Saturday, January 24, 2015

बेबी एक सलाम है

आतंकवाद की सिगड़ी को जब से फेसबुक और ट्विटर की हवा लगी है, ये जंगल में लगी बौराई आग की तरह हो गया है. अब सरहदों की दीवारे इसे रोक नहीं पाती। तकनीक की शह पाकर आतंकवाद का दैत्य जैसे मानवता को निगलने पर आमादा हो गया है. नीरज पांडे की तीसरी फिल्म बेबी आतंकवाद के इसी नए स्वरुप को दिखाती है. एक बेहद दिलचस्प फिल्म के जरिये निर्देशक हमें बताता है कि विश्वभर में आतंक से मुकाबला करने वाले हमारे रक्षक किस कदर मुश्किल भरी ज़िन्दगी बिताते हैं. जब हम चैन से सोते हैं तो जाग रहा होता है एक परिवार, जिसका एक अहम सदस्य किसी दूसरे देश में गोलियों की बौछार के बीच आतंक के दैत्यों से मुकाबला कर रहा होता है. 

अजय एक दोहरी ज़िंदगी जी रहा है. एक तरफ वो एंटी टेररिस्ट स्कवॉड का स्पेशल आफ़िसर है तो दूसरी ओर दो बच्चों का पिता भी है. पत्नी को बताता है कि वो एक कंपनी में काम करता है. विदेश में एक ऑपरेशन में उसे मालूम होता है कि पाकिस्तान से संचालित हो रहा एक आतंकी संगठन भारत में कैद एक आतंकी बिलाल खान को किसी खास काम के लिए फरार करवाना चाहता है. जब तक ये खबर अजय तक पहुँचती है, बिलाल खान फरार हो जाता है. एटीएस चीफ फ़िरोज़ खान और अजय बिलाल को वापस लाने के लिए एक गुप्त ऑपरेशन की योजना बनाते है, जिसे बेबी नाम दिया जाता है. निर्देशक ने इस कहानी को इस कदर अंजाम तक पहुँचाया है कि दर्शक जिज्ञासा के साथ अपनी कुर्सी से चिपका रहता है. अदाकारी, निर्देशन और स्क्रीनप्ले के मामले में बेबी बेजोड़ है. हाँ फिल्म का लम्बापन और एक सोचा समझा क्लाइमेक्स सम्पूर्ण प्रभाव में डेंट मारता है. निर्देशक ने किरदारों से देशभक्ति की बड़ी-बड़ी बाते नहीं कहलवाई हैं बल्कि उनके एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया है. अजय की भूमिका में अक्षय कुमार पूरी तरह उतर गए हैं. एक ऐसा ऑफिसर जिसका चेहरा बेहद भावहीन है, जो ज्यादा बोलना पसंद नहीं करता। ये इतना जोशीला अफसर है कि सफलता का अनुमान यदि एक प्रतिशत हो तो भी जान जोखिम में डालने के लिए तैयार है. उसका खाली वक्त पत्नी और बच्चों से घर न आने की माफ़ी मांगते हुए ही बीतता है. अक्षय के अभिनय में बहुत परिपक्वता दिखाई देती है, जब वे नीरज के निर्देशन में काम करते हैं. अनुपम खेर का फिल्म में प्रवेश इंटरवल के बाद होता है लेकिन अपने अनुपम अभिनय के जरिये वे छाप छोड़ने में कामयाब रहते हैं. के के मेनन, रशीद नाज़, जमील खान  और सुशांत सिंह ने फिल्म में निगेटिव किरदार निभाये है. इनमे जमील खान ने अपने अभिनय से हैरान किया है. तौफ़िक का किरदार उन्हें एक नई ऊंचाई दिलवा सकता है. सुशांत सिंह वसीम खान के किरदार में खूब जमे हैं. अफ़सोस है कि के के मेनन का किरदार उतना डेवलप नहीं किया गया. 

26  जनवरी से पूर्व बेबी का प्रदर्शन उन अज्ञात नायकों को ठोंका गया सैल्यूट है, जो ख़ामोशी से आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं. उनकी कोई फोटो अखबार में नहीं छपती, वे कहीं इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाए जाते और न हमारे क्रिकेट खिलाडियों की तरह उन्हें देशसेवा के बदले सम्मान दिया जाता है. नीरज पांडे की ये फिल्म उन अज्ञात नायकों के लिए एक आदर पत्र है, जो रोज यही सोचकर आतंकवाद से लड़ने के लिए घर से निकलते हैं कि ये उनका आखिरी दिन है. बेबी एक सलाम है. 



Saturday, January 17, 2015

प्रतिशोध की कहानी है 'आई'

जिंदगी में हम सभी एक ना एक दिन खुद को प्रतिस्पर्धा के ट्रेक पर खड़े पाते हैं और यह भी अनुभव करते हैं कि कई प्रतियोगी ईर्ष्या के चलते हमें छल-कपट से हराने की कोशिश करते हैं. उनके हारने का डर साजिश को जन्म देता है. ऐसी साजिश जिसके तीखे पंजों की कैद में आकर कई हुनरमंद दम तोड़ देते हैं. शुक्रवार को प्रदर्शित हुई तमिल फिल्म 'आई'  एक ऐसे ही प्रतिभाशाली युवा की कहानी कहती है जिसे ईर्ष्या के जहरीले नाग डंस लेते हैं. भव्य फिल्मे बनाने वाले फिल्म निर्देशक शंकर ने 'आई' के माध्यम से  अपने करियर का सबसे डारकेस्ट सिनेमा  पेश किया है. ये एक ऐसा सिनेमा है, जिसे  बनाने की  हिंदी फिल्म निर्देशक कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उनकी कल्पना शक्ति केवल विभिन्न भाषाओं की कामयाब फिल्मों की रीमेक बनाने पर ही काम कर पाती है. 

कहानी
पहलवानी शरीर वाले लिंगेसन का एक ही सपना है कि वो बॉडी बिल्डिंग में मिस्टर तमिलनाडु का ख़िताब हासिल करे. गरीब लिंगेसन अपनी इच्छाशक्ति के बलबूते ये मुकाम हासिल करता है और दिया (एमी जैक्सन) का साथ पाकर एक बेहद सफल सुपर मॉडल बन जाता है. झोपड़पट्टी से अाये लिंगेसन की ये कामयाबी कुछ लोगों को रास नहीं आती और वे लिंगेसन के शरीर में धोखे से बेहद खतरनाक वायरस इंजेक्ट कर देते हैं. धीमे-धीमे लिंगेसन के शरीर में फोड़े होने लगते हैं, उसके शरीर का आकार बदलने लगता है, डॉक्टर बताते हैं कि उसे भयानक लाइलाज बीमारी  काइफोसिस हो गई है और वो तेज़ी से बूढ़ा होता जा रहा है. चुनौतियों से कभी न हारने वाला लिंगेसन प्रण लेता है कि वो इस साजिश का प्रतिशोध लेगा। 

 ऐसा भी नहीं कि निर्देशक शंकर की इस फिल्म में कोई कमियां नहीं है. फिल्म की अत्याधिक लम्बाई और एक मुख्य किरदार का अभिनय कमज़ोर होना इसके सम्पूर्ण प्रभाव को जरूर कम करते हैं लेकिन इसके बावजूद ये शंकर साबित करते हैं कि वे फिल्म उद्योग के एक बेहतरीन स्टोरी टेलर हैं. फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि सस्पेंस बनाये रखा गया है. फ्लेशबैक वर्तमान कहानी के साथ ही चलता है. इस अभिनव प्रयोग को समझने में दर्शक को थोड़ा वक्त लगता है लेकिन कुछ देर बाद वो समझ जाता है कि फ्लेशबैक और वर्तमान कहानी को किस तरह पिरोया गया है. लगभग सौ करोड़ की लागत से बनी 'आई' को भव्य बनाने के लिए बेहतरीन सिचुएशनल स्पेशल इफेक्ट्स और विदेशो की सुन्दर दृश्यावली का इस्तेमाल किया गया है. आपको बताते चले कि इसके स्पेशल इफेक्ट्स विजुअल इफेक्ट डिजाइनर वी. श्रीनिवास मोहन ने तैयार किये हैं, जिनका प्रभाव हॉलीवुड से किसी मायने में कमतर नहीं हैं. उन्होंने इसके लिए न्यूज़ीलैंड की वेटा वर्कशॉप का मार्गदर्शन लिया है. शंकर की इस फिल्म का मुख्य केंद्रबिंदु प्रतिशोध ही है, जिसके इर्दगिर्द उन्होंने  अपना संसार रचा है. आम दर्शकों के लिए कुछ एक्शन सीक्वेंस डाले गए हैं, जो सांसे रोक देते हैं. चीन में बीएमडब्ल्यू सायकलों वाला एक्शन दृश्य और उपेन पटेल के साथ लड़ाई बहुत दिलचस्प ढंग से फिल्माई गई है. इसके अलावा चीन की सुन्दर दृश्यावली कुछ वक्त के लिए फिल्म का मिज़ाज़ बदल देती है. सिनेमेटोग्राफर पी सी श्रीराम ने फिल्म के इस सेक्शन को किसी चित्रकार की सुन्दर पेंटिंग की तरह प्रस्तुत किया है. निःसन्देह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मुख्य किरदार विक्रम का उत्कृष्ट अभिनय है. उनके किरदार में कई तरह के शेड्स हैं और वे हर शेड को स्वाभाविकता के साथ निभाते हैं. एक पहलवान, एक मॉडल, एक रोगी को उन्होंने मनोयोग से प्रस्तुत किया है. एक दृश्य में उन्होंने कमाल ही किया है. लिंगेसन पर बीमारी  का असर दिखने लगा है. वह एक बड़ी सी टोपी लगाकर छुपते-छुपाते डॉक्टर के पास पहुंचा है.  वह डॉक्टर को बताता है कि अब उसके बाल झड़ने लगे हैं. दांत गिर रहे हैं और शरीर फोड़ों से भर गया है. इस दृश्य में जितना कमाल विक्रम का है उतना ही मेकअप आर्टिस्ट ने भी दिखाया है. इस मास्टर सीन के लिए निर्देशक और विक्रम को सैल्यूट मारने का मन करता है. इस रिवेंज स्टोरी में कुछ कमियां अखरती है जैसे दिया के किरदार के लिए एमी जैक्सन जैसी अनुभवहीन कलाकार को लिया जाना। इस किरदार के लिए दीपिका पादुकोण से भी संपर्क किया गया था लेकिन उन्होंने काम करने से असहमति जताई थी. यदि वे इस किरदार में होतीं तो निश्चित ही फिल्म का सम्पूर्ण प्रभाव  गहरा और मारक होता। 

हमारे फिल्म समीक्षकों ने 'आई' को फकत दो सितारों से नवाज़ा है. शुक्रवार को प्रदर्शित हुई भूषण पटेल निर्देशित भट्ट प्रोडक्शन की 'अलोन', रितेश मेनन द्वारा निर्देशित प्रकाश झा प्रोडक्शंस की 'क्रेज़ी कुक्कड़ फैमिली' को दर्शक नहीं मिल रहे हैं लेकिन 'आई' जबरदस्त दर्शक बटोर रही है. दक्षिण की फिल्मों को दरकिनार कर देना, मुंबई फिल्म उद्योग का बरसों पुराना शगल रहा है.  ऐसा शंकर की फिल्म हिंदुस्तानी और नायक के साथ भी हुआ था. उस दौरान इन दोनों फिल्मों को समीक्षकों ने औसत दर्जे का बताया था लेकिन इन फिल्मों ने खूब भीड़ जुटाई थी. यदि आपमें अत्यधिक लम्बी फिल्म देखने का धीरज है तो आपको 'आई' में बहुत कुछ नया और बेहतर देखने को मिलेगा। और हाँ बच्चों को इस फिल्म से दूर ही रहना चाहिए। 


Sunday, December 28, 2014

फिल्म समीक्षा- अतीत के झरोखे में ले जाती है लिंगा एक्सप्रेस

जब मैं लिंगा एक्सप्रेस में सवार हुआ तो शुरूआती तीस मिनट तक यही लगता रहा कि  रजनीकांत की बुलेट ट्रेन में नहीं बल्कि धीमे-धीमे चलने वाली किसी आम रेलगाड़ी में सवार हूं  लेकिन कुछ देर हिचकोले खाने के बाद लिंगा एक्सप्रेस अतीत के झरोखे में दाखिल हो जाती है। हम ब्रिटिश काल के एक सुंदर कालखंड में जा पहुंचते हैं।  एक ईश्वर तुल्य नायक को अन्याय और प्रकृति से युद्ध  करते देखते हैं। इस स्वप्नलोक में विचरते हुए देशप्रेम की भावना से आल्हादित होते हैं।

एस रविकुमार द्वारा निदेर्शित लिंगा की कहानी एक छोटे से गांव सोलाइयुर से शुरू होती है। यहां की नदी पर बना बरसों पुराना बांघ स्थानीय सांसद नागभूषण की आंखों में खटक रहा है। वह यहां आधुनिक बांध बनवाने के बहाने बड़ा भ्रष्टाचार करने की योजना बना रहा है। इसी गांव में राजा लिंगेश्वरन का मंदिर है। इस मंदिर को खुलवाने के लिए लिंगेश्वरन के ही परिवार का व्यक्ति चाहिए। खोज शुरू होती है और मालूम होता है कि लिंगेश्वरन का पोता लिंगा अब एक शातिर चोर बन चुका है। 
इस कहानी को एस रविकुमार ने बहुत भव्यता से परदे पर उतारा है। राजा लिंगेश्वरन का इतिहास बताने के लिए फिल्म हमें 1939  के ब्रिटिश शासित भारत में ले जाती है। फिल्म का यही हिस्सा सबसे असरदार है। देखा जाए तो शुरूआती आधे घंटे में निर्देशक ने रजनीकांत के परंपरागत दर्शकों को खुश करने का प्रयास किया है। दो डांस नंबर और कामेडी के चंद दृश्यों के बाद  कहानी ट्रेक पर आती है। हालांकि शुरू के तीस मिनट और चलताऊ  क्लाइमैक्स फिल्म के संपूर्ण प्रभाव को कम करते हैं। राजा लिंगेश्वरन की एंट्री वाला सीक्वेंस एक ट्रेन में फिल्माया गया है और खासा दिलचस्प है। इस सीन में वीएफएक्स का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। लिंगेश्वरन का किरदार ही फिल्म की रीढ़  है। निर्देशक ने रजनीकांत को एक उदार राजा, एक सिविल इंजीनियर और एक रसोइये के रूप में पेश किया है। रजनी के किरदार में बहुत से शेड्स है, और हर उन्होंने ये विभिन्नताओं से भरा किरदार बहुत अच्छे से परदे पर उतारा है। सोनाक्षी सिन्हा अपनी पहली तमिल फिल्म में बहुत सहजता से प्रस्तुत हुई हैं। उनकी भूमिका दर्शक पर छाप छोडऩे में कामयाब होती हैं। निर्देशक ने ब्रिटिश भारत को फिल्माने के लिए बहुत श्रम किया है। ब्रिटिश कालीन मुद्रा से लेकर पात्रों की वेशभूषा तक सभी असलियत के बहुत करीब नजर आता है। कालखंड फिल्मों में इस बात का बहुत ध्यान रखा जाता है कि सीन में नजर आ रही कही पड़ी कोई सुई भी उसी काल की लगनी चाहिए। इस मामले में निर्देशक सफल रहे हैं। लिंगा ने रीलिज होते ही दर्शकों का दिल जीत लिया तो उसकी ये वजह है कि राजा लिंगेश्वरन का किरदार रजनीकांत की असली जिंदगी के करीब लगता है। रील लाइफ के साथ वे रियल लाइफ में भी लिंगेश्वरन की तरह परोपकारी हैं। यदि आप रजनीकांत के प्रशंसक हैं और स्वस्थ मनोरंजन के साथ देशप्रेम का संदेश देखना चाहते हैं तो लिंगा आपको निराश नही करेगी। हां रियलिस्टक फिल्मों के दर्शकों को शायद ये लिंगा एक्सप्रेस का सफर उतना नहीं सुहाएगा। अंग्रेजीदां समीक्षक इस फिल्म को औसत बता रहे हैं लेकिन  ऐसी सारी समीक्षाओं को नकारती हुई लिंगा एक्सप्रेस हर दिन और तेज होती जा रही है क्योंकि इस तेज भागती रेलगाड़ी में जो ईध्न भर रहा है। वो एक आम आदमी है, सिंगल थिएटर में सस्ता टिकट लेकर रजनी को किवंदती बनाने वाला आम दर्शक।

मास्टर सीन
बांध बनाते समय ंिब्रटिश कलेक्टर का एक भेदिया जाति के नाम पर काम करने वालों में फूट डाल देता है। बांध का काम रूक जाता है। ब्रिटिश कलेक्टर की साजिश सफल होती दिख रही है। ये बात जानकर राजा लिंगवर्धम साइट पर आते हैं।इस सीन में निर्देशक एक कदम आगे खड़ा होता है। वो बांध प्रतीक बन जाता है भारतीय एकता का।  रजनीकांत यहां दिखाते हैं कि उन्हें यूं ही नहीं दर्शक सिर आंखों पर बैठाते। 

इंडिया रे आओ
गुलजार ने एआर रहमान के लिए इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बड़े अरसे बाद उनकी कलम से देशप्रेम झरा है। इसमें से एक गीत पूरी फिल्म में प्रतिध्वनित होता है। इस गाने के चंद बोलों के साथ आपको छोड़े जा रहा हूं। 
इंडिया रे आओ, मुठ्ठी में दरिया पकड़ के चलो 
बंधु रे आओ, पर्वत से उतरो अकड़ के चलो
आओ गरजते और बरसो, बारिश की बौछार बन के आओ 
इंडिया रे आओ

Saturday, December 20, 2014

फिल्म समीक्षा- नानी की कहानी है पीके


 जो कृति या रचना हमें सबसे ज्यादा छूती है, उसमें एक ईश्वरीय स्पर्श होता है, कुछ अनदेखा सा, अदृश्य सा बस महसूसता हुआ मन को आल्हादित कर देता है। राजकुमार हीरानी की पीके देखते हुए हम इसी अनुभव से गुजरते हैं और ऐसे हो जाते हैं जैसे बरसों ऐसे ही पड़े किसी आइने पर से अचानक धूल हटा दी गई हो। पीके हमें सोती नींद से जगाता है, झकझोरता है, हंसाता है, रूलाता है। 
ये पूरा साल मैकेनिकल फिल्मों से भरा रहा। ढेर सारा मनोरंजन लेकिन सार्थकता सिरे से गायब। लग रहा था कि फिल्म उद्योग एक फैक्टरी हो और चमकदार पैकिंग में लिपटी फिल्में हर शुक्रवार  चली आ रही हो। लेकिन साल के अंत में हम ऐसी फिल्म देखते हैं जो जीवंतता से भरी हुई है।  कहानी बस इतनी है कि एक एलियन अपने स्पेसशिप से धरती पर उतर जाता है। इससे पहले कि वो भोला प्राणी धरतीवासियों की चपल चालाकी को भांप पाए, उसका कॉलिंग डिवाइस चोरी हो जाता है। अब पीके इस डिवाइस के बगैर अपने ग्रह पर नहीं जा सकता। लगती तो ये साधारण कहानी है मगर इसके पेंच जितने मनोरंजन से भरे हैं उतने ही मानवता की पाठशाला के मनकों की तरह है। पीके धरती पर नंगा आया है क्योंकि उसके ग्रह पर कोई कपड़े नहीं पहनता। उसे समझ नहीं आता कि यहां हर धर्म के इतने भगवान क्यों हैं और भगवान को अपना काम करवाने के लिए पैसा क्यों देना पड़ता है। फिल्म मनोरंजक ढंग से समाज की कुरीतियों और पाखंडी महात्माओं पर करारी चोट करती है। इस बार विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी ने विश्व स्तर का सिनेमा रचा है। इसके कुछ दृश्य दर्शक के मानस पटल पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। मसलन आमिर की एंट्री वाले दृश्य में कैमरे ने कमाल का काम किया है। रेल्वे स्टेशन पर आतंकी हमले के एक अन्य दृश्य में दिखाया गया है कि आमिर के गले में लटका ट्रांजिस्टर किसी के धक्के से अचानक ऑन हो जाता है और किसी पुरानी फिल्म का गीत बजने लगता है। क्षत-विक्षत शवों के ढेर, धुल के गुबार के बीच बजता ये प्रेमगीत एक शोकधुन में बदल जाता है। यहां पीके के चेहरे पर वैसी ही दहशत दिखाई देती है, जैसे कोई कबूतर गोली की आवाज सुनकर दहशत के मारे कांप उठा हो। इस एक दृश्य को फिल्माने के लिए राजकुमार हीरानी और आमिर खान शत-शत बधाई के पात्र हैं। एक एलियन का किरदार निभाना आमिर के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा होगा। वे बड़ी सहजता के साथ कठिन दृश्यों को निभा ले जाते हैं। अनुष्का शर्मा ने अपने किरदार को गहराई से जिया है। वे हिंदी फिल्म उद्योग में एक बड़ी संभावना बनकर उभरी हैं। सुशांत सिंह राजपूत का किरदार छोटा मगर बहुत महत्वपूर्ण था और उन्होंने सलीके के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अदाकारी, निर्देशन, स्कीनप्ले और कैमरा वर्क के लिहाज से पीके एक मास्टरपीस है। बेजोड़ संवाद तीर की तरह दिल में धंसते महसूस होते हैं। एक दृश्य में आतंकी हमले में अपने एक दोस्त को खो देने के बाद पीके कहता है खुदा को बचाने के लिए मेरे भाई को मार दिया, ये  कैसा धर्म है। संयोग की बात है कि पीके की विषयवस्तु मौजूदा वैश्विक माहौल में बेहद प्रासंगिक लग रही है। जाति और धर्म को लेकर अचानक छिड़ा उन्माद, आतंकी हमला और हमारी धार्मिक कुरीतियां ये सभी कुछ पीके में रिफलेक्ट होता है। मानो दुनिया के सामने हीरानी ने एक बड़ा सा आइना रख दिया हो। 
राजकुमार हीरानी की डिक्शनरी में मनोरंजन के मायने बहुत जुदा होते हैं। उनके मनोरंजन में सलमानी ठाठबाट नहीं होता। उनका मनोरंजन सार्थक होता हैै। जैसे बचपन में नानी मां की कहानियां खूब हंसाती थी तो उनके भीतर एक सबक भी होता था। पीके उसी नानी मां की एक कहानी लगती है। 


Saturday, November 8, 2014

नई पनाहगाह खोजने का सफर 'इंटरस्टेलर'

महान भौतिक वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कुछ समय पूर्व कहा था कि आज से  कुछ हजार साल बाद पृथ्वी खुद मानव सभ्यता के विनाश का कारण बन जाएगी। इससे पहले कि हमारा अस्तित्व खतरे में पड़े, हमें सुदूर अंतरिक्ष में अपना नया घर खोजना ही होगा। फिल्म निर्देशक क्रिस्टोफर नोलान की साइंस फिक्शन फिल्म इंटरस्टेलर हॉकिंग के इसी विचार से पनपे सवालों का जवाब खोजती नजर आती है। 

कहानी
पृथ्वी पर भयंकर सूखे और अनाज की कमी के कारण मानव जाति के अस्तित्व पर संकट आ गया है। धूलभरी आंधियां फसलों को बरबाद कर रही है। जब मानव सभ्यता अपने अंत के करीब होती है, ठीक उसी दौरान एक अंतरिक्ष पॉयलट कूपर को सुदूर ब्रम्हांड से पृथ्वी और मानव सभ्यता को बचाने के लिए संकेत मिलते हैं। इस अनजानी सभ्यता से ये भी संकेत मिलते हैं कि सौरमंडल में एक वर्म होल खुला है, जिसकी यात्रा करने के बाद मानव सभ्यता को विलुप्त होने से बचाने का उपाय मिल सकता है। कूपर इस असंभव सी लगने वाली यात्रा को पूरा करने निकल पड़ता है। समस्या ये भी है कि सुदूर अंतरिक्ष में समय का पैटर्न बदल जाने के कारण कूपर और उसकी टीम यदि एक घंटा खर्च करेगी तो उधर पृथ्वी पर छह साल बीत चुके होंगे क्योंकि ये यात्रा एक सितारे से दूसरे सितारे की होगी। 
निर्देशक क्रिस्टोफर नोलान की यह फिल्म अंतरिक्ष फिल्म ग्रेविटी की अगली कड़ी कही जा सकती है। बेहद खतरनाक लेकिन बेहद जरूरी हमारे अंतरिक्ष अभियान आगे जाकर क्या रूप लेंगे, इसकी भी एक झलक फिल्म में दिखाई दे जाती है। निर्देशक ने अपनी कहानी का फैलाव बहुत खूबसूरत ढंग से किया है। लगभग तीन घंटे की ये फिल्म रोमांच से भरपूर है।
 स्पेशल इफेक्ट्स का सही जगह इस्तेमाल फिल्म की भव्यता को और बढ़ाता है। ब्लैक होल में प्रवेश करने वाला दृश्य देखते हुए हम अपनी सीट पर सिमट जाते हैं और अपनी धडक़नों को तेज होता महसूस करते हैं। फिल्म बखूबी बताती है कि अपने लिए इस यूनिवर्स में नया घर ढूंढना कितनी खतरनाक चुनौती है। वह दृश्य बहुत मार्मिक है जब एक सितारे की लंबी यात्रा करके लौटा कूपर 124 बरस का हो चुका है। वह जब  रवाना हुआ था तो बेटी मात्र 15 साल की थी और आज लौटा है तो बेटी बूढ़ी हो चुकी है और मौत की कगार पर है। अंतरिक्ष में तेजी से व्यतीत हुए समय ने कूपर को बूढ़ा नहीं होने दिया है। ब्रम्हांड अबूझ पहेली है । अपनी असीम सीमाओं में ये वक्त को भी अपनी गति बदलने पर मजबूर कर देता है।



Thursday, November 6, 2014

बनारस के घाट पर जादू के दीप जले


 जिंदगी में पहली बार डायनमो को हिस्ट्री टीवी के शो पर देखा था और उसके बाद उनको कभी नहीं भूला। उस दिन डायनमो ने पानी के एक कृत्रिम झरने पर हाथ रखकर उसे बर्फ में बदलने पर मजबूर कर दिया था। ब्रिटेन के यार्कशायर के निवासी स्टीवन फ्रायेन उर्फ डायनमो आज अपने असंभव जादू के दम पर जादू के विश्व इतिहास में संभवत हुडिनी के समकक्ष आ खड़े हुए हैं। हिस्ट्री चैनल पर आने वाले शो मैजिशियन इंपासिबल के माध्यम से वे सारी दुनिया में जाने जाते हैं। वे स्टेज पर नहीं बल्कि राह चलते लोगों के बीच जादू दिखाते हैं। एक जादूगर के लिए स्पांटेनियस होना शायद सबसे बड़ा चैलेंज होता है। हैरानी इस बात की होती है कि एक दुबला-पतला नौजवान जेब में हाथ डाले किसी भी बाजार में प्रकट हो जाता है और ऐसे जादू दिखा जाता है जो स्टेज पर सेटअप के साथ दिखाया जाना भी मुमकिन नहीं है।  
डायनमो बीते होली के त्यौहार पर भारत आए और ये देखकर हैरान रह गए कि मोदी, धोनी और सलमान के इस देश में भी इतनी तादाद में लोग उन्हें पहचानते हैं। मुंबई की सडक़ों पर गुजरते हुए आसपास के लोग उन्हें पहचान कर अभिवादन करते और यह सभ्य युवा जादूगर अपने किसी प्रशंसक को जवाब देना नहीं भूलता। 
अपने मुंबई प्रवास में डायनमो नेे  पॉश इलाकों को छोडक़र धारावी और भिंडी बाजार जैसे इलाकों में असली भारत को खोजने की कोशिश की। यहां पढऩे वाले इसे उन फिल्मकारों की तरह न लें जो भारत की गरीबी ही दुनिया को दिखाना चाहते हैं। डायनमो चाहे अमेरिका में हो या ब्राजील में, अपने शो के लिए गरीब बस्तियों में ही जाते है। धारावी में वे पुराने अखबार बेचने वाली रद्दी की एक बड़ी दूकान में जा पहुंचे और अखबार के कुछ टुकड़े उठाए और पलभर में उन्हें जोडक़र पढऩे लायक बना दिया। यहीं नजदीक में धोबी घाट पर उन्होंने एक गंदे कपड़े को देखते-देखते एक खूबसूरत साड़ी में बदल दिया। मछुआरों के एक गांव में डायनमो ने कुछ बच्चों को पानी के बुलबले उड़ाते देखा। उन्होंने एक बुलबुला अपनी हथेली पर रख लिया और अगले ही पल वो बुलबुला एक ठोस गेंद में बदल चुका था।  कई बार इंटरव्यू के दौरान डायनमो ने कहा है कि आज के दौर में लोग बेहद तनाव की जिंदगी गुजारते हैं और यदि उन्हेें कुछ देर सबकुछ भूलकर चहकने का मौका मिले तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है। 
अपने भारत के सफर का समापन उन्होंने वाराणसी में होली खेलकर किया। बनारस की भीड़ भरी गलियों का सम्मोहन डायनमो को खूब भाया। पहली बार उन्होंने जाना कि भारत की उत्सवप्रियता क्या है। होली की शाम बनारस के घाट पर उन्होंने अपना सबसे बड़ा जादू दिखाया। उन्होंने घाट पर अपने हाथ से इशारा किया और पहले से गंगा में तैर रहे सैकड़ों बुझे हुए दीप प्रकाशवान हो उठे। घाट पर मौजूद लोगों के लिए ये अनुभव आल्हादित करने वाला रहा। इन दीपों की रोशनी में उस दिन बनारस के लोगों ने एक ऐसे प्रेमदूत को देखा, जो अपने जादू से लोगों में प्रेम और उम्मीद बांट रहा है। भगवान जाने परदे के पीछे से तुम क्या करते हो डायनमो लेकिन वाकई तुम असंभव हो। 

Saturday, October 25, 2014

इस दिवाली बॉक्स ऑफिस पर आम आदमी का राज


फराह खान की नई फिल्म हैप्पी न्यू इयर में ऐसी क्या खास बात है कि प्रदर्शित होते दर्शक इसे देखने के लिए टूट पड़े हैं। सोशल मीडिया के गलियारों में इस फिल्म को लेकर बहुत गहमा-गहमी है और समीक्षकों के मिक्स रिस्पांस ने उन दर्शकों को संशय में डाल दिया है जो अभी इस शाहरूख मेनिया से रूबरू नहीं हुए हैं। कई समीक्षक, जो अब तक हैदर के हैंगओवर से जूझ रहे हैं, उन्हें इस फिल्म की प्रारंभिक रिकार्ड तोड़ आय मीडिया का फैलाया हुआ भरम लग रही है। प्रदर्शन के पहले दिन आय के नए कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैप्पी न्यू इयर में आखिर ऐसी क्या बात है कि ये फिल्म सफलता के रथ पर सवार दौड़ी जा रही है। इस असरदार कामयाबी की वजह जानने के लिए आपको मल्टीप्लैक्स से दूर किसी ठाठिया सिंगल थिएटर में जाना होगा, वहां की टिकट लेकर थोड़ी सख्त कुर्सियों पर बैठना होगा। यहां आम आदमी का सिनेमा ही राज करता है। निम्न मध्यमवर्गीय दर्शकों के इन थिएटर्स में फिल्में मौज मनाने, उल्लास में झूमने, हूटिंग करने के माहौल में देखी जाती हैं। ये थिएटर्स बहुत अच्छे प्रशंसक हैं तो उतने ही सख्त न्यायधीश भी। दरअसल हैप्पी न्यू इयर इसी दर्शक का सिनेमा है, जो दिपावली पर दो हजार की खरीदारी करता है और सिंगल थिएटर में 50 रूपए की टिकट खरीद कर फिल्म देखता है। इसी दर्शक के लिए फराह खान ने अपना सिनेमा रचा है और उनका स्वागत दुदुंभि बजाकर किया गया है।
 फिल्म निर्देशक फराह खान की पिछली असफलताएं भूल जाइएं, क्योंकि इस बार उन्होंने हैप्पी न्यू इयर के हर डिपार्टमेंट पर जमकर मेहनत की है। एक आम कहानी को बहुत बेहतर स्क्रीनप्ले में बदल दिया गया है। कैरेक्टर बिल्डिंग के लिए हर किरदार के हिसाब से विशेष दृश्य गढ़े गए हैं। गानों की सिचुएशन बिलकुल सटीक है तो एॅक्शन और संगीत के लिहाज से भी बहुत  मेहनत की गई है। फिल्म से जुड़े हर शख्स ने टीमवर्क की तरह काम किया है। दीपिका पादुकोण इस सुतली बम के पैकेज में एक खूबसूरत अनार की तरह पेश की गई है और उनकी रोशनाई से फिल्म अंत तक जगमगाती रहती है। अभिषेक बच्चन दुगने आत्मविश्वास के साथ परदे पर लौटे हैं और धूम-३ से ज्यादा प्रशसंक उन्होंने नंदू भिड़े की भूमिका से जुटा लिए हैं। फराह खान ने भी खुद को ऐसी निर्देशक के रूप में स्थापित कर लिया है जो फिल्म मेकिंग के गंभीर स्कूल की विधाओं में माहिर तो नहीं है लेकिन दर्शक का दिल जीतना बखूबी जानती है और बॉक्स ऑफिस की जंग जीतने के लिए दिल जीतना ही काफी होता है।
 हैदर से घृणा बांटी जा सकती है और हैप्पी न्यू इयर से दिल जीते जा सकते हैं। मैं सिंगल थिएटर में हैप्पी न्यू इयर देखते समय इंटरवल में एक 15 साल के दर्शक से मिला, जिसे ये फिल्म बहुत पसंद आई और वो इसका पूरा मजा लेने के लिए जेब में रखा इकलौता 20 रूपये  का नोट कोल्ड ड्रिंक के लिए खर्च करने के लिए तैयार था, वहीं नोट जो उसने घर तक सिटी बस में जाने के लिए बचा रखा था।