जो कृति या रचना हमें सबसे ज्यादा छूती है, उसमें एक ईश्वरीय स्पर्श होता है, कुछ अनदेखा सा, अदृश्य सा बस महसूसता हुआ मन को आल्हादित कर देता है। राजकुमार हीरानी की पीके देखते हुए हम इसी अनुभव से गुजरते हैं और ऐसे हो जाते हैं जैसे बरसों ऐसे ही पड़े किसी आइने पर से अचानक धूल हटा दी गई हो। पीके हमें सोती नींद से जगाता है, झकझोरता है, हंसाता है, रूलाता है।
ये पूरा साल मैकेनिकल फिल्मों से भरा रहा। ढेर सारा मनोरंजन लेकिन सार्थकता सिरे से गायब। लग रहा था कि फिल्म उद्योग एक फैक्टरी हो और चमकदार पैकिंग में लिपटी फिल्में हर शुक्रवार चली आ रही हो। लेकिन साल के अंत में हम ऐसी फिल्म देखते हैं जो जीवंतता से भरी हुई है। कहानी बस इतनी है कि एक एलियन अपने स्पेसशिप से धरती पर उतर जाता है। इससे पहले कि वो भोला प्राणी धरतीवासियों की चपल चालाकी को भांप पाए, उसका कॉलिंग डिवाइस चोरी हो जाता है। अब पीके इस डिवाइस के बगैर अपने ग्रह पर नहीं जा सकता। लगती तो ये साधारण कहानी है मगर इसके पेंच जितने मनोरंजन से भरे हैं उतने ही मानवता की पाठशाला के मनकों की तरह है। पीके धरती पर नंगा आया है क्योंकि उसके ग्रह पर कोई कपड़े नहीं पहनता। उसे समझ नहीं आता कि यहां हर धर्म के इतने भगवान क्यों हैं और भगवान को अपना काम करवाने के लिए पैसा क्यों देना पड़ता है। फिल्म मनोरंजक ढंग से समाज की कुरीतियों और पाखंडी महात्माओं पर करारी चोट करती है। इस बार विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी ने विश्व स्तर का सिनेमा रचा है। इसके कुछ दृश्य दर्शक के मानस पटल पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। मसलन आमिर की एंट्री वाले दृश्य में कैमरे ने कमाल का काम किया है। रेल्वे स्टेशन पर आतंकी हमले के एक अन्य दृश्य में दिखाया गया है कि आमिर के गले में लटका ट्रांजिस्टर किसी के धक्के से अचानक ऑन हो जाता है और किसी पुरानी फिल्म का गीत बजने लगता है। क्षत-विक्षत शवों के ढेर, धुल के गुबार के बीच बजता ये प्रेमगीत एक शोकधुन में बदल जाता है। यहां पीके के चेहरे पर वैसी ही दहशत दिखाई देती है, जैसे कोई कबूतर गोली की आवाज सुनकर दहशत के मारे कांप उठा हो। इस एक दृश्य को फिल्माने के लिए राजकुमार हीरानी और आमिर खान शत-शत बधाई के पात्र हैं। एक एलियन का किरदार निभाना आमिर के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा होगा। वे बड़ी सहजता के साथ कठिन दृश्यों को निभा ले जाते हैं। अनुष्का शर्मा ने अपने किरदार को गहराई से जिया है। वे हिंदी फिल्म उद्योग में एक बड़ी संभावना बनकर उभरी हैं। सुशांत सिंह राजपूत का किरदार छोटा मगर बहुत महत्वपूर्ण था और उन्होंने सलीके के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अदाकारी, निर्देशन, स्कीनप्ले और कैमरा वर्क के लिहाज से पीके एक मास्टरपीस है। बेजोड़ संवाद तीर की तरह दिल में धंसते महसूस होते हैं। एक दृश्य में आतंकी हमले में अपने एक दोस्त को खो देने के बाद पीके कहता है खुदा को बचाने के लिए मेरे भाई को मार दिया, ये कैसा धर्म है। संयोग की बात है कि पीके की विषयवस्तु मौजूदा वैश्विक माहौल में बेहद प्रासंगिक लग रही है। जाति और धर्म को लेकर अचानक छिड़ा उन्माद, आतंकी हमला और हमारी धार्मिक कुरीतियां ये सभी कुछ पीके में रिफलेक्ट होता है। मानो दुनिया के सामने हीरानी ने एक बड़ा सा आइना रख दिया हो।
राजकुमार हीरानी की डिक्शनरी में मनोरंजन के मायने बहुत जुदा होते हैं। उनके मनोरंजन में सलमानी ठाठबाट नहीं होता। उनका मनोरंजन सार्थक होता हैै। जैसे बचपन में नानी मां की कहानियां खूब हंसाती थी तो उनके भीतर एक सबक भी होता था। पीके उसी नानी मां की एक कहानी लगती है।

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