Tuesday, October 7, 2014

ऋतिक के कंधों पर सवार बैंग- बैंग


बीते शुकवार बॉक्स आफिस पर दो फिल्में प्रदर्शित हुई। विशाल भारद्धाज द्वारा निर्देशित हैदर को समीक्षकों की सराहना तो बहुत मिली लेकिन टिकट खिडक़ी ने उस पर सिक्कों की बारिश नहीं की। इसी के साथ प्रदर्शित हुई निर्देशक सिद्धार्थ आनंद की फिल्म बैंग-बैंग पर सिक्कों की बौछार तो बहुत हो रही है लेकिन अधिकांश समीक्षकों ने इसे सिरे से नकार दिया है। हर दौर में फिल्म समीक्षाओं का रंगढंग बदलता रहा है। कुछ साल पहले तक समीक्षाएं बाजार से प्रभावित होकर नहीं लिखी जा रही थी, उनमेें सामाजिक जिम्मेदारी का पुट होता था। शोले का ही उदाहरण लें, जब यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो समीक्षकों ने इसे अति हिंसा से भरी फिल्म बताया और लोगों को इसे न देखने की सलाह दी। नतीजा ये हुआ कि लगभग एक हफ्ते तक शोले को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया। इसके बाद यदि शोले ने इतिहास रचा तो इसमें उस दौर की माउथ पब्लिसिटी का बड़ा योगदान रहा है। इससे एक बात और साबित हुई कि एक फिल्म समीक्षा न तो किसी बेहतर फिल्म की सफलता पर असर डाल सकती है और न ही किसी बेदम फिल्म को बॉक्स आफिस पर हिट करवा सकती है। विशाल भारद्वाज की हैदर एक सीरियस सिनेमा है और उन्होंने वाकई में इसके एक एक फ्रेम को बेहद खूबसूरती से सजाया है। समीक्षकों ने भी इस फिल्म की शान में कसीदे गढ़ दिए लेकिन हमेशा की तरह कालीन के नीचे दबी रहने वाली माउथ पब्लिसिटी तो कुछ और ही कह रही थी। एक अच्छी फिल्म होने के बावजूद हैदर ने बॉक्स आफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। 

बॉक्स आफिस शुरूआती दौर से ही बड़ा रहस्यमयी रहा है। अकसर देखा गया है कि त्यौहारी माहौल में दुखांत या डार्क नेचर की फिल्में सफल नहीं हो पाती हैं। एक आम भारतीय दर्शक इन दिनों हर ओर  उल्लास का वातावरण चाहता है, यहां तक कि सिनेमाघरों में भी उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की दरकार होती है। बैंग-बैंग के बारे में भी समीक्षकों के सारे अनुमान गलत साबित हुए। शायद वे हैदर को अपने दिमाग में रखकर ले गए थे और एक अलग विषय पर बनी फिल्म से इसकी तुलना कर रहे थे। बैंग-बैंग हॉलीवुड की एक कामयाब फिल्म नाइट एंड डे की रीमेक है। नाइट एंड डे में टॉम कूज और कॅमरान डियाज की केमेस्ट्री को अनोखे ढंग में पेश किया गया था।

ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि बैंग-बैंग नाइट एंड डे के स्तर को नहीं छू पाई है लेकिन यहां सर्वस्पर्शी ऋतिक सारी कमियों को बखूबी ढंक देते हैं। भले ही फिल्म का कथानक कमजोर हो लेकिन सिचुएशन को समझ कर इस्तेमाल किए गए एक्शन और गीतों का भव्य फिल्मांकन कथानक की कमजोरी भूला देते हैं। कॅटरीना भी अपने कमजोर अभिनय पर मादक सुंदरता का लेप लगा देती हैं। एक स्वप्न गीत है और इतनी शिद्दत से फिल्माया गया है कि दिल से आह निकल जाती है। इन सबसे उपर ऋतिक की स्टार पॉवर ं एक मजबूत आधार स्तंभ की तरह काम करती है। ऋतिक शुरू से ही बॉक्स आफिस की रेस का एक भरोसेमंद और विजेता घोड़ा रहा है। 

सलमान खान की तरह ऋतिक का तेजोमयी आवरण भी टिकट खिडक़ी पर एक जादुई दवाई का काम करता है। नि:संदेह अपनी पत्नी से तलाक के बाद बैंग-बैंग का कामयाब होना ऋतिक के लिए जैसे जीवन-मरण का प्रश्न बन गया था और अपने प्रशंसक वर्ग के दम पर वे सफल हुए हैं। आमिर खान की तरह ही अपने किरदारों को सांसों में जीने वाले ऋतिक ने बैंग-बैंग को नकारने वाले समीक्षकों को बॉलीवुड के अखाड़े में पटखनी दे डाली है। सिंधु घाटी की सभ्यता पर आशुतोष गोवारिकर की पीरियड फिल्म के लिए खुद को नए सिरे से तैयार कर रहे ऋतिक के लिए इस बार की दीपावली बैंग-बैंग साबित हुई है।


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