Monday, July 22, 2013

आग उगलता है लेकिन मीनिंगलेस है


आज तक पर एक कार्यक्रम दिखाया जाता है, 'सीधी बात'। पहले इस शो को प्रभु चावला संचालित किया करते थे और अब युवा राहुल कंवल इस शो को एक्स्ट्रा हॉट बनाए हुए हैं। एक्स्ट्रा हॉट इसलिए क्योंकि प्रभु चावला के जमाने से इस शो का एक ही मकसद रहा है कि मेहमान को अपने शब्द बाणों से कैसे विचलित किया जाए। आज भी यह शो अपनी इस खासियत को नहीं भूला है। कल राहुल कंवल ने सीधी बात में एनडीए के नेता सुब्रमण्यम स्वामी को सवालों के घेरे में लिया। कुछ ही देर में पता चल गया कि राहुल केवल अनर्गल सवालों और छींटाकशी से शो की गरमाहट बनाए रखने की व्यर्थ कोशिश कर रहे हैं। अब सवालों की बानगी देखिएं खुद ही समझ जाएंगे कि राहुल कंवल कैसे बेसिर पैर के सवाल अपने कार्यक्रम में करते हैं। उन्होंने पूछा गुजरात में २००२ के दंगों का प्रभारी कौन था। शालीनता से परे जाकर पूछे गए इस सवाल पर बेहिचक सुब्रमण्यम ने दूसरा सवाल जड़ दिया कि १९८४ के दंगों का प्रभारी कौन था। नहले पर दहला पड़ता देख राहुल फौरन दूसरे सवाल पर शिफ्ट हो गए। राहुल बस किसी न किसी तरह सुब्रमण्यम को सवालों के चक्रव्यूह में उलझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन सुब्रमण्यम ने भी राहुल के हर सवाल का बखूबी जवाब दिया और ऐसा करते हुए वे राहुल से ज्यादा शालीन भी नजर आ रहे थे। अतीत में जाए और याद करे प्रभु चावला को, कैसे सवालों के तीखे डंक मेहमानों को तिलमिला दिया करते थे और अब राहुल ने अपनी आक्रमकता में और इजाफा कर दिया है। अब तो वे स्क्रीन पर ऐसे बरताव करते हैं जैसे स्कूल में शिक्षक बच्चों से होमवर्क न करने का कारण पूछ रहा हो। मेरा राहुल से एक ही सवाल है कि क्या अपने प्रस्तुतिकरण में बेवजह आक्रमकता दिखाने से शो का मकसद हल होता है। जब आप शालीनता पार करने लगते हैं तो शो देख रहे दर्शकों के लिए विलेन मेहमान नहीं बल्कि आप बन जाते हैं। हिंदुस्तान में कई सालों से एक परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई है, तमाशा देखने के लिए रास्ते में रूक जाना। पहले ये काम जादू दिखाने वाले किया करते थे और अब ये तमाशा न्यूज चैनल वाले दिखा रहे हैं। इस तमाशे और उस तमाशे में कोई फर्क नहीं है। दोनों ही भीड़ जुटाने के लिए करतब कर रहे हैं। पत्रकारिता का ये नया चेहरा आग तो उगलता है लेकिन मीनिंगलेस है। ऐसा सेंसलेस एग्रेशन कर वे दिखाते हैं कि वैश्विक मीडिया की तुलना में वे अब भी सीखने की प्रक्रिया में है। किसी राजनेता या अभिनेता से बात करते समय वे भूल जाते हैं कि सामने की सीट पर बैठा व्यक्ति उनका अतिथि है। राहुल एक जिम्मेदार पत्रकार हैं और जिस सीट पर बैठ वे सवाल दागते हैं वो बहुत धैर्य और शालीनता की मांग करती है लेकिन राहुल अपनी कुर्सी की मांग पूरी नहीं करते। जब वे नरेंद्र मोदी को दंगों का प्रभारी बता रहे थे, उस वक्त देश के करोड़ों दर्शक उन्हें देख रहे थे। उनमें से अधिकांश की राय थी कि आप सवाल पूछते समय न्यायपरक नहीं रहते। 

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