Wednesday, July 15, 2015

बाहुबली से परेशान मुंबई फिल्म जगत

देश में मच रही राजनीतिक खींचतान को अपने शो में पेश करने वाले पुण्य प्रसुन वाजपेयी जब रात को आजतक के मंच पर सलमान खान की आने वाली फिल्म बजरंगी भाईजान पर आधे घंटे का शो पेश करते हैं तो उसके मायने क्या होते हैं। गंभीर विषयों पर बात करने वाला एक पत्रकार सलमान खान की फिल्म पर एक रिपोर्ट पेश करता है। थोड़ा अटपटा सा लगता है ना। मुझे भी लगा था लेकिन जब शो शुरू हुआ तो सबकुछ स्पष्ट होता चला गया। बात हालिया रिलीज बाहुबली और सलमान खान की आगामी फिल्म बजरंगी भाईजान के बारे में चल रही थी।

 वाजपेयी जी का कहना था कि बाहुबली की सफलता सलमान के लिए बड़ी चुनौती है, अब वे इससे कैसे निपटेंगे। (ध्यान दें वे यहां बाहुबली की प्रशंसा नहीं कर रहे बल्कि उसे बजरंगी भाईजान के लिए एक खतरा बता रहे हैं)  इसके बाद वे दूसरे खानों की फिल्मों की वल्र्डवाइड कमाई बताकर ये दर्शाते हैं कि बाहुबली के लिए खान तिकड़ी के बैरियर आखिर कौन से है जो दक्षिण की इस फिल्म को लांघने पड़ेंगे। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन जब महाशय ने खान तिकड़ी की फिल्मों के आंकड़े गिनाने शुरू किए तो मेरा माथा ठनका। लगा जरूर कोई न कोई गड़बड़ है लेकिन उससे बड़ा सवाल यह था कि आखिरकार पुण्यजी ये कार्यक्रम क्यो चला रहे हैं।

 इसके निहित कारणों को खोजना भी जरूरी था। लिहाजा अंर्तजाल पर लंबी खोज का सिलसिला शुरू हुआ। विभिन्न वेबसाइटों के आंकड़ों से मिलान करने के बाद मालूम हुआ कि पीके, धूम-3, किक, चेन्नई एक्सप्रेस आदि फिल्मों के आंकड़े दिखाने में बड़ा गोलमाल किया गया है। ये बात सही है कि सलमान-आमिर-शाहरूख हिंदी फिल्म उद्योग के बड़े सितारे हैं लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि उन्हें छोड़कर बाकी फिल्म उद्योग प्रतिभाहीन है और हिट फिल्में नहीं बना सकता। पुण्यजी ने जब पीके का वल्र्ड वॉइड कलेक्शन 700 करोड़ से ज्यादा बताया तो मेरी भी आंखें फटकर चौड़ी हो गई।

 पीके 2013 मार्च तक सिनेमाघरों में बनी रहती है और उसका कलेक्शन भारत में 324 करोड़ का होता है। विदेशों में भी फिल्म कमाई करती है लेकिन इतनी नहीं कि 700 करोड़ पार कर जाए।   एनडीटीवी और दूसरी वेबसाइट वल्र्ड वाइड कलेक्शन 650 करोड़ तक बताते हैं और आजतक पर पुण्य प्रसुन इसी आंकड़े को पता नहीं कैसे 735 करोड़ तक पहुंचा देते हैं। किक का कलेक्शन वे 336 करोड़ बताते हैं जबकि भारत में ये फिल्म 2014 सितंबर तक 214 करोड़ ही कमा पाती है।

पुण्य प्रसुन ने बड़ी चतुराई से बाहुबली के सामने एक भ्रामक आंकड़े का बैरियर बना दिया। अपने हिसाब से आंकड़े पेश करने वाले ये न्यूज चैनल और वेबसाइट आखिरकार ये क्यों नहीं बता पाते कि पीके ने यदि भारत में 324 करोड़ कमाए थे तो बाकी कलेक्शन किन देशों में और कितना हुआ था। किक समेत यहां बहुत सी फिल्मों के आंकड़ों में बाजीगरी की गई है। अब सवाल उठता है कि  आजतक के महत्वपूर्ण प्राइम टाइम में बाहुबली और बजरंगी भाईजान का जिक्र क्यों हुआ और अंग्रेजी अखबार और वेबसाइट इस फिल्म को तवज्जो क्यों नहीं दे रहे हैं।

मुझे याद है कि लंबे समय से दक्षिण की फिल्मों और उनके कलाकारों का मुंबई में स्वागत नहीं होता है। कमल हासन, रजनीकांत, श्रीदेवी और जाने कितने नाम है जो मुंबई फिल्म उद्योग की गंदी राजनीति का शिकार हुए हैं। दक्षिण की अच्छी फिल्मों को समीक्षक अच्छे रिव्यू नहीं देते हैं। अनिल कपूर की नायक और कमल हासन की हिंदुस्तानी को जो प्यार यहां के कलमकारों से मिलना चाहिए था, नहीं मिला। श्रीदेवी जरूर धरतीपकड़ पहलवान निकली और अपना मुकाम बनाकर दिखाया।

बाहुबली तो अकड़ के साथ तुम्हारे मैदान में घुस आया है। अच्छा यहीं होगा कि छल-बल से उसे परास्त करने के बजाय अपने प्रदर्शन में इतना सुधार लाओ कि दर्शक तुम्हें भी उतना ही प्यार दे। एक बता बताता चलूं कि हिंदुस्तान के दर्शक जितना खान तिकड़ी को चाहते हैं उतना प्यार शायद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को ही नसीब हुआ है। तुमने उस प्यार को अपनी बपौती समझ लिया है। इन दिनों दो फिल्मों ने तुम बॉलीवुड वालों के अखाड़े में भयंकर उधम मचा रखा है। जुरासिक वल्र्ड और बाहुबली को टक्कर तो तुम दे नहीं पा रहे हो और व्यर्थ की आंकड़ेबाजी में उलझे हो। 

Sunday, July 12, 2015

आओ चले आठवीं सदी में खो जाए


मैं हैरान हूँ ये देखकर कि हिंदी बेल्ट में आने वाले सिनेमाघरों में जब बाहुबली प्रदर्शित हुई तो बाहर वैसा ही हंगामा और सीटियों का शोर बाहर सुनाई दे रहा था जैसा हम अक्सर सलमान खान की फिल्मों में देखते और सुनते  हैं. सम्भवत ये पहली बार हुआ है जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्म को हिंदी बेल्ट में छप्पर फाड़ सफलता हासिल हो रही है. हर दशक में एक ऐसी फिल्म तो बनती ही है कि उसका शोर बस स्टैंड पर लगी लाइन से होता हुआ पान की दुकानों और वहां से निकल कर कॉलेज कैंटीन तक पहुँच जाता है. ऐसी फिल्मों को पेड रिव्यू की जरुरत नहीं होती। हवाओं में उसका शोर होता है. बाहुबली एक ऐसी ही फिल्म है जो इस वक्त देश के लिए एक क्रेज बन गई है.

फिल्म की कहानी को आठवीं सदी में स्थापित किया गया है. भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली राज्यों में से एक महिष्मति के राजसिंहासन की लड़ाई है बाहुबली। वीर राजा बाहुबली को धोखे से मार दिया गया है और किसी तरह उसके बेटे शिवा को बचा लिया गया है. शिवा के सामने दो ही लक्ष्य है. एक तो  महिष्मति के क्रूर राजा भलाल देव को मारकर प्रजा को मुक्त करवाना और दूसरा अपनी माँ देवसेना को मुक्त करवाना। अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) राज्य के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है जबकि दूसरा भाई भल्लाल (राना डगुबत्ती) है. लेकिन साज़िशों के चलते क्रूर राजा भल्लाल का राज होता है. बाहुबली  मारा जाता है मगर उसके बेटे शिव को राजमाता एक दूसरे गांव तक छोड़ आती है जहां एक दूसरी मां उसे पालती है.

निर्देशक ने कहानी को पीरियड लुक देने के लिए बहुत मेहनत और पैसा खर्च किया है. चरित्रों को इस तरह से गढ़ा गया है कि लम्बे समय तक इन किरदारों की याद ताज़ा रहेगी। जब फिल्म हमें अपने सम्मोहन में खींच लेती है तो महसूस होता है कोई बूढ़ा साधु किसी पौराणिक गाथा का आख्यान गा रहा हो. जैसे-जैसे सीन-दर-सीन फिल्म आगे बढ़ती है, हम खुद को आठवीं सदी के खूबसूरत भारत में पाते हैं. फिल्म के सबसे सशक्त चरित्रों की बात करे तो सबसे पहले जेहन में बाहुबली (प्रभास), राजमाता (रम्या कृष्नन), कट्टप्पा( सथ्यराज) ही आते हैं. इनमे से राजमाता का किरदार दिल जीत लेता है. रम्या ने इतने आत्मविश्वास से ये किरदार निभाया है कि उनके सारे दृश्यों में और कोई कलाकार उनका सामना नहीं कर पाता। वफादार गुलाम के रूप में सथ्यराज बहुत प्रभावित करते हैं. प्रभास अपने नए किरदार में बहुत ताज़ादम नज़र आये हैं.

मगधीरा और एगा के बाद से तेलगु फिल्म निर्देशक एसएस राजमौली को हिट मशीन की संज्ञा दी जाने लगी है। बाहुबली-द बिगनिंग ने आय के तमाम कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया है। लगभग 205 करोड़ की लागत से बनी भारत की सबसे महंगी फिल्म सफलता के रथ पर रफ्तार से दौड़ रही है। राजमौली और उनकी टीम अब फिल्म निर्माण के दौरान गुजरे बुरे अनुभवों को भूल कर चैन की नींद सो सकेगी। आज भारतीय सिनेमा गर्व से कह सकता है कि उसके पास भी हॉलीवुड के स्तर की, बल्कि उससे बेहतर फिल्म बनाने की क्षमता है। महाबली का विजयगान बता रहा है कि हम फिल्म निर्माण में तकनीकी और कल्पनाशक्ति के स्तर पर और ऊंचा उठ गए है।

यदि आप 'मसान' टाइप दर्शक नहीं है और भारतीय तकनीक  से बनी बेहद खूबसूरत फिल्म देखना चाहते हैं तो बाहुबली का मज़ा आपको बड़े परदे पर लेना चाहिए। ढाई घंटे की इस कथा में आपको सुन्दर कहानी, आला दर्जे के स्पेशल इफेक्ट्स से सजे लड़ाई के दृश्य और बेहतरीन चरित्र देखने को मिलेंगे। तेलगु में बनी इस फिल्म ने पहले से सिनेमाघरों में चल रही सारी हिंदी फिल्मों को कोने में बैठा दिया है. शुक्र है 'बजरंगी भाईजान' इस हफ्ते पाकिस्तान में नहीं घुसे।




Wednesday, July 8, 2015

जिन्दा है 'जुरासिक परंपरा'

'जुरासिक वर्ल्ड ' में निर्देशन से लेकर प्रोडक्शन तक कहीं भी इस परम्परा के जनक स्टीवन स्पीलबर्ग की महत्वाकांक्षी फिल्म 'रोबोकेलिस्प ' निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रही है. हालांकि वे फिल्म के एक्सिक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में अपनी सेवाएं देते रहे हैं  और अदृश्य रूप से वे जुरासिक वर्ल्ड के हर फ्रेम में मौजूद है.  इस  फिल्म को निर्देशित करने वाले कॉलिन ट्रेवोरो इस वक्त 38  साल के  हैं. उन्होंने द लॉस्ट वर्ल्ड - जुरासिक पार्क(1993 ) अपने स्कूली दिनों में देखी थी जब वे महज एक स्कूली
छात्र थे. तब से ही वे स्पीलबर्ग जैसा निर्देशक बनना चाहते थे. 2015 में उन्हें वो मौका मिलता है जिसकी उन्हें जाने कब से ख्वाहिश थी. फिल्म प्रदर्शित होती है और आय के कई रिकार्ड टूट जाते है. क्या था स्पीलबर्ग का वो आइडिया जिसका डीएनए इस फिल्म की रग-रग में दौड़ रहा है.

स्पीलबर्ग ने 2003 में ही ये कल्पना कर ली थी कि फिल्म के इस भाग में 'जेनेटिकली मोडीफाइड' डायनासॉर को कहानी का मुख्य बिंदु बनाया जा सकता है.  दो प्रजातियों के डीएनए में फेरबदल कर नई प्रजाति को जन्म देना, टेस्ट ट्यूब की कोख में विकसित प्रजाति का जीव कैसा होगा, ये इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है. इंडो माइनस रेक्स नाम की लेब में तैयार की गई मादा डायनासॉर अपना बाड़ा तोड़ उस ओर भाग निकली है, जहाँ हज़ारो बच्चे डायनासॉर थीम पार्क का मजा ले रहे हैं. अकेली लेब में बड़ी हुई इस खूंखार  इंडो माइनस को रिश्तो की समझ नहीं है, उसे केवल शिकार करना आता है. और सबसे डरावनी बात ये है कि इंडो आधी डायनासॉर और आधी छिपकली है. अपना रंग वातावरण के अनुरूप बदल सकती है.

फिल्म की कहानी के केंद्र में ये डायनासौर और चार प्रशिक्षित रेप्टर भी है. इन्हे ओवन ग्रेडी ने प्रशिक्षण दिया है. फ़ौज का एक आदमी इस ताकत को अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है. मझे ये देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि हॉलीवुड के बड़े बजट की इस फिल्म में इरफ़ान खान को अच्छा खासा फुटेज दिया गया है. ये गेट्स-वेट्स की तुलना में बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जायेगी। उन्होंने बेहद सलीके का अभिनय किया है और फीस शायद अपने 'तीनो खानों' से पांच गुनी पाई है.

स्पीलबर्ग की 'जुरासिक परम्परा' पर ये फिल्म पूरी तरह खरी उतरी है. खून जमा देने वाला रोमांच आखिरी सीन में एक मारक सन्देश देकर समाप्त होता है।  इंडो माइनस पर काबू पाने के लिए ट्रायनासोरस रेक्स को बाड़े से आज़ाद कर दिया जाता है. ट्रायनासोरस 'शुद्ध' डायनासॉर है और बहुत लड़ाकू है. फिल्म सन्देश देती है कि दो प्रजातियों के डीएनए से छेड़छाड़ कर एक नया जीव विकसित करना मानवता के लिए खतरा बन सकता है. मनुष्यों में भी इस तरह के प्रयास भविष्य में घातक साबित हो सकते है. 

Saturday, January 24, 2015

बेबी एक सलाम है

आतंकवाद की सिगड़ी को जब से फेसबुक और ट्विटर की हवा लगी है, ये जंगल में लगी बौराई आग की तरह हो गया है. अब सरहदों की दीवारे इसे रोक नहीं पाती। तकनीक की शह पाकर आतंकवाद का दैत्य जैसे मानवता को निगलने पर आमादा हो गया है. नीरज पांडे की तीसरी फिल्म बेबी आतंकवाद के इसी नए स्वरुप को दिखाती है. एक बेहद दिलचस्प फिल्म के जरिये निर्देशक हमें बताता है कि विश्वभर में आतंक से मुकाबला करने वाले हमारे रक्षक किस कदर मुश्किल भरी ज़िन्दगी बिताते हैं. जब हम चैन से सोते हैं तो जाग रहा होता है एक परिवार, जिसका एक अहम सदस्य किसी दूसरे देश में गोलियों की बौछार के बीच आतंक के दैत्यों से मुकाबला कर रहा होता है. 

अजय एक दोहरी ज़िंदगी जी रहा है. एक तरफ वो एंटी टेररिस्ट स्कवॉड का स्पेशल आफ़िसर है तो दूसरी ओर दो बच्चों का पिता भी है. पत्नी को बताता है कि वो एक कंपनी में काम करता है. विदेश में एक ऑपरेशन में उसे मालूम होता है कि पाकिस्तान से संचालित हो रहा एक आतंकी संगठन भारत में कैद एक आतंकी बिलाल खान को किसी खास काम के लिए फरार करवाना चाहता है. जब तक ये खबर अजय तक पहुँचती है, बिलाल खान फरार हो जाता है. एटीएस चीफ फ़िरोज़ खान और अजय बिलाल को वापस लाने के लिए एक गुप्त ऑपरेशन की योजना बनाते है, जिसे बेबी नाम दिया जाता है. निर्देशक ने इस कहानी को इस कदर अंजाम तक पहुँचाया है कि दर्शक जिज्ञासा के साथ अपनी कुर्सी से चिपका रहता है. अदाकारी, निर्देशन और स्क्रीनप्ले के मामले में बेबी बेजोड़ है. हाँ फिल्म का लम्बापन और एक सोचा समझा क्लाइमेक्स सम्पूर्ण प्रभाव में डेंट मारता है. निर्देशक ने किरदारों से देशभक्ति की बड़ी-बड़ी बाते नहीं कहलवाई हैं बल्कि उनके एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया है. अजय की भूमिका में अक्षय कुमार पूरी तरह उतर गए हैं. एक ऐसा ऑफिसर जिसका चेहरा बेहद भावहीन है, जो ज्यादा बोलना पसंद नहीं करता। ये इतना जोशीला अफसर है कि सफलता का अनुमान यदि एक प्रतिशत हो तो भी जान जोखिम में डालने के लिए तैयार है. उसका खाली वक्त पत्नी और बच्चों से घर न आने की माफ़ी मांगते हुए ही बीतता है. अक्षय के अभिनय में बहुत परिपक्वता दिखाई देती है, जब वे नीरज के निर्देशन में काम करते हैं. अनुपम खेर का फिल्म में प्रवेश इंटरवल के बाद होता है लेकिन अपने अनुपम अभिनय के जरिये वे छाप छोड़ने में कामयाब रहते हैं. के के मेनन, रशीद नाज़, जमील खान  और सुशांत सिंह ने फिल्म में निगेटिव किरदार निभाये है. इनमे जमील खान ने अपने अभिनय से हैरान किया है. तौफ़िक का किरदार उन्हें एक नई ऊंचाई दिलवा सकता है. सुशांत सिंह वसीम खान के किरदार में खूब जमे हैं. अफ़सोस है कि के के मेनन का किरदार उतना डेवलप नहीं किया गया. 

26  जनवरी से पूर्व बेबी का प्रदर्शन उन अज्ञात नायकों को ठोंका गया सैल्यूट है, जो ख़ामोशी से आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं. उनकी कोई फोटो अखबार में नहीं छपती, वे कहीं इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाए जाते और न हमारे क्रिकेट खिलाडियों की तरह उन्हें देशसेवा के बदले सम्मान दिया जाता है. नीरज पांडे की ये फिल्म उन अज्ञात नायकों के लिए एक आदर पत्र है, जो रोज यही सोचकर आतंकवाद से लड़ने के लिए घर से निकलते हैं कि ये उनका आखिरी दिन है. बेबी एक सलाम है. 



Saturday, January 17, 2015

प्रतिशोध की कहानी है 'आई'

जिंदगी में हम सभी एक ना एक दिन खुद को प्रतिस्पर्धा के ट्रेक पर खड़े पाते हैं और यह भी अनुभव करते हैं कि कई प्रतियोगी ईर्ष्या के चलते हमें छल-कपट से हराने की कोशिश करते हैं. उनके हारने का डर साजिश को जन्म देता है. ऐसी साजिश जिसके तीखे पंजों की कैद में आकर कई हुनरमंद दम तोड़ देते हैं. शुक्रवार को प्रदर्शित हुई तमिल फिल्म 'आई'  एक ऐसे ही प्रतिभाशाली युवा की कहानी कहती है जिसे ईर्ष्या के जहरीले नाग डंस लेते हैं. भव्य फिल्मे बनाने वाले फिल्म निर्देशक शंकर ने 'आई' के माध्यम से  अपने करियर का सबसे डारकेस्ट सिनेमा  पेश किया है. ये एक ऐसा सिनेमा है, जिसे  बनाने की  हिंदी फिल्म निर्देशक कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उनकी कल्पना शक्ति केवल विभिन्न भाषाओं की कामयाब फिल्मों की रीमेक बनाने पर ही काम कर पाती है. 

कहानी
पहलवानी शरीर वाले लिंगेसन का एक ही सपना है कि वो बॉडी बिल्डिंग में मिस्टर तमिलनाडु का ख़िताब हासिल करे. गरीब लिंगेसन अपनी इच्छाशक्ति के बलबूते ये मुकाम हासिल करता है और दिया (एमी जैक्सन) का साथ पाकर एक बेहद सफल सुपर मॉडल बन जाता है. झोपड़पट्टी से अाये लिंगेसन की ये कामयाबी कुछ लोगों को रास नहीं आती और वे लिंगेसन के शरीर में धोखे से बेहद खतरनाक वायरस इंजेक्ट कर देते हैं. धीमे-धीमे लिंगेसन के शरीर में फोड़े होने लगते हैं, उसके शरीर का आकार बदलने लगता है, डॉक्टर बताते हैं कि उसे भयानक लाइलाज बीमारी  काइफोसिस हो गई है और वो तेज़ी से बूढ़ा होता जा रहा है. चुनौतियों से कभी न हारने वाला लिंगेसन प्रण लेता है कि वो इस साजिश का प्रतिशोध लेगा। 

 ऐसा भी नहीं कि निर्देशक शंकर की इस फिल्म में कोई कमियां नहीं है. फिल्म की अत्याधिक लम्बाई और एक मुख्य किरदार का अभिनय कमज़ोर होना इसके सम्पूर्ण प्रभाव को जरूर कम करते हैं लेकिन इसके बावजूद ये शंकर साबित करते हैं कि वे फिल्म उद्योग के एक बेहतरीन स्टोरी टेलर हैं. फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि सस्पेंस बनाये रखा गया है. फ्लेशबैक वर्तमान कहानी के साथ ही चलता है. इस अभिनव प्रयोग को समझने में दर्शक को थोड़ा वक्त लगता है लेकिन कुछ देर बाद वो समझ जाता है कि फ्लेशबैक और वर्तमान कहानी को किस तरह पिरोया गया है. लगभग सौ करोड़ की लागत से बनी 'आई' को भव्य बनाने के लिए बेहतरीन सिचुएशनल स्पेशल इफेक्ट्स और विदेशो की सुन्दर दृश्यावली का इस्तेमाल किया गया है. आपको बताते चले कि इसके स्पेशल इफेक्ट्स विजुअल इफेक्ट डिजाइनर वी. श्रीनिवास मोहन ने तैयार किये हैं, जिनका प्रभाव हॉलीवुड से किसी मायने में कमतर नहीं हैं. उन्होंने इसके लिए न्यूज़ीलैंड की वेटा वर्कशॉप का मार्गदर्शन लिया है. शंकर की इस फिल्म का मुख्य केंद्रबिंदु प्रतिशोध ही है, जिसके इर्दगिर्द उन्होंने  अपना संसार रचा है. आम दर्शकों के लिए कुछ एक्शन सीक्वेंस डाले गए हैं, जो सांसे रोक देते हैं. चीन में बीएमडब्ल्यू सायकलों वाला एक्शन दृश्य और उपेन पटेल के साथ लड़ाई बहुत दिलचस्प ढंग से फिल्माई गई है. इसके अलावा चीन की सुन्दर दृश्यावली कुछ वक्त के लिए फिल्म का मिज़ाज़ बदल देती है. सिनेमेटोग्राफर पी सी श्रीराम ने फिल्म के इस सेक्शन को किसी चित्रकार की सुन्दर पेंटिंग की तरह प्रस्तुत किया है. निःसन्देह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मुख्य किरदार विक्रम का उत्कृष्ट अभिनय है. उनके किरदार में कई तरह के शेड्स हैं और वे हर शेड को स्वाभाविकता के साथ निभाते हैं. एक पहलवान, एक मॉडल, एक रोगी को उन्होंने मनोयोग से प्रस्तुत किया है. एक दृश्य में उन्होंने कमाल ही किया है. लिंगेसन पर बीमारी  का असर दिखने लगा है. वह एक बड़ी सी टोपी लगाकर छुपते-छुपाते डॉक्टर के पास पहुंचा है.  वह डॉक्टर को बताता है कि अब उसके बाल झड़ने लगे हैं. दांत गिर रहे हैं और शरीर फोड़ों से भर गया है. इस दृश्य में जितना कमाल विक्रम का है उतना ही मेकअप आर्टिस्ट ने भी दिखाया है. इस मास्टर सीन के लिए निर्देशक और विक्रम को सैल्यूट मारने का मन करता है. इस रिवेंज स्टोरी में कुछ कमियां अखरती है जैसे दिया के किरदार के लिए एमी जैक्सन जैसी अनुभवहीन कलाकार को लिया जाना। इस किरदार के लिए दीपिका पादुकोण से भी संपर्क किया गया था लेकिन उन्होंने काम करने से असहमति जताई थी. यदि वे इस किरदार में होतीं तो निश्चित ही फिल्म का सम्पूर्ण प्रभाव  गहरा और मारक होता। 

हमारे फिल्म समीक्षकों ने 'आई' को फकत दो सितारों से नवाज़ा है. शुक्रवार को प्रदर्शित हुई भूषण पटेल निर्देशित भट्ट प्रोडक्शन की 'अलोन', रितेश मेनन द्वारा निर्देशित प्रकाश झा प्रोडक्शंस की 'क्रेज़ी कुक्कड़ फैमिली' को दर्शक नहीं मिल रहे हैं लेकिन 'आई' जबरदस्त दर्शक बटोर रही है. दक्षिण की फिल्मों को दरकिनार कर देना, मुंबई फिल्म उद्योग का बरसों पुराना शगल रहा है.  ऐसा शंकर की फिल्म हिंदुस्तानी और नायक के साथ भी हुआ था. उस दौरान इन दोनों फिल्मों को समीक्षकों ने औसत दर्जे का बताया था लेकिन इन फिल्मों ने खूब भीड़ जुटाई थी. यदि आपमें अत्यधिक लम्बी फिल्म देखने का धीरज है तो आपको 'आई' में बहुत कुछ नया और बेहतर देखने को मिलेगा। और हाँ बच्चों को इस फिल्म से दूर ही रहना चाहिए। 


Sunday, December 28, 2014

फिल्म समीक्षा- अतीत के झरोखे में ले जाती है लिंगा एक्सप्रेस

जब मैं लिंगा एक्सप्रेस में सवार हुआ तो शुरूआती तीस मिनट तक यही लगता रहा कि  रजनीकांत की बुलेट ट्रेन में नहीं बल्कि धीमे-धीमे चलने वाली किसी आम रेलगाड़ी में सवार हूं  लेकिन कुछ देर हिचकोले खाने के बाद लिंगा एक्सप्रेस अतीत के झरोखे में दाखिल हो जाती है। हम ब्रिटिश काल के एक सुंदर कालखंड में जा पहुंचते हैं।  एक ईश्वर तुल्य नायक को अन्याय और प्रकृति से युद्ध  करते देखते हैं। इस स्वप्नलोक में विचरते हुए देशप्रेम की भावना से आल्हादित होते हैं।

एस रविकुमार द्वारा निदेर्शित लिंगा की कहानी एक छोटे से गांव सोलाइयुर से शुरू होती है। यहां की नदी पर बना बरसों पुराना बांघ स्थानीय सांसद नागभूषण की आंखों में खटक रहा है। वह यहां आधुनिक बांध बनवाने के बहाने बड़ा भ्रष्टाचार करने की योजना बना रहा है। इसी गांव में राजा लिंगेश्वरन का मंदिर है। इस मंदिर को खुलवाने के लिए लिंगेश्वरन के ही परिवार का व्यक्ति चाहिए। खोज शुरू होती है और मालूम होता है कि लिंगेश्वरन का पोता लिंगा अब एक शातिर चोर बन चुका है। 
इस कहानी को एस रविकुमार ने बहुत भव्यता से परदे पर उतारा है। राजा लिंगेश्वरन का इतिहास बताने के लिए फिल्म हमें 1939  के ब्रिटिश शासित भारत में ले जाती है। फिल्म का यही हिस्सा सबसे असरदार है। देखा जाए तो शुरूआती आधे घंटे में निर्देशक ने रजनीकांत के परंपरागत दर्शकों को खुश करने का प्रयास किया है। दो डांस नंबर और कामेडी के चंद दृश्यों के बाद  कहानी ट्रेक पर आती है। हालांकि शुरू के तीस मिनट और चलताऊ  क्लाइमैक्स फिल्म के संपूर्ण प्रभाव को कम करते हैं। राजा लिंगेश्वरन की एंट्री वाला सीक्वेंस एक ट्रेन में फिल्माया गया है और खासा दिलचस्प है। इस सीन में वीएफएक्स का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। लिंगेश्वरन का किरदार ही फिल्म की रीढ़  है। निर्देशक ने रजनीकांत को एक उदार राजा, एक सिविल इंजीनियर और एक रसोइये के रूप में पेश किया है। रजनी के किरदार में बहुत से शेड्स है, और हर उन्होंने ये विभिन्नताओं से भरा किरदार बहुत अच्छे से परदे पर उतारा है। सोनाक्षी सिन्हा अपनी पहली तमिल फिल्म में बहुत सहजता से प्रस्तुत हुई हैं। उनकी भूमिका दर्शक पर छाप छोडऩे में कामयाब होती हैं। निर्देशक ने ब्रिटिश भारत को फिल्माने के लिए बहुत श्रम किया है। ब्रिटिश कालीन मुद्रा से लेकर पात्रों की वेशभूषा तक सभी असलियत के बहुत करीब नजर आता है। कालखंड फिल्मों में इस बात का बहुत ध्यान रखा जाता है कि सीन में नजर आ रही कही पड़ी कोई सुई भी उसी काल की लगनी चाहिए। इस मामले में निर्देशक सफल रहे हैं। लिंगा ने रीलिज होते ही दर्शकों का दिल जीत लिया तो उसकी ये वजह है कि राजा लिंगेश्वरन का किरदार रजनीकांत की असली जिंदगी के करीब लगता है। रील लाइफ के साथ वे रियल लाइफ में भी लिंगेश्वरन की तरह परोपकारी हैं। यदि आप रजनीकांत के प्रशंसक हैं और स्वस्थ मनोरंजन के साथ देशप्रेम का संदेश देखना चाहते हैं तो लिंगा आपको निराश नही करेगी। हां रियलिस्टक फिल्मों के दर्शकों को शायद ये लिंगा एक्सप्रेस का सफर उतना नहीं सुहाएगा। अंग्रेजीदां समीक्षक इस फिल्म को औसत बता रहे हैं लेकिन  ऐसी सारी समीक्षाओं को नकारती हुई लिंगा एक्सप्रेस हर दिन और तेज होती जा रही है क्योंकि इस तेज भागती रेलगाड़ी में जो ईध्न भर रहा है। वो एक आम आदमी है, सिंगल थिएटर में सस्ता टिकट लेकर रजनी को किवंदती बनाने वाला आम दर्शक।

मास्टर सीन
बांध बनाते समय ंिब्रटिश कलेक्टर का एक भेदिया जाति के नाम पर काम करने वालों में फूट डाल देता है। बांध का काम रूक जाता है। ब्रिटिश कलेक्टर की साजिश सफल होती दिख रही है। ये बात जानकर राजा लिंगवर्धम साइट पर आते हैं।इस सीन में निर्देशक एक कदम आगे खड़ा होता है। वो बांध प्रतीक बन जाता है भारतीय एकता का।  रजनीकांत यहां दिखाते हैं कि उन्हें यूं ही नहीं दर्शक सिर आंखों पर बैठाते। 

इंडिया रे आओ
गुलजार ने एआर रहमान के लिए इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बड़े अरसे बाद उनकी कलम से देशप्रेम झरा है। इसमें से एक गीत पूरी फिल्म में प्रतिध्वनित होता है। इस गाने के चंद बोलों के साथ आपको छोड़े जा रहा हूं। 
इंडिया रे आओ, मुठ्ठी में दरिया पकड़ के चलो 
बंधु रे आओ, पर्वत से उतरो अकड़ के चलो
आओ गरजते और बरसो, बारिश की बौछार बन के आओ 
इंडिया रे आओ

Saturday, December 20, 2014

फिल्म समीक्षा- नानी की कहानी है पीके


 जो कृति या रचना हमें सबसे ज्यादा छूती है, उसमें एक ईश्वरीय स्पर्श होता है, कुछ अनदेखा सा, अदृश्य सा बस महसूसता हुआ मन को आल्हादित कर देता है। राजकुमार हीरानी की पीके देखते हुए हम इसी अनुभव से गुजरते हैं और ऐसे हो जाते हैं जैसे बरसों ऐसे ही पड़े किसी आइने पर से अचानक धूल हटा दी गई हो। पीके हमें सोती नींद से जगाता है, झकझोरता है, हंसाता है, रूलाता है। 
ये पूरा साल मैकेनिकल फिल्मों से भरा रहा। ढेर सारा मनोरंजन लेकिन सार्थकता सिरे से गायब। लग रहा था कि फिल्म उद्योग एक फैक्टरी हो और चमकदार पैकिंग में लिपटी फिल्में हर शुक्रवार  चली आ रही हो। लेकिन साल के अंत में हम ऐसी फिल्म देखते हैं जो जीवंतता से भरी हुई है।  कहानी बस इतनी है कि एक एलियन अपने स्पेसशिप से धरती पर उतर जाता है। इससे पहले कि वो भोला प्राणी धरतीवासियों की चपल चालाकी को भांप पाए, उसका कॉलिंग डिवाइस चोरी हो जाता है। अब पीके इस डिवाइस के बगैर अपने ग्रह पर नहीं जा सकता। लगती तो ये साधारण कहानी है मगर इसके पेंच जितने मनोरंजन से भरे हैं उतने ही मानवता की पाठशाला के मनकों की तरह है। पीके धरती पर नंगा आया है क्योंकि उसके ग्रह पर कोई कपड़े नहीं पहनता। उसे समझ नहीं आता कि यहां हर धर्म के इतने भगवान क्यों हैं और भगवान को अपना काम करवाने के लिए पैसा क्यों देना पड़ता है। फिल्म मनोरंजक ढंग से समाज की कुरीतियों और पाखंडी महात्माओं पर करारी चोट करती है। इस बार विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी ने विश्व स्तर का सिनेमा रचा है। इसके कुछ दृश्य दर्शक के मानस पटल पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। मसलन आमिर की एंट्री वाले दृश्य में कैमरे ने कमाल का काम किया है। रेल्वे स्टेशन पर आतंकी हमले के एक अन्य दृश्य में दिखाया गया है कि आमिर के गले में लटका ट्रांजिस्टर किसी के धक्के से अचानक ऑन हो जाता है और किसी पुरानी फिल्म का गीत बजने लगता है। क्षत-विक्षत शवों के ढेर, धुल के गुबार के बीच बजता ये प्रेमगीत एक शोकधुन में बदल जाता है। यहां पीके के चेहरे पर वैसी ही दहशत दिखाई देती है, जैसे कोई कबूतर गोली की आवाज सुनकर दहशत के मारे कांप उठा हो। इस एक दृश्य को फिल्माने के लिए राजकुमार हीरानी और आमिर खान शत-शत बधाई के पात्र हैं। एक एलियन का किरदार निभाना आमिर के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा होगा। वे बड़ी सहजता के साथ कठिन दृश्यों को निभा ले जाते हैं। अनुष्का शर्मा ने अपने किरदार को गहराई से जिया है। वे हिंदी फिल्म उद्योग में एक बड़ी संभावना बनकर उभरी हैं। सुशांत सिंह राजपूत का किरदार छोटा मगर बहुत महत्वपूर्ण था और उन्होंने सलीके के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अदाकारी, निर्देशन, स्कीनप्ले और कैमरा वर्क के लिहाज से पीके एक मास्टरपीस है। बेजोड़ संवाद तीर की तरह दिल में धंसते महसूस होते हैं। एक दृश्य में आतंकी हमले में अपने एक दोस्त को खो देने के बाद पीके कहता है खुदा को बचाने के लिए मेरे भाई को मार दिया, ये  कैसा धर्म है। संयोग की बात है कि पीके की विषयवस्तु मौजूदा वैश्विक माहौल में बेहद प्रासंगिक लग रही है। जाति और धर्म को लेकर अचानक छिड़ा उन्माद, आतंकी हमला और हमारी धार्मिक कुरीतियां ये सभी कुछ पीके में रिफलेक्ट होता है। मानो दुनिया के सामने हीरानी ने एक बड़ा सा आइना रख दिया हो। 
राजकुमार हीरानी की डिक्शनरी में मनोरंजन के मायने बहुत जुदा होते हैं। उनके मनोरंजन में सलमानी ठाठबाट नहीं होता। उनका मनोरंजन सार्थक होता हैै। जैसे बचपन में नानी मां की कहानियां खूब हंसाती थी तो उनके भीतर एक सबक भी होता था। पीके उसी नानी मां की एक कहानी लगती है।