आज के दौर में फिल्में जिस तरह हिट करवाई जा रही हैं, उसे देख दिल्ली के उन ठगों की याद आ जाती है, जो आंखों के नीचे से काजल चुरा लेते हैं और खबर तक नहीं होती। जो नए-नए दिल्ली जाते हैं, उनमें से कई कैल्क्यूलेटर की ठगी का शिकार जरूर हुए होंगे। एक ठग हाथ में ब्रांडेड कंपनी का कैल्क्यूलेटर हाथ में लिए ग्राहकों को बुलाता है। हाथ में कैल्क्यूलेटर लेकर देखा, अच्छा लगा। कीमत भी अच्छी लगी तो खरीद लिया। घर आकर जब पैकेट खोला तो देखा कैल्क्यूलेटर की जगह एक पतला सा लकड़ी का टुकड़ा मुंह चिढ़ा रहा है। मुझे ही नहीं हजारों दर्शकों को लुटेरा देखने के बाद दिल्ली के वे ठग जरूर याद आए होंगे। आजकल फिल्म उद्योग में एक नई परंपरा चल पड़ी है, दर्शक को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझने की परंपरा। कहावत में तो ये मुर्गी केवल एक ही बार कटती है, लेकिन फिल्म उद्योग के कुछ शातिर खिलाड़ी इन मुर्गियों को हर शुक्रवार हलाल करने का हुनर रखते हैं। ये बात सिर्फ लुटेरा ही नहीं बल्कि इस साल प्रदर्शित हुई कई फिल्मों के बारे में कही जा सकती है। आप हर हफ्ते कैसे हलाल होते हैं, इसे समझने के लिए फिल्म उद्योग के कुछ सयानों के कुटिल अर्थशास्त्र को समझना भी जरूरी है। जब किसी फिल्म की योजना बन रही होती है तो ऐसे निर्माताओं की अचूक नजर केवल मुनाफे पर टिकी होती है। पहले फिल्म का बजट तय किया जाता है और उसके हिसाब से प्रचार अभियान पर पैसा खर्च किया जाता है। इसके बाद कोशिश होती है कि देश के थिएटर्स की ज्यादा से ज्यादा बुकिंग उन्हें मिल जाए। इसके बाद तय होता है सेटेलाइट्स अधिकार बेचने का काम। यह काम आजकल सुबह के नाश्ते की तरह फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही निपटा लिया जाता है। एक बार फिल्म बिक गई तो थिएटर्स में लागत निकलने की पूरी संभावना बन जाती है। इसके बाद उनकी नजर प्रदर्शन के पहले हफ्ते पर टिकी होती है। जितने ज्यादा शो, उतना ज्यादा मुनाफा। कोशिश यही की जाती है कि पहले तीन दिन फिल्म का हिट होने का ऐसा नगाड़ा पीटो कि दर्शक टिकट खरीद ले, उसके बाद की जिम्मेदारी वे नहीं लेते। वे तो लुटेरा की झूठी हिट की बैश पार्टी थ्रो करते हैं और कैमरों की क्लिक-क्लिक के बीच शान से अपनी बकवास फिल्म को हिट बताते शरमाते भी नहीं। हां वे व्यावसायिक रूप से सफल रहे हैं लेकिन दर्शक के दिल से उतने ही उतरते जा रहे हैं। आज थिएटर में फिल्म देखना मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए आसान नहीं रह गया है, इसके लिए महीने का बजट में से जगह निकालनी पड़ती है और उस पर लुटेरा जैसी फिल्मों का सितम हो तो वो किससे शिकायत करे। कभी फिल्म उद्योग में फिल्में दिल से बनाई जाती थी इसलिए दिल में बस जाती थी लेकिन अब ज्यादातर फिल्मकारों का मकसद दिल में बसना नहीं रह गया है। अब उनके लिए सौ करोड़ी क्लब ज्यादा मायने रखने लगा है। सलमान खान की दबंग-२ एक निहायत घटिया फिल्म थी और पहले वाली दबंग के सामने उसका कोई मुकाबला नहीं था। अरबाज खान ने फिल्म को इस तरह बेचा कि फिल्म ब्लॉकबस्टर हो गई। और जब ऐसी घोर निराशा में भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्म आती है तो एक बार फिर फिल्म उद्योग में मेरा भरोसा कायम होने लगता है। लुटेरा से कही ज्यादा बजट की ये फिल्म प्रचार-प्रसार की बैसाखियों की मोहताज नहीं है। लुटेरा को जब आप खुद हिट कहने लगते हैं और प्रदर्शन के एक हफ्ते बाद ही पार्टी देकर फिल्म को हिट बताने की कोशिश करते हैं तो दूर कही टीवी पर देख रहा दर्शक मन ही मन सोचता है कि यदि आप लुटेरा उसे थाली में पेश कर परोसने जाते और उसके चखने तक वही रूकते तो वो आपको बताता कि असली आलोचना किसे कहते हैं।

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