Thursday, June 20, 2013

फिल्म समीक्षा : सुपरमैन के सूट में ये तो 'बैटमैन' है


ऐसा क्यों होता जा रहा है कि हमारी फिल्मों की तकनीक जितनी विकसित होती जा रही है, कहानियों का भाव पक्ष उतना ही कमज़ोर होता जा रहा है। निर्माता क्रिस्टोफर नोलान की 'रिबूट सुपरमैन मूवी' मैन ऑफ़ स्टील देखते हुए मेरा यकीन इस बात में और भी पुख्ता हो गया। सच कहू तो फिल्म शुरू होने से पहले मैं ये देखने के लिए  बहुत उत्सुक था कि सुपरमैन की कहानी को नई तकनीक के साथ कैसे पेश किया जायेगा, उत्सुकता स्वाभाविक थी क्योकि हमने बचपन से सुपरमैन की फिल्मे देखते कभी नहीं सोचा था कि हम इसकी कहानी को नई तकनीक के साथ रिवर्स होते कभी देख पाएंगे।  क्रिप्टान ग्रह से एक केप्सूल में सुपरमैन की एंट्री, पहली बार उसकी उड़ान और एक पत्रकार के रूप में उसका जीवन, ये ऐसे लम्हे हैं, जिनके बगैर सुपरमैन की कहानी बेजान हो जाती है। मैन ऑफ़ स्टील ऐसी ही बेजान फिल्म है, जिसमे हमारे प्रिय नायक और सुपरहीरोज के अटल नियमो का चूरण बना कर दर्शक को चटा दिया जाता है। सुपरमैन को हम पहली बार एक ऐसे शख्स के रूप में देखते हैं, जो अपनी अभूतपूर्व शक्तियों को छुपाये रखता है और इस कारण गहरे अवसाद का शिकार हो जाता है। क्या हम अब अपने बच्चों को ऐसा सुपरमैन दिखाना चाह रहे हैं, जिसे दुनिया बचाने से पहले अपने अवसाद से लड़ना पड़ता हो। तकनीक और धमाको से भरपूर होने के बावजूद मैन ऑफ़ स्टील बड़ी ही सूखी फिल्म जान पड़ती है क्योकि निर्देशक जेक स्नायडर ने इसे सिरे से एक डार्क बैटमैन मूवी बनाने की असफल कोशिश की है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योकि निर्माता क्रिस्टोफर नोलान एक बैटमैन मूवी के नायक हैं। उनकी बैटमैन वाली मानसिकता इस फिल्म को कोढ़ की तरह लग गई है। सुपरमैन जब उसकी कॉमिकनेस के साथ पेश होता है, तभी दर्शको को भाता है। बैटमैन और सुपरमैन के बेकग्राउंड बिलकुल जुदा है। बैटमैन पर बचपन की त्रासदियो का गहरा असर है और इसलिए वो अकेला रहना पसंद करता है। इसके उलट केंट क्लार्क एक मिलनसार सुपर हीरो है। उसे बड़े प्यार से पाला गया है और वो कभी किसी अपराधी को जान से नहीं मारता। मैन ऑफ़ स्टील में वो कॉमिकनेस नज़र ही नहीं आती।  सुपरमैन आधी फिल्म तक तो खुद से ही जूझता रहता है और जब कहानी विस्तार लेने लगती है तो निर्देशक क्लाइमेक्स को अंतहीन धमाकों और बेवजह की लड़ाई से पाट देते हैं। फिल्म की एडिटिंग बेहद बकवास है। फ्लेश्बेक के दृश्यों और वर्तमान में चल रहे दृश्यों में इतना घालमेल है कि कई बार कहानी समझने में समस्या होने लगती है। कैसे सुपरमैन  क्रिप्टान के बर्फ में दबे यान तक पहुँच जाता है, कैसे उसके पृथ्वी वाले माता-पिता को पता चलता है कि वो बच्चा अद्भुत शक्तियां लेकर धरती पर आया है। इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। किसी भी सुपर हीरो की पहली फिल्म उसके भविष्य में आने वाले सारे संस्करणों की जननी होती है। सुपर हीरो को उसकी शक्तिया कैसे मिली, वो पहली बार कैसे उड़ा, उसकी पहली लड़ाई, सभी कहानी के अहम् हिस्से होते हैं। याद करें सेम रयामी की स्पाइडर मैन को। जब पीटर को पहली बार अहसास होता है कि वो पास उड़ रही मक्खी की हर हरकत को गौर से महसूस कर सकता है। मैन ऑफ़ स्टील में पहली उड़ान पर निकला सुपरमैन महज तीन प्रयासों में अन्तरिक्ष की सैर कर आता है। निर्देशक को कोई समझाओ कि ये एक महानायक के जन्मने की कहानी है, उसके परिपूर्ण होने की नहीं। दूसरी बड़ी खामी ये है कि विलेन से भयानक लड़ाई लड़ने के बाद सारे शहर को मालूम हो जाता है कि सुपरमैन कौन है। अब अगली फिल्म में पुलिस को सुपरमैन की मदद लेनी होगी तो वो सीधे पत्रकार केल- ई ( सुपरमैन का नया नाम) के घर पहुँच सकती है। इस तरह निर्देशक ने अपने सुपर हीरो की गोपनीयता पहले ही भाग में तार-तार कर दी है। फिल्म में सुपरमैन का पारम्परिक दुश्मन लूथर गायब हो जाता है, यहाँ सुपरमैन को अपने ही ग्रह के लोगों से मुकाबला करना है। जनरल जोड और सुपरमैन की आखिरी लड़ाई इतनी जबरदस्त होती है कि जमीन से लेकर अन्तरिक्ष में तैर रही सेटेलाईट तक उनके कोप का शिकार हो जाते हैं। दर्शक सर पकड कर सोचने लगता है कि ये जोड आखिर क्या खाकर पृथ्वी पर आया है। मुझे ये विलेन दक्षिण भारतीय फिल्मों के उन खलनायकों की तरह लगा जो बीस गोली खाकर उस  वक्त उठ खड़े होते है जब हीरो-हिरोइन माँ बाप समेत द एंड वाले शॉट में जाने की तैयारी कर रहे होते हैं।  , जोड़ मुझे कुंगफु से युक्त उन चीनी फिल्मों के विलेन की तरह भी लगा, जिसे लड़ते देख लगने लगता है कि इसे मारने के लिए खुद भगवान को नीचे आना पड़ेगा। कहने का मतलब यही है कि 'बैटमैन' क्रिस्टोफर नोलान के डार्क  'फिंगरप्रिंट्स' मैन ऑफ़ स्टील पर दिखाई देते हैं। सुपरमैन की कॉमिकनेस लहुलुहान हो चुकी है क्योकि अपने 55 साल के इतिहास में पहली बार सुपरमैन ने किसी को जान से मारा  है। 
















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