राजेश रोशन ने अपने लम्बे करियर में अधिकांश फिल्मे अपने भाई के साथ ही की हैं। एक बार फिर वे कृष-3 का संगीत लेकर हाज़िर हुए हैं और महसूस हो रहा है कि लम्बे वक्त के बाद संगीत प्रेमी झूम भी सकते हैं और मदहोश भी हो सकते हैं। राजेश ऐसी श्रेणी के संगीतकार हैं, जो फिल्म का मिजाज़ समझने के बाद ही काम शुरू करते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, खय्याम, ए आर रहमान की तरह अपना काम शुरू करने से पहले इस तरह की 'थिंकिंग प्रोसेस ' में चले जाते हैं। कृष की तीसरी किश्त के गीत मैंने कई बार सुने और इस नतीजे पर पहुंचा कि इस दिवाली संगीत के आकाश पर केवल कृष की सुरीली आतिशबाजी की ही धूम रहने वाली है। चूँकि रहमान की राँझना के बाद फिर से यो यो टाइप के बरसाती गीतों का चलन बढ़ने लगा था लेकिन राजेश रोशन के गीतों ने नकली सोने की चमक को फीका कर दिया है। मिसाल के तौर पर बेशर्म और बॉस के गीत इसके सामने कही दौड़ में नज़र ही नहीं आ रहे हैं। कृष के केवल दो गीत ही फ्लोर पर आये और समझ में आ गया कि दो मिनट के नूडल्स और छप्पन भोग बनाने में कितना फर्क है। कोई मिल गया और कृष का संगीत सुपरहिट रहा था। दोनों के संगीत को देखे तो कहानी बदलने के साथ संगीत का मिजाज़ भी बदल जाता है। तीसरे भाग में भी आपको कृष की झलक जरुर मिलेगी लेकिन गा
अंत में
'गॉड अल्लाह और भगवान' सुनते समय आपको अहसास होगा कि इस समय सारे भारत की मनोदशा यही है कि देश की नाव में छेद कर रहे घोटालो के महादानवो को कोई महानायक आकर सबक सिखा दे। और हम किसी दाढ़ी वाले में वो महानायक देख भी रहे है। कितना अजीब संयोग है कि कृष की वापसी के साथ देश में भी एक नए युग के आरम्भ के संकेत हम देख रहे हैं और क्या ये भी अजब संयोग नहीं कि इस गीत की ये पंक्तिया भी उसी मनोदशा को उजागर करती है। '' वो तुझमे भी है। वो मुझमे भी है, कही ना कही वो हम सब में है, सबमे वो छुपा है उसे पहचान ले, उसका जो इरादा है वो हम ठान ले
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