अठारहवी सदी के अमेरिकन साहित्यकार ओ हेनरी की कहानी द लास्ट लीफ उनकी सिगनेचर स्टोरी मानी जाती है। दो सहेलियों जान्सी और सू की कहानी, जिनमें से जान्सी को निमोनिया हो जाता है। लगातार कमजोर पड़ती जा रही जान्सी को भ्रम हो जाता है कि घर की खिडक़ी के बाहर लटक रही बेल की आखिरी पत्ती जिस दिन झड़ जाएंगी, उस दिन वह भी मर जाएगी। जान्सी का भ्रम तोडऩे के लिए सू एक बूढ़े चित्रकार बैहरमैन से बेल में लटक रही आखिरी पत्ती की तरह पत्ती बनाने के लिए कहती है। बैहरमैन कड़ाके की ठंड में भी अपने सृजन से जान्सी की जान बचाने का काम तब तक जारी रखता है, जब तक उसकी जान नहीं चली जाती। अब इस कहानी का भारतीयकरण कर देते हैं तो विक्रमादित्य मोटवाने द्वारा निर्देशित लुटेरा फिल्म बन जाती है। चूंकि फिल्म के साथ बड़े निर्माता और आधा दर्जन अखबारों का नाम जुड़ा हुआ है इसलिए दूसरे दिन तकरीबन सभी फिल्म समीक्षक लुटेरा की जर्बदस्त सराहना करते हैं, बगैर ये जाने कि जो दर्शक फिल्म देखने गया था, वो अपने साथ क्या लेकर लौटा। ओ हेनरी की कहानी पढऩे के बाद एक प्रेरणा मिलती है, ऐसी प्रेरणा जो मौत से भी आंखें मिलाने की हिम्मत देती है लेकिन लुटेरा देखने के बाद हम मन में गहरा अवसाद लेकर लौटते हैं, जो कई घंटों के बाद ही छंट पाता है। यहां वही सवाल खड़ा हो जाता है कि सृजन क्या प्रेरित करने के लिए हो या लुटेरा जैसे हादसे रचने के लिए। रांझणा भी इश्क का दहकता अंगारा थी लेकिन उसकी दहक में हम हाथ सेंक सकते थे लेकिन लुटेरा तो हमें भस्म ही कर डालती है। विक्रमादित्य की पिछली फिल्म उड़ान देखने के बाद मैं उनका कायल हो गया था लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद यही कहूंगा कि उन्होंने जो कमाया था, सब गंवा दिया। फिल्म के सारे किरदारों में पांखी (सोनाक्षी सिन्हा) और पिता (बरुण चंदा) के अलावा किसी भी किरदार में ग्रिप नहीं दिखाई दी। फिल्म उद्योग की नई उम्मीद रणबीर सिंह को जो अंडरप्ले दिया गया था, उसे वे संभाल नहीं पाए। संवादों के मामलें में वे बेहद कमजोर साबित हुए। निर्देशक की मांग पर उन्होंने फिल्म के आधे संवाद फुसफुसाहट में बोले हैं, जो मेरे साथ थिएटर में बैठे दर्शक भी समझ नहीं पा रहे थे। हांलाकि निर्देशक ने कुछ दृश्यों में अपनी महारत दिखाई है लेकिन फिल्म के समग्र नकारात्मक प्रभाव के आगे वे दृश्य नाकाफी साबित होते हैं। ओ हेनरी की कहानी अपने हर हर्फ से एक उम्मीद जगाती है और विक्रमादित्य चाहते तो फिल्म को एक प्रेरणादायक अंत देकर सफल हो सकते थे। पांखी ठीक हो सकती थी यदि उसे पता चलता कि वरुण अच्छा इनसान बनना चाहता है। परेशानी ये है कि जब एकता कपूर और अनुराग कश्यप जैसे नितांत प्रयोगधर्मी निर्माता इस फिल्म में पैसा लगाएंगे तो सबकुछ अपने हिसाब से करेंगे, फिर किसी साहित्यकार की कहानी लहुलुहान हो जाए, उनको क्या मतलब। हिंदी फिल्मों के दर्शक को ऐसा सिनेमा हरगिज पसंद नहीं आता, जिसमें न मनोरंजन हो और न कोई उम्मीदों भरा अंत। मैंने ये फिल्म एक आम दर्शक बनकर देखी और पाया कि मुझे अपने टिकट के बदले एक कतरा भी मनोरंजन नहीं मिला। मैंने पाया कि मेरे आसपास के कई दर्शक फिल्म खत्म होने से पहले ही उठकर जा चुके थे। जिस फिल्म के बारे में विक्रमादित्य मोटवाने का दावा था कि ये १०० करोड़ कमाएगी, वो तो पहले ही दिन दर्शक के दिल से उतर गई। थिएटर से बाहर आते हुए मुझे राकेश रोशन की फिल्म काइट्स की याद आ गई, वो भी एक ऐसा हादसा था, जिसने राकेश रोशन को बतौर निर्माता बहुत घाटे में उतार दिया था। विक्रमादित्य की ये फिल्म दिल तो न लूट सकी लेकिन जेब जरूर लूट गई।
.jpg)
No comments:
Post a Comment