Tuesday, November 5, 2013

फ़िल्म समीक्षा: कृष की 'क्रेश लैंडिंग'


कहानी ' कोई मिल गया ' से शुरू हुई थी। स्टीवन स्पीलबर्ग की क्लासिक एलियन मूवी 'ईटी' का ये भारतीयकरण दर्शकों को पसंद आया तो उसके अगले भाग में कृष्णा याने कृष का जन्म हुआ। एक हॉलीवुड फ़िल्म से लिया गया सुपरहीरो का आयडिया लगातार दो फिल्मो में दर्शक को लुभाता रहा और राकेश रोशन का बैंक बैलेंस भी बढ़ाता रहा। इस दिवाली से पहले कृष तीसरी बार भरपूर आतिशबाज़ी के साथ लौटा है लेकिन रोमांच और उत्तेज़ना सिरे से नदारद है। त्यौहार की शुरूआती भीड़ छंट चुकी है और बेहद महंगी टिकट दरों के चलते कृष के लिए सौ करोड़ी क्लब का दरवाजा भी खुल चुका है। रोशन का मकसद तो पूरा हुआ लेकिन देखना होगा कि क्या वाकई फ़िल्म दर्शक को निर्मल आनद दे पाई है।

 कृष एक साइंस फिक्शन है और जाहिर है कि इस फ़िल्म को पसंद करने वाले मेरे जैसे दर्शक हॉलीवुड फिल्मे भी नियमित रूप से देखते होंगे, ये जानते हुए भी एक ऐसी फ़िल्म हमें परोसी गई, जिसमे सब कुछ यहाँ वहाँ से उठाया गया है। इसके अलावा फ़िल्म में कई ऐसी खामियां नज़र आई जो मेरे जैसे माइक्रोस्कॉपी दर्शक पचा नहीं सकते हैं। हमें उम्मीद थी कि राकेश रोशन ने कृष-2 के बाद के गुजरे छह साल तीसरे भाग को रोचक और धमाकेदार बनाने में गुजारे होंगे लेकिन फ़िल्म देखने पर ये समझ में आया कि उन्होंने बेवजह स्टंट को ज्यादा प्राथमिकता दी है, बजाय दिमागी घोड़े दौड़ने के। फ़िल्म का ओपनिंग सीक्वेंस देखकर मुझे सुपरमैन रिटर्न्स के एक सीन की याद आई, जिसमे सुपरमैन कुछ इसी तरह हवाई जहाज में सवार लोगों की जान बचाता है।

कृष की काया (कंगना रनौत )  मुझे एक्समैन सीरीज की मिस्टिक की याद दिलाती है। मिस्टिक भी किसी का रूप धर सकती है ठीक काया की तरह।' काल' मुझे हूबहू एक्समैन के मैग्नेटो की तरह लगता है। मैग्नेटो लोहे को बस में कर सकता है और उसकी मानसिक क्षमता अभूतपूर्व है। क्रिश में अपनी अजूबा ताकते पहचानने के बाद कृष्णा पारिवारिक जिंदगी जी रहा है। वह कम पढ़ा लिखा है इसलिए कभी किसी पिज्जा पार्लर में, तो कभी सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता है। लेकिन हमेशा हीरोगिरी दिखाने के चक्कर में उसकी नौकरी चली जाती है। ये सीक्वेंस हम स्पाइडरमैन सीरीज की एक फ़िल्म में देख चुके हैं। 

राकेश रोशन ने फ़िल्म में बहुत बुनियादी गलतियां की हैं। रोहित ने एक ऐसा आविष्कार किया है जिसकी मदद से किसी में भी जान डाली जा सकती है, वो अविष्कार मृत कृष्णा में जान डाल देता है, लेकिन रोहित ये नहीं बताता कि वो धुप में से ऐसा कौनसा तत्व निकाल रहा है, जो जीवनदायी है। बाद में यही 'जीवनदायी' आविष्कार खलनायक 'काल' की जान ले लेता है। इस चमत्कार का कारण भी राकेश रोशन नहीं समझा पाते। कहने का मतलब यही है कि साइंस फिक्शन में 'डिटेलिंग' बहुत जरुरी होती है। आपको आपके हर चमत्कार का कारण समझाना होता है।

राकेश रोशन के 'मानवर' बड़े मजाकिया से लगते हैं। अपनी लम्बी जुबान से आइसक्रीम चुराकर खा लेते हैं और शहर में वाइरस फ़ैलाने का काम करते हैं। फार्मा कम्पनियों को देखना चाहिए कि बीमारियो के वाइरस ऐसे भी फैलाये जा सकते हैं। हद तो उस वक्त होती है जब 'काल' से निपटने के लिए पुलिस का भारी अमला ( चार पुलिस वाले और दो वैन ) पहुँचता है। और इसके बाद यकीन आने लगता है कि राकेश रोशन सिर्फ 'स्पेशल इफेक्ट्स' के दम पर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाना चाह रहे हैं। 

 'इंडिपेंडेंस डे' फ़िल्म  में वैज्ञानिक डेविड लेविन्सन अमेरिकी राष्ट्रपति को सिलसिलेवार ढंग से समझाता है कि हम कैसे एलियंस के स्पेस शिप तक पहुंचकर उन्हें तबाह कर सकते है। ये सीन दर्शको को क्लाइमेक्स में 'जस्टिफाई' करता है कि आखिरकार वे कैसे अंतरिक्ष में जाकर अपने दुश्मन को तबाह कर आये। इन्ही छोटी छोटी बातों के अभाव में कृष एक बेढब फ़िल्म साबित होती है।

 मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि हास्यापद ढंग से रोहित मेहरा का 'बोन मेरो' निकाल लिए जाने के बाद भी वो कैसे चलता फिरता रहता है। मैंने ये फ़िल्म 250 रूपये खर्च करके देखी और सोचने लगा कि इससे बेहतर साइंस फिक्शन ' ग्रेविटी' मैं इतने पैसों में दो बार देख सकता था और वो भी थ्रीडी में। यदि आप भी मेरे जैसे साइंस फिक्शन के शौकीन हैं और क्रिष देखकर अपनी दीवाली बिगाड़ चुके हैं तो मात्र 150 रूपये में एक बार ' ग्रैविटी' देख आइये। सच कह रहा हूँ इस फ़िल्म को देखकर दीवाली शर्तिया मन सकती है। 



Thursday, October 31, 2013

फ़िल्म समीक्षा ग्रेविटी : ये गुरुत्व नहीं उसका प्यार है

अब तक अंतरिक्ष के रहस्य रोमांच पर जितनी भी फिल्मे बनी हैं, ग्रेविटी उनमे सबसे न केवल बेहतर है बल्कि इस श्रेणी की सभी फिल्मों में मील का पत्थर बनेगी, इसमें कोई शुबहा नहीं है। अजीब बात है कि जिस फ़िल्म का नाम ' ग्रेविटी' है, उसके कुल जमा दो किरदार फ़िल्म के अंत तक भारहीनता में विचरते रहते हैं।  तीन अंतरिक्षयात्री हब्बल स्पेस टेलिस्कोप की मरम्मत करने के लिए स्पेसवॉक कर रहे हैं, तभी एक चेतावनी मिलती है कि गलती से एक रुसी मिसाइल पृथ्वी के ऑर्बिट की ओर चला दी गई है। इस कारण ढेर साल स्पेस मलबा उनकी ओर खतनाक ढंग से बढ़ा चला आ रहा है। जब तक डॉ रयान स्टोन, आस्ट्रोनॉट मेट कोवास्की और स्पेस वॉक का मज़ा लूट रहा उनका एक साथी संभले, मलबे का एक ढेर उनसे आकर टकराता है। कुछ देर बाद रयान को मालूम होता है कि  हब्बल तबाह हो चुकी है और अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचना लगभग असम्भव है।

 आक्सीजन लेवल निम्नतम  स्तर पर है और ऊपर से शांत, एकाकी अंतरिक्ष डरावने सन्नाटे के साथ उन्हें निगलने पर आमादा है. निर्देशक अल्फोंसो कुएरान ने अपनी कथा के नायकों के लिए असम्भव परिस्तिथियाँ गढ़ी हैं। सभी जानते हैं कि पृथ्वी से 600 किमी ऊपर ओज़ोन परत के पास यदि कोई दुर्घटना घट जाये तो बचे संसाधनों को जुटाकर खुद को ईश्वर भरोसे छोड़ देने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता। हमारे घर का टीवी ठीक चले या हमें मौसम की जानकारी ठीक-ठाक मिले, इन छोटी-छोटी बातों के लिए आस्ट्रोनॉट हर पल जान जोखिम में डालते हैं।

 ये फ़िल्म उन साहसी अंतरिक्ष यात्रियों को मुस्तैदी से ठोंका गया सलाम है। तमाम अंतरिक्ष अभियानों का मकसद केवल हमारी पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों की देखभाल से कही ऊँचा है। आज विज्ञान की इतनी उन्नति के बाद भी कोई अंतरिक्ष अभियान जान न जाने की गारंटी नहीं दे सकता। ग्रेविटी के डेढ़ घंटे का सफ़र अत्यंत रोमांचक और सांस रुक जाने जैसा अहसास है। विज्ञान के ऐसे साहसिक अभियानो में रूचि रखने वाले दर्शको को ये अनुभव थ्रीडी में लेना चाहिए।


आमतौर पर आम साइंस फिक्शन में कोई एलियन सामने आ जाता है या फिर कोई उल्का पिंड तेज़ी से पृथ्वी की ओर बढ़ रहा होता है लेकिन ग्रेविटी में कुल जमा दो किरदार है जिन्हे जॉर्ज क्लूनी और सेंड्रा बुलाक ने निभाया है।  दोनों के सामने खलनायक  वो परिस्थितियां हैं, जिनसे पार पाना लगभग असम्भव ही है। सम्भव है कल्पना चावला और उन तमाम अंतरिक्ष यात्रियो ने भी ऐसे ही खतरे का सामना किया हो और एक स्तर पर पहुंचकर खुद को बेबस पाया हो।

एक सीन है जिसमे सेंड्रा बुलाक को सेटेलाइट के केप्सूल में बैठ कर 100 किमी की दुरी तय करनी है लेकिन पॉवर ऑन नहीं हो रहा। इस सीन में बुलाक बुरी तरह झल्ला रही है लेकिन केमरा जैसे ही अंतरिक्ष पर फोकस होता है, एक ख़ामोशी छा जाती है। इस सीन का करने से पहले बुलाक को वाकई अकेले 18 घंटे बिताने पड़ते थे ताकि शूटिंग में अकेलेपन का तनाव उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आये। बुलाक ने वाकई इस भूमिका के लिए बहुत समर्पण दिखाया है।


जॉर्ज क्लूनी ने एक ऐसे आस्ट्रोनॉट की भूमिका निभाई है जो घबराई स्टोन का मार्गदर्शक बन जाता है। बेहद ही मार्मिक दृश्य है कि मेट धीमे-धीमे स्टोन से दूर होता जा रहा है और उसकी ऑक्सीजन ख़त्म होती जा रही है। ऑक्सीजन के आखिरी कतरो में भी वह स्टोन को बताता जाता है कि  अब उसे आगे का सफ़र कैसे तय करना है। थ्रीडी की तकनीक  कैसे कलाकार की संवेदनाओ को आप तक पहुंचा देती है इसका खुबसूरत उदाहरण एक सीन में देखने को मिलता है। स्टोन केप्सूल में बैठी रो रही है, उसके नमकीन आंसू  चारो ओर बिखर रहे हैं और उनमे से एक आंसू बहता हुआ हमारी आँखों के बहुत करीब आ जाता है। हर आस्ट्रोनॉट जानता है कि ऑर्बिट में प्रवेश उसके पुरे सफ़र का सबसे महत्वपूर्ण और खतरनाक हिस्सा होता है। स्टोन की धरती पर वापसी को निर्देशक ने बहुत सच्चाई के साथ फिल्माया है।

और अंत में
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अपनी आखिरी साँसों को समेट कर मेट स्टोन से कहता है '' यदि तुम स्पेस स्टेशन तक पहुंचने में कामयाब हो गई तो पृथ्वी पर वापसी पर तुम गंगा के किनारों से सूरज उगता देखोगी।'' जब स्टोन वापस लौटती है तो गंगा के किनारो से निकलता सूरज एक विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। उस वक्त स्टोन को ग्रेविटी का असल मतलब समझ में आता है।

'' धरती जानती है कि उसकी गोद से निकलने के बाद
गहन अन्धकार और अथक सूनापन छाया है
चहुँ ओर बस ख़ामोशी और अन्धकार का राज
और इसीलिए ......
रोक लेती है वो दूर जाने वालो को
शायद ये गुरुत्व नहीं उसका प्यार है''






Saturday, October 19, 2013

सिग्नेचर ट्यून में शिव का तांडव

 राजेश रोशन ने अपने लम्बे करियर में अधिकांश फिल्मे अपने भाई के साथ ही की हैं। एक बार फिर वे कृष-3 का संगीत लेकर हाज़िर हुए हैं और महसूस हो रहा है कि लम्बे वक्त के बाद संगीत प्रेमी झूम भी सकते हैं और मदहोश भी हो सकते हैं। राजेश ऐसी श्रेणी के संगीतकार हैं, जो फिल्म का मिजाज़ समझने के बाद ही काम शुरू करते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल,  खय्याम,  ए आर रहमान की तरह अपना काम शुरू करने से पहले इस तरह की 'थिंकिंग प्रोसेस ' में चले जाते हैं। कृष की तीसरी किश्त के गीत मैंने कई बार सुने और इस नतीजे पर पहुंचा कि इस दिवाली संगीत के आकाश पर केवल कृष की सुरीली आतिशबाजी की ही धूम रहने वाली है। चूँकि रहमान की राँझना के बाद फिर से यो यो टाइप के बरसाती गीतों का चलन बढ़ने लगा था लेकिन राजेश रोशन के गीतों ने नकली सोने की चमक को फीका कर दिया है।  मिसाल के तौर पर बेशर्म और बॉस के गीत इसके सामने कही दौड़ में नज़र ही नहीं आ रहे हैं।  कृष के  केवल दो गीत ही फ्लोर पर आये और समझ में आ गया कि दो मिनट के नूडल्स और छप्पन भोग बनाने में कितना फर्क है।  कोई मिल गया और कृष का संगीत सुपरहिट रहा था। दोनों के संगीत को देखे तो कहानी बदलने के साथ संगीत का मिजाज़ भी बदल जाता है। तीसरे भाग में भी आपको कृष की झलक जरुर मिलेगी लेकिन गा
नों में बिलकुल नयापन है और इसकी वजह ये भी है कि दो फिल्मों के बाद अब कृष की कहानी ' डार्केस्ट ऑवर ' में प्रवेश कर रही है।  सबसे पहले मैं ' दिल तू ही बता ' का जिक्र करना चाहूँगा। रोमांटिक गीत हमेशा ठहराव वाले होने चाहिए, यदि उनमे बेवजह गति डाल दी जाये तो सारा रोमांस खत्म हो जाता है। इस गीत में बेहतरीन बीट्स होने के साथ अजीब सा ठहराव है, जो अच्छा लगता है। नीरज श्रीधर और मोनाली ठाकुर ने इसे गाते समय अभिनय पक्ष का खासा ध्यान रखा है। समीर अनजान ने आसान  शब्दों का इस्तेमाल करते हुए शायरी की है और नतीजे भी अच्छे रहे हैं। इसमें नीरज की आवाज का 'थ्रो' जबरदस्त इफेक्ट पैदा करता है। जब इसे परदे पर देखते हैं तो सुनने का मज़ा और बढ़ जाता है। 'रघुपति राघव' एक फ़ास्ट ट्रेक है।  अभी ये गीत सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। गाँधीजी के एक भजन को एक पार्टी गीत में उन्होंने बखूबी तब्दील कर दिया है। मूलतः ये गीत विजुअल ज्यादा है क्योकि इसमें ऋतिक का जबरदस्त डांस रखा गया है। 'गॉड अल्लाह और भगवान' मुझे बहुत पसंद आया। शायद ये गाना फिल्म में क्लाइमेक्स में डाला गया है। गाना सुनते हुए लगता है जैसे कोई महानायक निर्णायक लड़ाई पर जाने की तैयारी में है। पिछली फिल्म में जब कृष को अपनी ताकतों का अंदाज़ा हुआ था तो उस पल के लिए राजेश रोशन ने एक ख़ास टुकड़ा तैयार किया था। ये म्यूजिकल पीस इस फिल्म को कृष के  पुराने संस्करणों से जोड़ता है। इस करिश्माई टुकड़े को वे निश्चित रूप से फिल्म के अंत में प्रयोग करेंगे। कुछ संगीत सृजन फिल्मो के नायको से इस कदर जुड़ जाते हैं कि उसे अमुक नायक की सिग्नेचर ट्यून कहा जाने लगता है। उदाहरण के तौर पर सुपरमैन का इंट्रो म्यूजिक हो या फिर मिशन इम्पॉसिबल का थीम म्यूजिक। जो सभी फिल्मो में एक सा रहता है, नायक की पहचान बनकर। मुझे इस सिग्नेचर ट्यून में शिव का तांडव नज़र आता है।
अंत में 
 'गॉड अल्लाह और भगवान' सुनते समय आपको अहसास होगा कि इस समय सारे भारत की मनोदशा यही है कि देश की नाव में छेद कर रहे घोटालो के महादानवो को कोई महानायक आकर सबक सिखा दे। और हम किसी दाढ़ी वाले में वो महानायक देख भी रहे है। कितना अजीब संयोग है कि कृष की वापसी के साथ देश में भी एक नए युग के आरम्भ के संकेत हम देख रहे हैं और क्या ये भी अजब संयोग नहीं कि इस गीत की ये पंक्तिया भी उसी मनोदशा को उजागर करती है। '' वो तुझमे भी है। वो मुझमे भी है, कही ना कही वो हम सब में है, सबमे वो छुपा है उसे पहचान ले, उसका जो इरादा है वो हम ठान ले 



Friday, August 9, 2013

फिल्म समीक्षा : पटरी से उतरी चेन्नई (राहुल) एक्सप्रेस

'' मैं राहुल हूं, नाम तो सुना होगा''। ये संवाद १९९५ में दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे और १९९८ में दिल तो पागल है में हम सभी ने सुना है। तब से लेकर अब तक ये राहुल नाम का किरदार  शाहरूख खान की परछाई बन गया।  किसी भी फिल्म में वे किसी भी किरदार में हो, परछाई राहुल की ही होती है। अपनी महात्वाकांक्षी होम प्रोडक्शन फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में भी शाहरूख राहुल के किरदार में पेश होते हैं। कहानी कुछ यूं है कि राहुल अपने दादाजी जो जिंदगी की सेंचुरी पूरी नहीं कर पाते, एक मैच देखते हुए सचिन के ९९ रन पर आउट होना उन्हें जिंदगी से आउट कर देता है। दादाजी की अस्थियां लेकर ४० साल का अविवाहित राहुल रामेश्वरम की ओर रूख करता है। किस्मत उसे चेन्नई एक्सप्रेस में पहुंचा देती है और ये सफर उसे अपनी हमसफर से मिलाता है। कहानी सुनकर कई फिल्में जेहन में उमड़ जाती हैं। इस फिल्म को देखते हुए कई बार मुझे भ्रम हुआ कि मैं तमिल में सन ऑफ सरदार देख रहा हूं या जब वी मेट के सफर को चेन्नई में घटते देख रहा हूं। वाकई यदि सन ऑफ सरदार के सारे सरदारों को हटाकर उनकी जगह मुस्टंडे तिलकधारी दक्षिण भारतीय पहलवानों को रख दिया जाए तो भी कहानी में कुछ ज्यादा फर्क नहीं आएगा। निर्देशक रोहित शेट्टी कहानी की शुरुआत तो बहुत माहिर खिलाड़ी की तरह करते हैं लेकिन बीस मिनट बाद ही हमें गोलमाल, बोल बच्चन और सिंघम की उबकाइयां आने लगती है। वैसे भी बहुत ज्यादा फिल्में करके और एक जैसे गाड़ी उड़ाऊ फार्मुले दिखाकर वे खतरे की सीमा को पहले ही पार कर चुके हैं। चेन्नई एक्सप्रेस उनके और शाहरूख खान के लिए एक अवसर था, जिसका सही लाभ उठाकर वे खुद को कुछ और समय के लिए स्थापित कर सकते थे। शाहरूख खान हर सीन में एक से नजर आते हैं और छोटे से छोटे सीन, जिनके लिए केवल आंखों की पुतलियां घुमाने से ही काम हो जाता, वहां भी उन्होंने बेवजह उर्जा उड़ेली है। इसका नतीजा ये होता है कि वे अधिकांश दृश्यों में ओवर एक्टिंग का शिकार हुए हैं। वे राहुल के किरदार में इतने टाइप्ड हो चुके हैं कि नए किरदार के लिए प्रयोग ही नहीं करना चाहते। थिएटर में फिल्म चलती रहती है और एक अजीब सी खामोशी के साथ बिना प्रतिक्रिया के दर्शक फिल्म देखता चला जाता है। इसका मतलब साफ है कि दर्शक आपकी फिल्म के साथ जुड़ ही नहीं पाया है। जब तक है जान के बाद शाहरूख दूसरी बार अपने प्रशंसकों को निराश करते हैं। जन्नत में रहने वाले इस बादशाह के तरकश में क्या इतने ही तीर बचे थे। चक दे इंडिया की सफलता के बाद ही ये संकेत मिल गए थे कि उन्हें अब इसी तरह की चरित्र भूमिकाओं में प्रस्तुत होना चाहिए लेकिन उन्होंने अपना राहुल चोगा फिर भी नहीं छोड़ा, नतीजा चेन्नई एक्सप्रेस की रफ़्तार  से हम रोमांचित नहीं होते। अपने से चार गुना बड़े पहलवान को लहुलुहान राहुल जब उछल-उछल कर मारता है, तो कोई तालियां नहीं बजती, क्या शाहरूख को मालूम नहीं कि बाजीगर का जमाना अब बीत चुका है। राहुल और रोहित शेट्टी की गलतियों के बावजूद हिचकोले लेती ये चेन्नई एक्सप्रेस यदि थोड़ा बहुत मनोरंजन भी करती है तो उसका श्रेय दीपिका पादुकोण को मिलना चाहिए। एक दक्षिण भारतीय लडक़ी की भूमिका को वे इतनी विश्वसनीयता के साथ जीती हैं कि सामने खड़े सुपरस्टार भी मात खाते हैं। इसे ही तो अदाकारी कहते हैं। पिछली बार निभाए किरदार के प्रभाव से मुक्त होकर नए किरदार में जान डाल देना। रोहित शेट्टी और शाहरूख को ये भ्रम है कि अपनी फिल्म में जरूरत से ज्यादा इडली और सांभर डालने से फिल्म दक्षिण भारतीय सर्किट में चल जाएगी। शायद शाहरूख को ये नहीं मालूम कि अब दक्षिण भारतीय सिनेमा लुंगी डांस से बहुत आगे बढ़ चुका है और उनका दर्शक वर्ग भी पहले से प्रबुद्ध हुआ है। आप सिर्फ लुंगी डांस करके और रजनीकांत की फोटो दिखाकर उस दर्शक की निष्ठा नहीं लूट सकते। फिलहाल यही कहना होगा कि स्टेशन से रफ्तार में निकली चेन्नई एक्सप्रेस कुछ दूर जाकर पटरी से उतर जाती है। भारी भरकम बजट वाली इस  फिल्म का  सुपरहिट होना तो बहुत मुश्किल दिखाई दे रहा है, शायद शाहरुख़ की पिछली फ्लॉप फिल्म रॉ वन का भूत फिर जिन्दा हो गया है, जिसने चलती  चेन्नई एक्सप्रेस की  जंजीर खींच दी, अफसोस।

Tuesday, July 30, 2013

फटने लगे हैं प्रचार बम

इन दिनों रोहित शेट्टी की आगामी फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' के प्रचार बम टीवी चैनलो और दुसरे प्रसार माध्यमों पर तेज़ी से फटने लगे हैं क्योकि फिल्म जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है। यही हाल प्रकाश झा की आगामी फिल्म के प्रचार का भी हो रहा है। ''कहाँ से लाई ऐसी बोकवास डिक्शनरी'', पहल बार सुनकर हंसी आई थी, दूसरी बार केवल मुस्कराहट आई और अब तो ये संवाद प्रकट होते देख उँगलियाँ  खुद ब खुद म्यूट के बटन की ओर बढ़ जाती है। भगवान  जाने फिल्म देखते समय क्या होगा। अपनी फिल्म के बारे में दर्शकों को बताने के लिए प्रचार बहुत जरुरी है लेकिन कई बार प्रचार की अति फिल्म की सेहत के लिए तकलीफदेह बन जाती है। अतीत में जाए तो केवल हाथ से बने पोस्टर भी दर्शक को टाकिज तक लिवा लाते थे। बाद में रेडियो और ट्रेलर के माध्यम से फिल्मों का प्रचार होने लगा। अब तो हर छोटी बड़ी फिल्मो के बजट में एक हिस्सा पब्लिसिटी के लिए अलग से रखा जाता है। ये बहुत उबाऊ हो गया है कि हर बड़ी-छोटी फिल्म की स्टार कास्ट चैनलों में जमा होकर जुगाली करती है और साथ ही चलते हैं फिल्म के प्रोमो। क्या इन हथकंडों से फिल्म को बेचा जा सकता है। यहाँ हमें अति, केवल प्रचार में ही नहीं बल्कि फिल्म निर्देशकों के काम में भी दिखाई पड़ रही है। रोहित शेट्टी गोलमाल फिल्म  से गाड़ियाँ उडाये जा रहे हैं और पिछली फिल्म बोल बच्चन में गाड़ियां उड़ाने की अधिकतम सीमा पार कर चुके हैं। सौ सौ बदमाशो से अकेले लड़ने वाले हिम्मतवाला का बॉक्स ऑफिस पर क्या हाल हुआ, बताने की जरुरत नहीं। ऐसे स्टंट एक्स्ट्रा एडिशन का काम करते हैं यानि कि  केक पर चेरी की तरह फिल्म  की शोभा बढाते हैं, लेकिन सोचिये केक पर चेरी ही चेरी नज़र आये तो क्या होगा। यही हाल रोहित शेट्टी का भी है, सफलता के रथ पे सवार शेट्टी का घोडा भी बार बार उसी मोड़ से गुजरते हुए थक रहा होगा। जब निर्देशक खुद को दोहराने लगता है और प्रयोगधर्मी नहीं रहता तो बॉक्स ऑफिस पर दुर्घटना होने की पूरी गुंजाईश होती है। बॉक्स ऑफिस का बेलगाम घोडा कोई नहीं साध पाया है, ये बात और है कि उसकी पीठ पर सवार  होते ही सबसे पहले होश और जोश दोनों ही गुम  हो जाते हैं। प्रकाश झा को पहली व्यावसायिक सफलता गंगाजल से मिली। वो एक बेहतरीन फिल्म थी, जो मनोरंजक होने के  साथ बिहार के हालात को करीब से दिखाती थी। पहली बार उनके नायक को दर्शक ने खुले दिल से स्वीकारा। यहाँ से प्रकाश झा दोहराव के शिकार हो गए। उन्होंने ग्लेमर का चोला  ओढ़ लिया, उनकी हर फिल्म में स्टार नज़र आने  लगे। राजनीति फिल्म सफ़ल रही तो उसकी विषय वस्तु  और कहानी की वजह से , न कि रणबीर कैटरीना की मार्केट वेल्यु से। प्रकाश झा को लगता है कि सितारों का सहारा लेने से वे  बॉक्स ऑफिस पर सेफ रहेंगे। प्रकाश झा भी उसी घोड़े की सवारी कर रहे हैं, जिस पर जेपी दत्ता, मेहुल कुमार, अनिल शर्मा जैसे नामचीन निर्देशक सवार हो चुके हैं। प्रकाश झा कहते हैं उनकी फिल्म सत्याग्रह अन्ना आन्दोलन पर आधारित नहीं है लेकिन हम सब जानते हैं कि उनकी फिल्म का चारा दरअसल 'अन्ना अगेंस्ट करप्शन' ही है। तो यदि हम फिल्म का प्रदर्शन पूर्व आकलन करे तो पाएंगे कि उनकी फिल्म देखने के लिए दर्शक उत्साहित नहीं हैं।अन्ना आन्दोलन बिना किसी नतीजे के समाप्त हो चुका है। जो उमंग उस वक्त देश में जागी थी वो अब नज़र नहीं आ रही है। देश बदलने के लिए अन्ना अब भी बिना रुके चल रहे हैं लेकिन उनके कथित फालोअर्स (जिनमे मैं भी शामिल हूँ) नदारद हैं। अब देश की उम्मीदे इकठ्ठा होकर गुजरात के चुम्बक से जा चिपकी हैं और समर्थन के नाम पर अन्ना के हाथ खाली है। ऐसे में सत्याग्रह के लिए उत्सुकता नहीं दिखाई दे रही है। एक बुझी हुई चिंगारी को बॉक्स ऑफिस पर हवा देना बहुत मुश्किल काम होगा, जब ये जवानी है दीवानी और भाग मिल्खा भाग के प्रदर्शन के बाद बॉक्स ऑफिस का मिजाज सतरंगी हो गया हो । 








Monday, July 22, 2013

आग उगलता है लेकिन मीनिंगलेस है


आज तक पर एक कार्यक्रम दिखाया जाता है, 'सीधी बात'। पहले इस शो को प्रभु चावला संचालित किया करते थे और अब युवा राहुल कंवल इस शो को एक्स्ट्रा हॉट बनाए हुए हैं। एक्स्ट्रा हॉट इसलिए क्योंकि प्रभु चावला के जमाने से इस शो का एक ही मकसद रहा है कि मेहमान को अपने शब्द बाणों से कैसे विचलित किया जाए। आज भी यह शो अपनी इस खासियत को नहीं भूला है। कल राहुल कंवल ने सीधी बात में एनडीए के नेता सुब्रमण्यम स्वामी को सवालों के घेरे में लिया। कुछ ही देर में पता चल गया कि राहुल केवल अनर्गल सवालों और छींटाकशी से शो की गरमाहट बनाए रखने की व्यर्थ कोशिश कर रहे हैं। अब सवालों की बानगी देखिएं खुद ही समझ जाएंगे कि राहुल कंवल कैसे बेसिर पैर के सवाल अपने कार्यक्रम में करते हैं। उन्होंने पूछा गुजरात में २००२ के दंगों का प्रभारी कौन था। शालीनता से परे जाकर पूछे गए इस सवाल पर बेहिचक सुब्रमण्यम ने दूसरा सवाल जड़ दिया कि १९८४ के दंगों का प्रभारी कौन था। नहले पर दहला पड़ता देख राहुल फौरन दूसरे सवाल पर शिफ्ट हो गए। राहुल बस किसी न किसी तरह सुब्रमण्यम को सवालों के चक्रव्यूह में उलझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन सुब्रमण्यम ने भी राहुल के हर सवाल का बखूबी जवाब दिया और ऐसा करते हुए वे राहुल से ज्यादा शालीन भी नजर आ रहे थे। अतीत में जाए और याद करे प्रभु चावला को, कैसे सवालों के तीखे डंक मेहमानों को तिलमिला दिया करते थे और अब राहुल ने अपनी आक्रमकता में और इजाफा कर दिया है। अब तो वे स्क्रीन पर ऐसे बरताव करते हैं जैसे स्कूल में शिक्षक बच्चों से होमवर्क न करने का कारण पूछ रहा हो। मेरा राहुल से एक ही सवाल है कि क्या अपने प्रस्तुतिकरण में बेवजह आक्रमकता दिखाने से शो का मकसद हल होता है। जब आप शालीनता पार करने लगते हैं तो शो देख रहे दर्शकों के लिए विलेन मेहमान नहीं बल्कि आप बन जाते हैं। हिंदुस्तान में कई सालों से एक परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई है, तमाशा देखने के लिए रास्ते में रूक जाना। पहले ये काम जादू दिखाने वाले किया करते थे और अब ये तमाशा न्यूज चैनल वाले दिखा रहे हैं। इस तमाशे और उस तमाशे में कोई फर्क नहीं है। दोनों ही भीड़ जुटाने के लिए करतब कर रहे हैं। पत्रकारिता का ये नया चेहरा आग तो उगलता है लेकिन मीनिंगलेस है। ऐसा सेंसलेस एग्रेशन कर वे दिखाते हैं कि वैश्विक मीडिया की तुलना में वे अब भी सीखने की प्रक्रिया में है। किसी राजनेता या अभिनेता से बात करते समय वे भूल जाते हैं कि सामने की सीट पर बैठा व्यक्ति उनका अतिथि है। राहुल एक जिम्मेदार पत्रकार हैं और जिस सीट पर बैठ वे सवाल दागते हैं वो बहुत धैर्य और शालीनता की मांग करती है लेकिन राहुल अपनी कुर्सी की मांग पूरी नहीं करते। जब वे नरेंद्र मोदी को दंगों का प्रभारी बता रहे थे, उस वक्त देश के करोड़ों दर्शक उन्हें देख रहे थे। उनमें से अधिकांश की राय थी कि आप सवाल पूछते समय न्यायपरक नहीं रहते। 

Wednesday, July 17, 2013

हर शुक्रवार हलाल होती है ये मुर्गी

आज के दौर में फिल्में जिस तरह हिट करवाई जा रही हैं, उसे देख दिल्ली के उन ठगों की याद आ जाती है, जो आंखों के नीचे से काजल चुरा लेते हैं और खबर तक नहीं होती। जो नए-नए दिल्ली जाते हैं, उनमें से कई कैल्क्यूलेटर की ठगी का शिकार जरूर हुए होंगे। एक ठग हाथ में ब्रांडेड कंपनी का कैल्क्यूलेटर हाथ में लिए ग्राहकों को बुलाता है।  हाथ में कैल्क्यूलेटर लेकर देखा, अच्छा लगा। कीमत भी अच्छी लगी तो खरीद लिया। घर आकर जब पैकेट खोला तो देखा कैल्क्यूलेटर की जगह एक पतला सा लकड़ी का टुकड़ा मुंह चिढ़ा रहा है। मुझे ही नहीं हजारों दर्शकों को लुटेरा देखने के बाद दिल्ली के वे ठग जरूर याद आए होंगे। आजकल फिल्म उद्योग में एक नई परंपरा चल पड़ी है, दर्शक को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझने की परंपरा। कहावत में तो ये मुर्गी केवल एक ही बार कटती है, लेकिन फिल्म उद्योग के कुछ शातिर खिलाड़ी इन मुर्गियों को हर शुक्रवार हलाल करने का हुनर रखते हैं। ये बात सिर्फ  लुटेरा ही नहीं बल्कि इस साल प्रदर्शित हुई कई फिल्मों के बारे में कही जा सकती है। आप हर हफ्ते कैसे हलाल होते हैं, इसे समझने के लिए फिल्म उद्योग के कुछ सयानों के कुटिल अर्थशास्त्र को समझना भी जरूरी है। जब किसी फिल्म की योजना बन रही होती है तो ऐसे निर्माताओं की अचूक नजर केवल मुनाफे पर टिकी होती है। पहले फिल्म का बजट तय किया जाता है और उसके हिसाब से प्रचार अभियान पर पैसा खर्च किया जाता है। इसके बाद कोशिश होती है कि देश के थिएटर्स की ज्यादा से ज्यादा बुकिंग उन्हें मिल जाए। इसके बाद तय होता है सेटेलाइट्स अधिकार बेचने का काम। यह काम आजकल सुबह के नाश्ते की तरह फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही निपटा लिया जाता है। एक बार फिल्म बिक गई तो थिएटर्स में लागत निकलने की पूरी संभावना बन जाती है। इसके बाद उनकी नजर प्रदर्शन के पहले हफ्ते पर टिकी होती है। जितने ज्यादा शो, उतना ज्यादा मुनाफा। कोशिश यही की जाती है कि पहले तीन दिन फिल्म का हिट होने का ऐसा नगाड़ा पीटो कि दर्शक टिकट खरीद ले, उसके बाद की जिम्मेदारी वे नहीं लेते। वे तो लुटेरा की झूठी हिट की बैश पार्टी थ्रो करते हैं और कैमरों की क्लिक-क्लिक के बीच शान से अपनी बकवास फिल्म को हिट बताते शरमाते भी नहीं। हां वे व्यावसायिक रूप से सफल रहे हैं लेकिन दर्शक के दिल से उतने ही उतरते जा रहे हैं। आज थिएटर में  फिल्म देखना मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए आसान नहीं रह गया है, इसके लिए महीने का बजट में से जगह निकालनी पड़ती है और उस पर लुटेरा जैसी फिल्मों का सितम हो तो वो किससे शिकायत करे। कभी फिल्म उद्योग में फिल्में दिल से बनाई जाती थी इसलिए दिल में बस जाती थी लेकिन अब ज्यादातर फिल्मकारों का मकसद दिल में बसना नहीं रह गया है। अब उनके लिए सौ करोड़ी क्लब ज्यादा मायने रखने लगा है। सलमान खान की दबंग-२ एक निहायत घटिया फिल्म थी और पहले वाली दबंग के सामने उसका कोई मुकाबला नहीं था। अरबाज खान ने फिल्म को इस तरह बेचा कि फिल्म ब्लॉकबस्टर हो गई। और जब ऐसी घोर निराशा में भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्म आती है तो एक बार फिर फिल्म उद्योग में मेरा भरोसा कायम होने लगता है। लुटेरा से कही ज्यादा बजट की ये फिल्म प्रचार-प्रसार की बैसाखियों की मोहताज नहीं है। लुटेरा को जब आप खुद हिट कहने लगते हैं और प्रदर्शन के एक हफ्ते बाद ही पार्टी देकर फिल्म को हिट बताने की कोशिश करते हैं तो दूर कही टीवी पर देख रहा दर्शक मन ही मन सोचता है कि यदि आप लुटेरा उसे थाली में पेश कर परोसने जाते और उसके चखने तक वही रूकते तो वो आपको बताता कि असली आलोचना किसे कहते हैं।