प्यार एक तितली की तरह होता है। जितनी देर आकर हथेली पर बैठ जाए, उतनी देर मन भी पंख लगाकर उड़ता है। तकलीफ वहां से शुरू होती है जब हम तितली कैद करने के लिए मुठ्ठी बंद करने लगते हैं और वो फुर्र हो जाती है। प्यार सर्दियों के दिनों में आंगन में पसरी उस धूप के टुकड़े को भी कहा जा सकता है, जो गरमाहट तो देता है लेकिन कैद नहीं किया जा सकता। आनंद राय की फिल्म रांझणा देखते हुए मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि मुख्य नायक कुंदन भी उस तितली को मुठ्ठी में कैद करना चाहता है। स्कूली दिनों में बनारस की संकरी गलियों में शुरू हुई कुंदन और जोया की प्रेम कहानी को जल्द ही कथित समाज की नजर लग जाती है। जोया को शहर से बाहर पहुंचा दिया जाता है और कुंदन पूरे आठ साल तक उसके लौटने का इंतजार करता है। कुंदन का इंतजार रंग नहीं लाता क्योंकि इस लंबे वक्त और पढ़ाई ने जोया को पूरी तरह बदल दिया है। दरअसल निर्देशक आनंद राय अपनी फिल्म वहां से शुरू करते हैं, जहां अक्सर हैप्पी एंडिंग वाली फिल्मों की कथा समाप्त हो जाती है। प्यार दूर से गुलाब नजर आता है लेकिन है दरअसल बेशुमार कांटों से भरा कैक्टस। आनंद राय ने बिना लाग-लपेट के इस कैक्टस को ज्यों कि त्यों पेश किया है। मैं हैरान हूं कि एक दर्दनाक कहानी को बॉक्स आफिस पर इस कदर पसंद किया जा रहा है। कुंदन, जिसे एकतरफा इश्क है। जोया, जो अब शमशेर को चाहती है। शमशेर, हिंदू होने की अड़चन है। आनंद राय की पिछली फिल्म भी लव ट्रेंगल थी लेकिन खुशनुमा कनपुरिया माहौल में रची-बसी थी, यहां वे शोलों में दहकता लव ट्रेंगल पेश करते हैं। कुंदन अपने भीतर की आग को संभाल नहीं पाता और नतीजा, तीन जिंदगियां एक जिद के लिए कुर्बान हो जाती हैं। मुरारी और बिंदिया के किरदार यदि निर्देशक ने कहानी में न डाले होते तो शायद फिल्म फ्लॉप हो गई होती। शंकर का गहरा दोस्त मुरारी उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। अपनी बनारसी जबान में वो दर्शकों को हंसाता भी है और अपने दोस्त की बेवकूफियों पर रोता भी है। मोहम्मद जीशान अय्यूब ने मुरारी के किरदार को वाकई अपने भीतर जिया है। अभय देओल हमेशा की तरह भरोसेमंद साबित हुए हैं। इतनी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका करने के लिए कोई बड़ा सितारा शायद ही कभी तैयार होता। सोनम कपूर के अभिनय की सभी ओर तारीफ हो रही है लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे इस फिल्म से अपने सीमित चोले से बाहर आ पाई हैं। अभय देओल और धनुष के मजबूत किरदारों के सामने उनका किरदार कमजोर पड़ जाता है। धनुष के बारे में सबसे अच्छी बात ये हैं कि पहली ही हिंदी फिल्म से वे बेहद साफ उच्चारण के साथ प्रस्तुत हुए हैं। अब तक आए दक्षिण भारतीय कलाकार जबर्दस्त अभिनेता होते हुए भी अपने उच्चारण के कारण ही सफल नहीं हो पाए क्योंकि हिंदी फिल्मों में संवाद अदायगी, अभिनय का एक बेहद अहम पक्ष माना जाता रहा है। धनुष की खासियत यही है कि वे अपने किरदार को निभाते हुए कुंदन शंकर ही नजर आते हैं। एक कलाकार की यही खूबी होती है कि वो नए किरदार के लिए खुद को अंदर से कितना खाली कर सकता है और धनुष में यह बात नजर आती है। कुंदन शंकर के किरदार ने उन्हें अचानक उठाकर हिंदी फिल्मों के दर्शकों की फेवरेट लिस्ट में डाल दिया है। ये लोकप्रियता कोलावेरी डी से कई मायने में सच्ची और बड़ी मानी जाएगी। अंत में बात निर्देशक आनंद राय की। रांझणा निश्चित ही एक निर्देशक के रूप में उनकी जिम्मेदारी और शोहरत में इजाफा करेगी। इस फिल्म से वो उस सिनेमा को लौटाने में सफल रहे हैं जो ठेठ देसी भारत का प्रतिनिधित्व करता है। फिल्मों के दृश्यों को खूबसूरत बनाने के लिए उन्हें स्विटजरलैंड जाने की जरूरत नहीं होती। वे कानपुर या बनारस से भी अपनी फिल्मों को खूबसूरत बना देते हैं। अब इस फिल्म के बाद उनका नाम एक ब्रांड बन जाएगा और धनुष को जरूरत होगी कि वे सोच समझ कर फिल्में साइन करें।
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