इन दिनों रोहित शेट्टी की आगामी फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' के प्रचार बम टीवी चैनलो और दुसरे प्रसार माध्यमों पर तेज़ी से फटने लगे हैं क्योकि फिल्म जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है। यही हाल प्रकाश झा की आगामी फिल्म के प्रचार का भी हो रहा है। ''कहाँ से लाई ऐसी बोकवास डिक्शनरी'', पहल बार सुनकर हंसी आई थी, दूसरी बार केवल मुस्कराहट आई और अब तो ये संवाद प्रकट होते देख उँगलियाँ खुद ब खुद म्यूट के बटन की ओर बढ़ जाती है। भगवान जाने फिल्म देखते समय क्या होगा। अपनी फिल्म के बारे में दर्शकों को बताने के लिए प्रचार बहुत जरुरी है लेकिन कई बार प्रचार की अति फिल्म की सेहत के लिए तकलीफदेह बन जाती है। अतीत में जाए तो केवल हाथ से बने पोस्टर भी दर्शक को टाकिज तक लिवा लाते थे। बाद में रेडियो और ट्रेलर के माध्यम से फिल्मों का प्रचार होने लगा। अब तो हर छोटी बड़ी फिल्मो के बजट में एक हिस्सा पब्लिसिटी के लिए अलग से रखा जाता है। ये बहुत उबाऊ हो गया है कि हर बड़ी-छोटी फिल्म की स्टार कास्ट चैनलों में जमा होकर जुगाली करती है और साथ ही चलते हैं फिल्म के प्रोमो। क्या इन हथकंडों से फिल्म को बेचा जा सकता है। यहाँ हमें अति, केवल प्रचार में ही नहीं बल्कि फिल्म निर्देशकों के काम में भी दिखाई पड़ रही है। रोहित शेट्टी गोलमाल फिल्म से गाड़ियाँ उडाये जा रहे हैं और पिछली फिल्म बोल बच्चन में गाड़ियां उड़ाने की अधिकतम सीमा पार कर चुके हैं। सौ सौ बदमाशो से अकेले लड़ने वाले हिम्मतवाला का बॉक्स ऑफिस पर क्या हाल हुआ, बताने की जरुरत नहीं। ऐसे स्टंट एक्स्ट्रा एडिशन का काम करते हैं यानि कि केक पर चेरी की तरह फिल्म की शोभा बढाते हैं, लेकिन सोचिये केक पर चेरी ही चेरी नज़र आये तो क्या होगा। यही हाल रोहित शेट्टी का भी है, सफलता के रथ पे सवार शेट्टी का घोडा भी बार बार उसी मोड़ से गुजरते हुए थक रहा होगा। जब निर्देशक खुद को दोहराने लगता है और प्रयोगधर्मी नहीं रहता तो बॉक्स ऑफिस पर दुर्घटना होने की पूरी गुंजाईश होती है। बॉक्स ऑफिस का बेलगाम घोडा कोई नहीं साध पाया है, ये बात और है कि उसकी पीठ पर सवार होते ही सबसे पहले होश और जोश दोनों ही गुम हो जाते हैं। प्रकाश झा को पहली व्यावसायिक सफलता गंगाजल से मिली। वो एक बेहतरीन फिल्म थी, जो मनोरंजक होने के साथ बिहार के हालात को करीब से दिखाती थी। पहली बार उनके नायक को दर्शक ने खुले दिल से स्वीकारा। यहाँ से प्रकाश झा दोहराव के शिकार हो गए। उन्होंने ग्लेमर का चोला ओढ़ लिया, उनकी हर फिल्म में स्टार नज़र आने लगे। राजनीति फिल्म सफ़ल रही तो उसकी विषय वस्तु और कहानी की वजह से , न कि रणबीर कैटरीना की मार्केट वेल्यु से। प्रकाश झा को लगता है कि सितारों का सहारा लेने से वे बॉक्स ऑफिस पर सेफ रहेंगे। प्रकाश झा भी उसी घोड़े की सवारी कर रहे हैं, जिस पर जेपी दत्ता, मेहुल कुमार, अनिल शर्मा जैसे नामचीन निर्देशक सवार हो चुके हैं। प्रकाश झा कहते हैं उनकी फिल्म सत्याग्रह अन्ना आन्दोलन पर आधारित नहीं है लेकिन हम सब जानते हैं कि उनकी फिल्म का चारा दरअसल 'अन्ना अगेंस्ट करप्शन' ही है। तो यदि हम फिल्म का प्रदर्शन पूर्व आकलन करे तो पाएंगे कि उनकी फिल्म देखने के लिए दर्शक उत्साहित नहीं हैं।अन्ना आन्दोलन बिना किसी नतीजे के समाप्त हो चुका है। जो उमंग उस वक्त देश में जागी थी वो अब नज़र नहीं आ रही है। देश बदलने के लिए अन्ना अब भी बिना रुके चल रहे हैं लेकिन उनके कथित फालोअर्स (जिनमे मैं भी शामिल हूँ) नदारद हैं। अब देश की उम्मीदे इकठ्ठा होकर गुजरात के चुम्बक से जा चिपकी हैं और समर्थन के नाम पर अन्ना के हाथ खाली है। ऐसे में सत्याग्रह के लिए उत्सुकता नहीं दिखाई दे रही है। एक बुझी हुई चिंगारी को बॉक्स ऑफिस पर हवा देना बहुत मुश्किल काम होगा, जब ये जवानी है दीवानी और भाग मिल्खा भाग के प्रदर्शन के बाद बॉक्स ऑफिस का मिजाज सतरंगी हो गया हो ।
.jpg)
No comments:
Post a Comment