूर गायक राहुल  जयकर अब गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है। एक रात वो आरोही को गाते हुए सुनता है तो उसे लगता है कि इस आवाज को उसका हक मिलना चाहिए। राहुल की कोशिशो के बाद आरोही अब लाइम लाइट में चौंधिया रही है, उसकी आवाज का जादू हर कही चल रहा है। सीन फिर बदलता है, राहुल को लगता है उसकी शराबनोशी आरोही के करियर में बाधा बन रही है तो वो खुद को खत्म करने का फैसला करता है। कुल जमा इतनी कहानी में मैं आखिर तक आशिकी खोजने की कोशिश करता रहा लेकिन आशिकी का एक सिरा हाथ ना आया। 1990 की आशिकी से इस फिल्म का कोई कनेक्शन नजर नहीं आता, ये तो केवल भीड़ जुटाने की कोशिश में आशिकी के नाम का इस्तेमाल किया गया है। पहले शो में दर्शको की प्रतिक्रिया जैसे फ्रीज हो चुकी थी। ढाई घंटे में दर्शक चुपचाप फिल्म झेलता है और बिना प्रतिक्रिया दिए चल देता है। हालांकि कही से एक स्वर जरुर उभरता है कि '' एंड बिगाड़ दिया यार, वर्ना फिल्म तो अच्छी थी''. फिल्म में कुछ बाते ऐसी हैं जो कहानी को अविश्वसनीय  बना देती हैं। जैसे एक प्रतिभाशाली गायक का अचानक शराबी हो जाना और बर्बाद होने के पीछे  कोई ठोस कारण नहीं दिखाया जाना   आरोही और राहुल की प्रेमकथा को तरजीह देनी है या संगीत को , इस बारे में स्पष्ट नहीं किया गया है और यह निर्देशक की बड़ी गलती मानी जाएगी। जब निर्देशक अपनी कहानी के नतीजे को दो दिशाओ में मोड़ देता है तो ऐसा ही हादसा होता है। मोहित सूरी अंत तक बता नहीं पाए की राहुल की आशिकी आरोही से थी या उसकी आवाज़ से। वे एक म्यूजिकल ड्रामा रचना चाहते थे या कि एक विशुद्ध प्रेमकथा। कुछ भी अंत तक स्पष्ट नहीं हो पाता और नतीजा एक बेदम क्लाइमेक्स के रूप में सामने आता है। निर्देशक मोहित सूरी दुखांत प्रेमी हैं।  जब उनके ये ग्रे शेड्स किसी अपराध कथा के साथ होते हैं तो दर्शक उनसे सहमत होते है लेकिन यहाँ तो उन्होंने अच्छी खासी प्रेमकथा को ही लहुलुहान कर दिया। आशिकी(1990) की कहानी भी कुछ ख़ास नहीं थी लेकिन महेश भट्ट ने उसे इस तरह बनाया था की उसके हर पहलु में केवल मासूम प्यार ही नज़र आता था.  उस कहानी में, उसके संगीत में एक अजीब सी कशिश थी। मेन लीड में आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर का चयन ठीक किया गया था। कुछ दृश्यों में वे प्यार की केमेस्ट्री दिखाने में बहुत हद तक कामयाब रहे है।हालाँकि  आदित्य अभी इस किस्म के जटिल किरदारों को निभाने की क्षमता नहीं रखते। दर्शक ध्यान से देखे तो मोहित ने महेश भट्ट की डैडी का ही आयडिया अपनी फिल्म की कहानी में इस्तेमाल किया है। डैडी(1989) में आनंद सरीन अपने जमाने का मशहूर गायक, जो शराबनोशी का शिकार होकर अपना सब कुछ गँवा बैठा है। अब अपनी बेटी को वापस पाना चाहता है। आशिकी-२ के एक सीन में  राहुल मंच के नीचे खड़ा है, काफी दिनों से शराब को ना छूने वाले आदित्य को उसका पुराना दुश्मन शराब पिलाना चाहता है, ठीक यही सीन डैडी में उस वक्त होता है जब आनंद सरीन( अनुपम खेर) को गाने से ठीक पहले एक द्दुश्मन शराब आफर करता है। इस सीन में जो कमाल अनुपम खेर ने किया, उसकी उम्मीद आदित्य से नहीं की जा सकती। डैडी का यु आशिकी होते देख ऐसा लगता है कि हम बहुत बेहतरीन समोसे की बनी भेल खा रहे हो, यहाँ डैडी  समोसा है और भेल आशिकी-2. मोहित 'डैडी' के उस यादगार सीन को यदि जस का तस भी फिल्मा देते तो ये फिल्म एक ट्रेंड सेटर बन सकती थी। 
इस फिल्म का यदि कुछ हासिल है तो इसके गीतों की सटीक सिचुएशन और फिल्मांकन और ये तो बिना थियेटर जाये भी देखा जा सकता है। कुल मिलाकर इस आशिकी के कामयाब होने के अवसर कम है, हालांकि ब्रांड नाम का इस्तेमाल कर दर्शको को थियेटर तक बुलाने में भट्ट बंधू बहुत माहिर हैं इसलिए फिल्म अपनी लागत तो आराम से वसूल कर लेगी। 

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