1933 का साल, अमेरिका के एक शहर क्लेवलेंड में दो हाईस्कूल के विद्यार्थी एक कामिक्स केरेक्टर बनाने में जुटे थे। दुनिया भर की कामिक्स पढ़ लेने के बाद जेरी सिगल और जो शुस्टर के दिमागी घोड़े एक ऐसे सुपरहीरो के चरित्र को गढ़ रहे थे, जिसकी चमक अगले सौ सालों में भी फीकी नहीं पड़ने वाली थी। जेरी और शुस्टर की कल्पना से ' सुपरमैन' निकल कर डीसी कॉमिक्स का मुख्य नायक बना और इतना कामयाब हुआ कि उस पर कई फिल्मे बनी और दुनियाभर में जबरदस्त हिट रही। 1940 से लेकर 80 के दशक तक सुपरमैन कॉमिक्स और फिल्मों का बेताज बादशाह बना रहा, जब तक कि बेटमैन और केप्टन अमेरिका सुपरहीरो के रूप में उसे चुनौती देने नहीं आ गए। सुपरमैन अकेला ऐसा चरित्र रहा है, जो पृथ्वी का नहीं है बल्कि एक अन्य ग्रह क्रेप्टन से आया है। उसकी मज़बूरी है कि वह अपना असली रूप केवल अपराधियों से लड़ते समय ही दिखा सकता है, इसलिए उसे सामजिक जीवन में पत्रकार केंट क्लार्क का भेस धरना पड़ता है। सुपरमैन की बात इसलिए की जा रही है कि बहुत जल्द सुपरमैन सीरिज की नई फिल्म ' मैन आफ स्टील' प्रदर्शित होने वाली है। इसके प्रोमो में नज़र आ रहा है कि हमारे प्यारे नायक को सिरे से बदल दिया गया है। पहले उसका सूट बहुत अलग ढंग का था लेकिन आज उसका सूट अत्याधुनिक हो गया है। हालाँकि ये बदलाव अच्छा लग रहा है। दरअसल इस बार वार्नर ब्रदर्स ने नए सुपरमैन को डीसी कामिक्स के सुपरमैन से प्रेरित होकर बनाया है। इससे पहले 2006 में प्रदर्शित हुई 'सुपरमैन रिटर्न्स' एक ऐसे कोण पर समाप्त हुई थी, जहाँ से आगे कहानी का कोई सिरा नहीं निकाल जा सकता था। फिल्म ने दुनिया भर में बेहतरीन कमाई की लेकिन साथ ही साथ फिल्म निर्माताओं को ये आलोचना भी झेलनी पड़ी कि बच्चों का सुपरहीरो अब 'एडल्ट' हो गया है। दरअसल पिछली फिल्म में केंट क्लार्क और उसकी प्रेयसी के संबंधों से 'मिनी' सुपरमैन ने जन्म ले लिया था और ये बात दुनियाभर के अभिभावकों और फिल्म समालोचकों को नागवार गुजरी। काफी विचार विमर्श के बाद तय किया गया कि सुपरमैन को 'रिबूट' किया जाये, जैसा कि स्पाईडरमैन सीरिज के साथ किया गया। रिबूट याने कहानी को दुबारा नए अंदाज़ के साथ शुरू करना। रिबूट परंपरा भारतीय फिल्मों में अब तक देखने में नहीं आई है। हो सकता है 'कृष' के कई संस्करण बनाने के बाद राकेश रोशन फिर मूल कहानी पर लौटे और कृष के लिए नया चेहरा लेकर आये, ऐसा ' धूम' के साथ भी हो सकता है। फिल्म समालोचक जयप्रकाश चौकसे का मत है कि अमेरिका का इतिहास समृद्ध नहीं है और इसलिए उसे अपने 'बचपन' को प्रेरित करने के लिए ऐसे नायक गढ़ने पड़ते हैं। लेकिन पौराणिक नायकों की तो हमारे यहाँ भी कमी नहीं है तो फिर वेताल, चाचा चौधरी, साबू , ध्रुव के लिए स्वीकार्यता हमारे बच्चों में क्यों दिखाई देती है। कारण साफ़ है कि पौराणिक नायक मौजूदा दौर में अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, शायद इसलिए किसी फिल्म में हमें भगत सिंह या चंद्रशेखर आज़ाद या कृष तो प्रेरित करते हैं लेकिन पौराणिक नायक नहीं। भारत का जन मानस अपने नायक चुनने के मामले में पूरी दुनिया से अलग ही दिखाई देता है। कभी अन्ना हजारे हमारे सुपर हीरो हो जाते हैं तो कभी सचिन अपनी अविश्वसनीय पारी से दुसरे लोक के होने का अहसास कराते हैं। दरअसल विश्व के सारे समाजों की सरंचना ही कुछ ऐसी है कि उन्हें अपने एक सुपरहीरो की दरकार होती है, आज भारत की जनता नरेन्द्र मोदी में अपना सुपरहीरो देख रही है। जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही 'मैन ऑफ़ स्टील' में इस बार सुपरमैन का किरदार ब्रिटिश कलाकार हेनरी काविल को दिया गया है। निर्देशक जैक स्नेडर ने रिबूट करते हुए सुपरमैन के व्यक्तित्व में काफी नई बातें जोड़ी हैं, जैसे सुपरमैन के जन्म का नाम अब तक नहीं रखा गया था। सुपरमैन के बचपन का नाम है ' केल-ई ', जो बाद में केंट क्लार्क में बदल जाता है। हेनरी को इस किरदार के लिए रोज दो घंटे जिम में बिताने पड़ते थे और प्रोटीन पावडर लेने पड़ता था। उन्हें रोज 5000 कैलोरी की खुराक लेनी पड़ती थी। कुछ देशों में प्रदर्शित हो चुकी मैन ऑफ़ स्टील जल्द ही भारत में आ रही है और ये तय है कि ये पॉवर पैक्ड एंटरटेनमेंट जबरदस्त दर्शक बटोरेगा।

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