इस देश में आजादी के बाद से ही आम आदमी की ईमानदारी को भ्रष्टाचार की दीमक भीतर ही भीतर खाती रही है। शक्तिशाली लोगों के लिए बनी राजनीतिक व्यवस्थाएं इस मैराथन के वो बैरियर हैं, जिन्हें एक आम आदमी ताउम्र लांघ नहीं पाता। शुकवार को प्रदर्शित हुई फिल्म इक्कीस तोपों की सलामी हमारी भ्रष्ट मशीनरी को मारा गया करारा तमाचा है और देश के आम नागरिक के सम्मान में ठोंका गया सैल्यूट। दिवाली के पहले नॉन बिजनेस पीरियड में प्रदर्शित हुई इस फिल्म को एक गैपिंग फिलर के रूप में देखा जा रहा था लेकिन यदि इसे हैदर और बैंग-बैंग के सामने भी उतारा जाता तो सशक्त कहानी और बेमिसाल अदाकारी के दम पर ये अपना स्थान सहज ही बना सकती थी।
फिल्म मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन के एक मेहनती और ईमानदार जमादार पुरूषोत्तम जोशी की कहानी कहती है। पुरूषोत्तम जोशी शहर की गटरों में दवा छिडक़ने का काम करता है। 37 साल की नौकरी में उस पर कभी कोई दाग नहीं लगा लेकिन नौकरी से रिटायरमेंट वाले दिन अपने वरिष्ठ की बेईमानी के कारण उसकी पेंशन रोककर प्रशासनिक कार्रवाई कर दी जाती है। सहृदय पुरूषोत्तम इस सदमे को सह नहीं पाता और उसकी मौत हो जाती है। अपने आखिरी पलों में वो अपने बेटे से कहता है कि यदि मेरी मौत को सम्मान दिलवाना चाहते हो तो मुझे चिता देने से पहले इक्कीस तोपों की सलामी दिलवाना, तभी मेरी आत्मा को शांति मिलेगी। अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए बेटा शेखर एक योजना बनाता है। योजना है कि ठीक उसी दिन मुत्यु को प्राप्त हुए राज्य के मुख्यमंत्री के शव की जगह बाबूजी के शव को रख दिया जाए तो उन्हें इक्कीस तोपों की सलामी नसीब हो सकती है।
यकीनन पुरूषोत्तम जोशी के किरदार में अनुपम खेर ने प्राण फूंक दिए हैं। उनकी अद्भुत बॉडी लैंज्वेज, आंखों का अभिनय और टाइमिंग देखकर युवा अभिनेता सीख सकते हैं कि मैथर्ड एक्टिंग क्या होती है और किस तरह से एक किरदार को अपनी आत्मा में जिया जाता है। अनुपम खेर का किरदार फिल्म में मध्यांतर से पहले ही मर चुका है और बाद में अंत तक वह एक शव के रूप में दिखाई देता है, बिलकुल फिल्म जाने दो यारों में सतीश शाह के किरदार की तरह। अनुपम खेर ने अपने किरदार के इस हिस्से को ऐसे निभाया है कि सतीश शाह भी पीछे छूट जाते हैं।
फिल्म में यदि राजनीतिक ड्रामा वास्तविकता के नजदीक दिखाई देता है तो उसका सेहरा राजेश शर्मा के सिर बंधना चाहिए, जिन्होंने एक भ्रष्ट मुख्यमंत्री के किरदार को वास्तविकता के साथ पेश किया है। दया शंकर पांडे का किरदार मौजूदा भ्रष्ट नेताओं की सटीक तस्वीर पेश करता है। पांडे एक टीवी रिपोर्टर से इसलिए खफा है क्योंकि एक खबरिया चैनल ने एक फिल्म अभिनेत्री के साथ उसके अनैतिक संबंधों का खुलासा कर दिया है।
एक दृश्य में दयाशंकर पांडे उस रिपोर्टर से कहता है कि मेरा चरित्र हनन करने के बजाय मेरा 1200 करोड़ का घोटाला दिखाओं, तुम्हे कौन रोक रहा है। दिखाया गया है कि एक राजनेता को भ्रष्टाचार के आरोपों की फिक नहीं है क्योंकि इनसे तो वो अदालत में निपट सकता है लेकिन चरित्र हनन के बाद जनता की अदालत में बरी होना मुश्किल है। मुख्यमंत्री की मां कलावती भी मन ही मन राजनीतिक महात्वाकांक्षा पाले बैठी है। मुख्यमंत्री बेटे की मौत होने का उसे दु:ख नहीं है लेकिन इस बात की चिंता है कि स्विस बैंक में जमा बेटे का अरबों रूपया अपने खाते में कैसे डाले और किस तरह उसकी गद्दी की उत्तराधिकारी बन जाए।
फिल्म के क्लाइमैक्स में उत्तरा बावकर को हम एक मंझी हुई अभिनेत्री के रूप में देखते हैं। उनकी अदाकारी से अंतिम भाग में फिल्म बहुत रोचक हो जाती है। निर्देशक ने कहानी को हास्य में लपेटकर प्रस्तुत किया है इसलिए दर्शक उबाउपन महसूस नहीं करता। क्लाइमैक्स बेहद दिलचस्प बनाया गया है और फिल्म की व्यावसायिक सफलता सुनिश्चित करता है। पुरूषोत्तम जोशी का एक संवाद पूरी फिल्म को परिभाषित कर देता है। एक जगह वह कहता है मैंने कई बार ईमानदारी से जीतने की कोशिश की लेकिन बेईमानी और चालाकी की टंगड़ी से हर बार ईमानदारी ढेर हो गई। कितना सुखद संयोग है कि इस वक्त देश में स्वच्छता को लेकर मौजूदा सरकार ने एक अलख जगाया है और इक्कीस तोपों की सलामी में एक कर्मठ सफाई जमादार को आदरांजलि दी गई है।

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