वो 1960 का साल था, पाकिस्तान से भारतीय धावक मिल्खा सिंह को उनके सबसे अच्छे धावकों के साथ दौडऩे का न्यौता दिया गया था। उसी पाकिस्तान से, जिसने मिल्खा से विभाजन के वक्त उसका पिंड और परिवार छिन लिया था। मिल्खा पाकिस्तान जाता है और ऐसा दौड़ता है कि पाकिस्तान के तेजतर्रार दौड़ाक भी पीछे हांफते दिखाई देते हैं। स्टेडियम में मौजूद बुर्कानशीन औरते, उडऩ सिख की रफ्तार देखने के लिए अपने नकाब उठा लेती हैं। इस करिश्मे के बाद मिल्खा को दर्द देने वाला देश एक ऐसे नाम से नवाजता है, जिसे सारी दुनिया बाद में फ्लाइंग सिख के नाम से जानती है। हर इनसान की जिंदगी को एक न एक दिन पूर्णता मिल जाती है, किसी को पहले तो किसी को बाद में । पाकिस्तान की उस दौड़ में मिल्खा की जिंदगी को पूर्णता मिल गई थी। निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म भाग मिल्खा भाग में मिल्खा सिंह के जीवन का यह अंश इस तरह फिल्माया गया है कि हम भूल जाते हैं कि ये सिनेमा है और हम दर्शक हैं। मिल्खा के दिल की तेज धडक़नों और स्टेडियम में उठ रही उत्तेजना की लहर हमें भी झकझोर देती है। यही सार्थक सिनेमा है, जब दर्शक खुद को भूलकर कहानी का हिस्सा बन जाता है। फिल्म रोम ओलंपिक की उस दौड़ से शुरू होती है जिसमें मिल्खा सिंह अपनी चूक के कारण पिछड़ गए थे। फिल्म खत्म भी उस दौड़ पर होती है, जिसमें मिल्खा पैरों से दौड़ते नहीं बल्कि उड़ते हैं। इन दो दौड़ों के बीच हम एक महान एथलीट की जिंदगी से यूं रूबरू होते हैं मानों किसी किताब के पन्ने पलट रहे हो। फिल्म इतनी वास्तविक लगती है तो उसकी वजह फरहान अख्तर हैं। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय नहीं किया है बल्कि वे खुद ही मिल्खा हो गए हैं। शरीर से, मन से, आत्मा से वे मिल्खा ही हो गए। अब इस रूपांतरण के बाद अदाकारी की गुंजाइश ही कहां बचती है। अब उनके अभिनय की इससे बड़ी तारीफ और क्या होगी कि मिल्खा सिंह की पत्नी निर्मला कौर को फिल्म देखकर अपनी जवानी के दिन याद आ गए। मेरे ख्याल में फरहान इस किरदार की बदौलत कई पुरस्कार जीतने जा रहे हैं और ऐसा अभिनय तो उन्होंने आज तक कभी नहीं किया है। फिल्म के निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा का भी ये अब तक का सबसे बेहतरीन काम माना जाएगा। उनकी पिछली फिल्म दिल्ली-६ में उनके सारे तीर निशाने से बाहर जा गिरे थे लेकिन मिल्खा में उनके सारे तीर सही निशाने पर जा बैठे हैं। कहानी हो या कैमरावर्क, फिल्म हर विभाग में खरी उतरती है। इस फिल्म में दूसरे बेहतरीन कलाकार रहे हैं पवन मल्होत्रा। मिल्खा के कोच की भूमिका को वे इतनी सहजता से निभा ले जाते हैं कि हमें अहसास भी नहीं होता कि इन्हीं पवन मल्होत्रा को हमने कुछ दिन पहले हॉरर फिल्म 'एक थी डायन' में एक अलग ही अंदाज में देखा था। इस किरदार के जरिए उन्होंने एक बार फिर दिखाया है कि उन्हें वर्सेटाइल एक्टर यूं ही नहीं कहा जाता। प्रकाश राज और पवन मल्होत्रा के बगैर ये फिल्म बोझिल हो जाती और उस सीक्वेंस के बगैर भी, जो फौजी कैंप में मजाकिया अंदाज में फिल्माया गया है। यही तो निर्देशक का कमाल है कि वे मिल्खा सिंह की वेदना को महसूस भी करवा देते हैं और मनोरंजन का भी पूरा ध्यान रखते हैं। एक किरदार के चयन में मुझे निर्देशक से सख्त एतराज है। उन्होंने पंडित नेहरू की भूमिका के लिए दिलीप ताहिल को चुना। नेहरू के किरदार में वे बेहद मिसफिट नजर आए। ये किरदार बहुत महत्वपूर्ण था लेकिन निर्देशक ने यहां चूक कर दी। तीन घंटे की ये फिल्म देखने के बाद जब दर्शक सीट से उठता है तो उसके मन में उस उडऩ सिख के लिए खुद ही सम्मान जाग जाता है, जिसके लिए जिंदगी में तीन बाते ही सफलता के लिए जरूरी थी। कड़ी मेहनत, समर्पण और इच्छा शक्ति। बहरहाल फ्लाइंग सिख ने अपने नाम के अनुरूप सिनेमाघरों में भी अपनी सिनेमाई सफलता की दौड़ का हवाई आगाज किया है। बॉक्स आफिस पर ये फ्लाइंग सिख निश्चित ही ४०० मीटर की दौड़ फर्राटे से लगाएगा।
.jpg)
No comments:
Post a Comment