Sunday, September 21, 2014

पड़ोसी के खुशनुमा ख़त

सरहद पार से सिर्फ एक टीवी चैनल आता है और आरटीपी के आभासी झूलों पर पेंगे भर रहे तमाम टीवी चैनल जैसे जमीन पर आ गिरते हैं। 'जिन्दगी' चैनल के धारावाहिक कहानी, निर्देशन और अभिनय के स्तर पर हमारे चलताऊ धारावाहिकों से कही बेहतर नज़र आ रहे हैं। 'थकन', "कितनी गिरहे बाकी है', जैसे धारावाहिकों ने दूरदर्शन से प्रेरणा लेते हुए अपनी कहानियों को तेरह कड़ियों में पूर्ण करने का ट्रेंड जिन्दा कर दिया है। आज 'थकन' ने अपनी तेरह कड़ियों का छोटा सा खूबसूरत सफर खत्म कर लिया और इन तेरह दिनों में सदफ़(धारावाहिक की मुख्य पात्र) दिल पर एक छाप छोड़ गई। इधर हमारे घरेलु दर्शको पर राज कर रहे धारावाहिकों के निर्माता अब 'जिन्दगी' चैनल से खौफ़जदा हो गए हैं। एकाध चैनल पर जिन्दगी से प्रेरित होकर मुस्लिम पृष्ठभूमि के सीरियल खानापूर्ति के लिए शुरू कर दिए गए हैं ताकि 'जिन्दगी' के दर्शक छीने जा सके। लेकिन कोई ऐसा कर रहा है तो उस बड़े बदलाव से अनछुआ है जो जिन्दगी चैनल मनोरंजन की दुनिया में ले आया है। पाकिस्तान ने भले ही हमें बेहतरीन शक्कर के सिवा कुछ न दिया हो लेकिन टीवी की दुनिया में वहां की इन कहानियों ने हमारे धारावाहिक निर्माताओं को आईना दिखा दिया है। कम बजट में वे सशक्त कथानक के साथ दिल जीतने वाली कहानियां पेश कर रहे हैं और अचानक हमारे सास बहु टाइप धारावाहिक ट्रेंड से बाहर नज़र आ रहे हैं। यदि हमारा पड़ोसी दीवार के उस पार से पत्थर फेंकने के बजाय ऐसे खुशनुमा ख़त फेंके तो भला किसे एतराज़ होगा।

Tuesday, March 11, 2014

नोह जब अपना परिवार चुनता है


नोह अपनी विशालकाय नाव में लेटा एक झरोखे से बादलों से भरे आसमान की ओर ताक रहा है. तभी पहली बारिश की एक बूंद उसके चेहरे पर आ गिरती है. नोह बुदबुदाता है ' प्रलय शुरू हो गई'. बुक ऑफ़ जेनिसिस' में लिखी नोह की कहानी भारत की सरहदों में प्रवेश करते ही 'मनु' की कहानी में बदल जाती है. नोह हो या मनु, वो एक ऐसा शख्स था जिसने मानव जाति को विलुप्त होने से बचाया था. जल प्रलय से बचने की ये असम्भव गाथा  पहले भी बड़े परदे पर उतारी जा चुकी है लेकिन इस बार हमारा ये सर्वकालिक महानायक एक नए अंदाज़ में बड़े परदे पर दिखाई देने वाला है.

      हॉलीवुड के प्रतिभाशाली अभिनेता रसेल क्रो ने इस चुनौतीपूर्ण किरदार को अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से निभाया है.भारत में 28 मार्च को प्रदर्शित होने जा रही 'नोह' मानवता के मसीहा को अलग ढंग से दर्शकों के सामने रखेगी। नोह सम्पूर्ण मानवता के लिए श्रद्धा और शोध का विषय है और कई वैज्ञानिकों ने प्राचीन काल में जल प्रलय के वक्त बनी विशालकाय नाव के अवशेष मिलने का दावा भी किया है.

जब मैंने रसेल क्रो को नोह के अवतार में देखा तो अचानक ही अमीष की लिखी 'मेहुला' का स्मरण हो आया. मेहुला की  सबसे खास बात यही थी कि उसमे शिव दैवीय रूप के विपरीत साधारण मानव अवतार में प्रस्तुत किये जाते हैं. मानवता के  लिए शस्त्र उठाने और अपने असाधारण प्रेम से गुजरने के बाद वे 'शिव' हो जाते हैं. ठीक इसी तरह नोह में रसेल क्रो को एक साधारण इनसान के रूप में प्रस्तुत किया गया है. यहां वो किसी चोगे में नहीं दिखाई देते बल्कि एक आम बढ़ई के किरदार में सामने आते हैं जो ईश्वर के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम कर रहा है.

     रसेल की खासियत है कि वे अपने किरदार में डूब कर काम करते हैं और नोह के किरदार में उनके भीतर का लोहा फिर दहकता हुआ दिख रहा है. नोह एक जटिल किरदार इसलिए है कि उनके बारे में केवल एक कहानी उपलब्ध है, जो ' बुक ऑफ़ जेनिसिस ' के संदर्भो से तैयार की गई है. इस कहानी में नोह के व्यक्तित्व के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती इसलिए फ़िल्म के निर्देशक डेरेन आरोनस्काई और लेखक अरी हेंडल के लिए परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण रही होंगी। नोह का समाज निर्मित करना, उसके परिवार को गढ़ना और सबसे ऊपर उस दौर के समाज की मानसिकता दिखाना, जो नोह की विशाल नाव के विरोध में उठ खड़ा हुआ होगा।  फ़िल्म को नोह के प्राचीन दौर का लुक देने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ी. न्यूयॉर्क में नोह की नौका का विशाल मॉडल तैयार किया गया और जानवरों को वर्चुअली तैयार करना भी बड़ा सिरदर्द था.  लगभग एक हज़ार साल पहले की पृथ्वी का वातावरण पाने के लिए लोकेशंस की तलाश करने में भी टीम को काफी वक्त लगा.

अब बात ईश्वर के उस आदेश की, जिसके बाद नोह को विशाल नाव बनाने की प्रेरणा मिली। 'बुक ऑफ़ जेनिसिस' में लिखा है कि ईश्वर ने नोह से कहा कि ' भयंकर बाढ़ आने को है और केवल तुम्हारा परिवार बच सकेगा। इसी पल  नोह अपने मानव होने का प्रमाण देते हुए अपने 'परिवार' में सम्पूर्ण पृथ्वी को शामिल कर लेता है. ये नोह पर निर्भर था कि उसका परिवार कितना बड़ा होगा और वह 'चुनाव' के क्षणों में मानवता का श्रेष्ठ उदाहरण बनकर उभरता है. 28 मार्च को प्रदर्शित होने जा रही इस फ़िल्म में नोह का यही नया  मानवीय रूप दर्शक देख सकेंगे।

Saturday, December 21, 2013

फिल्म समीक्षा: इस बार नहीं मची धूम


धूम-3 में लूट का पहला सीन : साहिर(आमिर खान) बैंक में पड़ी टेबल पर आराम से सुस्ताने के बाद सिर पर हैट लगाता है और कुछ संवाद बोलता है। कट,  दूसरा सीन, बैंक की इमारत की छत से साहिर दौड़ता हुए नीचे आ रहा है और ऊपर से नोट हवा में उड़ते हुए जमीन पर गिर रहे हैं। कट, आमिर अब बाइक पर सवार है और पता नहीं कहां से कई अंग्रेज पुलिसवाले साइरन बजाते हुए आ पहुंचे हैं, उन्हें शायद एसएमएस कर के बुलाया गया है। मैं सिर धुनते हुए इन्हीं सवालों के जवाब पाने की कोशिश करता रहा कि शातिर चोर साहिर बैंक के भीतर कैसे दाखिल हुआ, उसने बैंक की तिजोरियों पर कैसे हाथ साफ किया और सबसे बड़ा सवाल कि जब साहिर ने नोट हवा में उड़ा दिए थे तो आखिरकार वह घर क्या लेकर गया। ऐसे ही अधूरेपन के साथ शुरू हुई धूम-3 आखिर तक अधूरी ही रहती है। धूम सीरिज की दो रोमांच से भरी  बेहतरीन फिल्मों के बाद हम एक ऐसी फिल्म देखते हैं, जिसे हिट बनाने के लिए न केवल कहानी का बंटाढार किया गया, बल्कि बॉक्स आफिस की शर्तिया सफलता के लिए आमिर के ग्लैमर और बेइंतहा सिर दुखाने वाले एक्शन और स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया गया है। आखिर ऐसी क्या बात है कि इतने तामझाम के बाद भी दर्शक की जेब तो लुट गई लेकिन ये तीसरी किस्त दिल नहीं लूट पा रही। मल्टीप्लैक्स और ठाठिया सिंगल स्क्रीन पर इस फिल्म को देखने के दौरान दर्शकों की मिली प्रतिक्रियाओं को हजम करते हुए मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि निर्माता अपनी सौ-डेढ़ सौ करोड़ की कॉलर तो खड़ी कर लेगा लेकिन उसके मुख्य ब्रांड धूम की साख को गहरा झटका लगेगा क्योंकि रितिक और जॉन अब्राहम की मुख्य भूमिका  वाली फिल्में कहानी, स्क्रीनप्ले, और संगीत के लिहाज से इस फिल्म से ज्यादा मनोरंजक थी। चोर बदला लेने के लिए चोरी करता है और बदला भी किससे, न बोल सकने वाले बैंकों से। बैंक की दीवारे खलनायक का प्रभाव  पैदा नहीं कर पाई और न ही बैंक चलाने वाले किरदार में ऐसा दम दिखा कि उसका खौफ कही नजर आए। दरअसल  चोर के प्रतिशोध का कारण बहुत दमदार नहीं था। जब अभिषेक  बच्चन रिक्शा ? से दीवार तोड़कर एंट्री ले और एक घूंसे में विलेन को हवा में उड़ा दे तो धूम की सिग्नेचर थीम कचरा-कचरा होती नजर आती है। धूम के अब तक के विलेन बड़े प्यारे रहे हैं, उनका काम केवल चोरी करना था और वे खुद को कलाकार समझते थे। इस बार यह चोर डार्क शेड्स के साथ प्रस्तुत होता है और मन को नहीं भाता । संगीत पक्ष के बारे में केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि इसका एक भी गाना थिएटर से बाहर आते हुए गुनगुनाने का मन नहीं करता। बाकी कलाकारों की बात करने का कोई मतलब ही नहीं है और मेरा मानना है कि अपने किरदार को ठीक तरह से समझने में मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान चूक गए हैं। उन्होंने अपने किरदार को जरूरत से ज्यादा गम्भीरता  से  निभाया  है। ये किरदार करने से पहले उन्हें ऋतिक (धूम-2) के अंडरप्ले पर गौर करना चाहिए था। ऋतिक किस तरह इस जटिल किरदार को सहजता से  निभा ले गए थे। हालांकि दर्शकों की प्रतिक्रियाएं बाहर नहीं आ सकेंगी क्योंकि पैड रिव्यू और फर्जी चैनलों की मीठी प्रशंसाएं हकीकत को कालीन के नीचे ढंक देगी। अंत में निर्देशक विजय कृष्णा आचार्य की  अदभुत कल्पनाशीलता की बात। आमिर के पास ऐसी बाइक है, जो पल भर  में बोट में बदल जाती है, पानी में घुसकर सबमरीन बन जाती है और जरूरत पड़ने पर लोहे के तार पर ऐसे चलती है, जैसे शाम की सैर पर जा रही हो। शुक्र है इस बाइकबोटमरीन को उन्होंने हैलीकॉप्टर में नहीं बदला।

Tuesday, November 5, 2013

फ़िल्म समीक्षा: कृष की 'क्रेश लैंडिंग'


कहानी ' कोई मिल गया ' से शुरू हुई थी। स्टीवन स्पीलबर्ग की क्लासिक एलियन मूवी 'ईटी' का ये भारतीयकरण दर्शकों को पसंद आया तो उसके अगले भाग में कृष्णा याने कृष का जन्म हुआ। एक हॉलीवुड फ़िल्म से लिया गया सुपरहीरो का आयडिया लगातार दो फिल्मो में दर्शक को लुभाता रहा और राकेश रोशन का बैंक बैलेंस भी बढ़ाता रहा। इस दिवाली से पहले कृष तीसरी बार भरपूर आतिशबाज़ी के साथ लौटा है लेकिन रोमांच और उत्तेज़ना सिरे से नदारद है। त्यौहार की शुरूआती भीड़ छंट चुकी है और बेहद महंगी टिकट दरों के चलते कृष के लिए सौ करोड़ी क्लब का दरवाजा भी खुल चुका है। रोशन का मकसद तो पूरा हुआ लेकिन देखना होगा कि क्या वाकई फ़िल्म दर्शक को निर्मल आनद दे पाई है।

 कृष एक साइंस फिक्शन है और जाहिर है कि इस फ़िल्म को पसंद करने वाले मेरे जैसे दर्शक हॉलीवुड फिल्मे भी नियमित रूप से देखते होंगे, ये जानते हुए भी एक ऐसी फ़िल्म हमें परोसी गई, जिसमे सब कुछ यहाँ वहाँ से उठाया गया है। इसके अलावा फ़िल्म में कई ऐसी खामियां नज़र आई जो मेरे जैसे माइक्रोस्कॉपी दर्शक पचा नहीं सकते हैं। हमें उम्मीद थी कि राकेश रोशन ने कृष-2 के बाद के गुजरे छह साल तीसरे भाग को रोचक और धमाकेदार बनाने में गुजारे होंगे लेकिन फ़िल्म देखने पर ये समझ में आया कि उन्होंने बेवजह स्टंट को ज्यादा प्राथमिकता दी है, बजाय दिमागी घोड़े दौड़ने के। फ़िल्म का ओपनिंग सीक्वेंस देखकर मुझे सुपरमैन रिटर्न्स के एक सीन की याद आई, जिसमे सुपरमैन कुछ इसी तरह हवाई जहाज में सवार लोगों की जान बचाता है।

कृष की काया (कंगना रनौत )  मुझे एक्समैन सीरीज की मिस्टिक की याद दिलाती है। मिस्टिक भी किसी का रूप धर सकती है ठीक काया की तरह।' काल' मुझे हूबहू एक्समैन के मैग्नेटो की तरह लगता है। मैग्नेटो लोहे को बस में कर सकता है और उसकी मानसिक क्षमता अभूतपूर्व है। क्रिश में अपनी अजूबा ताकते पहचानने के बाद कृष्णा पारिवारिक जिंदगी जी रहा है। वह कम पढ़ा लिखा है इसलिए कभी किसी पिज्जा पार्लर में, तो कभी सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता है। लेकिन हमेशा हीरोगिरी दिखाने के चक्कर में उसकी नौकरी चली जाती है। ये सीक्वेंस हम स्पाइडरमैन सीरीज की एक फ़िल्म में देख चुके हैं। 

राकेश रोशन ने फ़िल्म में बहुत बुनियादी गलतियां की हैं। रोहित ने एक ऐसा आविष्कार किया है जिसकी मदद से किसी में भी जान डाली जा सकती है, वो अविष्कार मृत कृष्णा में जान डाल देता है, लेकिन रोहित ये नहीं बताता कि वो धुप में से ऐसा कौनसा तत्व निकाल रहा है, जो जीवनदायी है। बाद में यही 'जीवनदायी' आविष्कार खलनायक 'काल' की जान ले लेता है। इस चमत्कार का कारण भी राकेश रोशन नहीं समझा पाते। कहने का मतलब यही है कि साइंस फिक्शन में 'डिटेलिंग' बहुत जरुरी होती है। आपको आपके हर चमत्कार का कारण समझाना होता है।

राकेश रोशन के 'मानवर' बड़े मजाकिया से लगते हैं। अपनी लम्बी जुबान से आइसक्रीम चुराकर खा लेते हैं और शहर में वाइरस फ़ैलाने का काम करते हैं। फार्मा कम्पनियों को देखना चाहिए कि बीमारियो के वाइरस ऐसे भी फैलाये जा सकते हैं। हद तो उस वक्त होती है जब 'काल' से निपटने के लिए पुलिस का भारी अमला ( चार पुलिस वाले और दो वैन ) पहुँचता है। और इसके बाद यकीन आने लगता है कि राकेश रोशन सिर्फ 'स्पेशल इफेक्ट्स' के दम पर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाना चाह रहे हैं। 

 'इंडिपेंडेंस डे' फ़िल्म  में वैज्ञानिक डेविड लेविन्सन अमेरिकी राष्ट्रपति को सिलसिलेवार ढंग से समझाता है कि हम कैसे एलियंस के स्पेस शिप तक पहुंचकर उन्हें तबाह कर सकते है। ये सीन दर्शको को क्लाइमेक्स में 'जस्टिफाई' करता है कि आखिरकार वे कैसे अंतरिक्ष में जाकर अपने दुश्मन को तबाह कर आये। इन्ही छोटी छोटी बातों के अभाव में कृष एक बेढब फ़िल्म साबित होती है।

 मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि हास्यापद ढंग से रोहित मेहरा का 'बोन मेरो' निकाल लिए जाने के बाद भी वो कैसे चलता फिरता रहता है। मैंने ये फ़िल्म 250 रूपये खर्च करके देखी और सोचने लगा कि इससे बेहतर साइंस फिक्शन ' ग्रेविटी' मैं इतने पैसों में दो बार देख सकता था और वो भी थ्रीडी में। यदि आप भी मेरे जैसे साइंस फिक्शन के शौकीन हैं और क्रिष देखकर अपनी दीवाली बिगाड़ चुके हैं तो मात्र 150 रूपये में एक बार ' ग्रैविटी' देख आइये। सच कह रहा हूँ इस फ़िल्म को देखकर दीवाली शर्तिया मन सकती है। 



Thursday, October 31, 2013

फ़िल्म समीक्षा ग्रेविटी : ये गुरुत्व नहीं उसका प्यार है

अब तक अंतरिक्ष के रहस्य रोमांच पर जितनी भी फिल्मे बनी हैं, ग्रेविटी उनमे सबसे न केवल बेहतर है बल्कि इस श्रेणी की सभी फिल्मों में मील का पत्थर बनेगी, इसमें कोई शुबहा नहीं है। अजीब बात है कि जिस फ़िल्म का नाम ' ग्रेविटी' है, उसके कुल जमा दो किरदार फ़िल्म के अंत तक भारहीनता में विचरते रहते हैं।  तीन अंतरिक्षयात्री हब्बल स्पेस टेलिस्कोप की मरम्मत करने के लिए स्पेसवॉक कर रहे हैं, तभी एक चेतावनी मिलती है कि गलती से एक रुसी मिसाइल पृथ्वी के ऑर्बिट की ओर चला दी गई है। इस कारण ढेर साल स्पेस मलबा उनकी ओर खतनाक ढंग से बढ़ा चला आ रहा है। जब तक डॉ रयान स्टोन, आस्ट्रोनॉट मेट कोवास्की और स्पेस वॉक का मज़ा लूट रहा उनका एक साथी संभले, मलबे का एक ढेर उनसे आकर टकराता है। कुछ देर बाद रयान को मालूम होता है कि  हब्बल तबाह हो चुकी है और अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचना लगभग असम्भव है।

 आक्सीजन लेवल निम्नतम  स्तर पर है और ऊपर से शांत, एकाकी अंतरिक्ष डरावने सन्नाटे के साथ उन्हें निगलने पर आमादा है. निर्देशक अल्फोंसो कुएरान ने अपनी कथा के नायकों के लिए असम्भव परिस्तिथियाँ गढ़ी हैं। सभी जानते हैं कि पृथ्वी से 600 किमी ऊपर ओज़ोन परत के पास यदि कोई दुर्घटना घट जाये तो बचे संसाधनों को जुटाकर खुद को ईश्वर भरोसे छोड़ देने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता। हमारे घर का टीवी ठीक चले या हमें मौसम की जानकारी ठीक-ठाक मिले, इन छोटी-छोटी बातों के लिए आस्ट्रोनॉट हर पल जान जोखिम में डालते हैं।

 ये फ़िल्म उन साहसी अंतरिक्ष यात्रियों को मुस्तैदी से ठोंका गया सलाम है। तमाम अंतरिक्ष अभियानों का मकसद केवल हमारी पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों की देखभाल से कही ऊँचा है। आज विज्ञान की इतनी उन्नति के बाद भी कोई अंतरिक्ष अभियान जान न जाने की गारंटी नहीं दे सकता। ग्रेविटी के डेढ़ घंटे का सफ़र अत्यंत रोमांचक और सांस रुक जाने जैसा अहसास है। विज्ञान के ऐसे साहसिक अभियानो में रूचि रखने वाले दर्शको को ये अनुभव थ्रीडी में लेना चाहिए।


आमतौर पर आम साइंस फिक्शन में कोई एलियन सामने आ जाता है या फिर कोई उल्का पिंड तेज़ी से पृथ्वी की ओर बढ़ रहा होता है लेकिन ग्रेविटी में कुल जमा दो किरदार है जिन्हे जॉर्ज क्लूनी और सेंड्रा बुलाक ने निभाया है।  दोनों के सामने खलनायक  वो परिस्थितियां हैं, जिनसे पार पाना लगभग असम्भव ही है। सम्भव है कल्पना चावला और उन तमाम अंतरिक्ष यात्रियो ने भी ऐसे ही खतरे का सामना किया हो और एक स्तर पर पहुंचकर खुद को बेबस पाया हो।

एक सीन है जिसमे सेंड्रा बुलाक को सेटेलाइट के केप्सूल में बैठ कर 100 किमी की दुरी तय करनी है लेकिन पॉवर ऑन नहीं हो रहा। इस सीन में बुलाक बुरी तरह झल्ला रही है लेकिन केमरा जैसे ही अंतरिक्ष पर फोकस होता है, एक ख़ामोशी छा जाती है। इस सीन का करने से पहले बुलाक को वाकई अकेले 18 घंटे बिताने पड़ते थे ताकि शूटिंग में अकेलेपन का तनाव उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आये। बुलाक ने वाकई इस भूमिका के लिए बहुत समर्पण दिखाया है।


जॉर्ज क्लूनी ने एक ऐसे आस्ट्रोनॉट की भूमिका निभाई है जो घबराई स्टोन का मार्गदर्शक बन जाता है। बेहद ही मार्मिक दृश्य है कि मेट धीमे-धीमे स्टोन से दूर होता जा रहा है और उसकी ऑक्सीजन ख़त्म होती जा रही है। ऑक्सीजन के आखिरी कतरो में भी वह स्टोन को बताता जाता है कि  अब उसे आगे का सफ़र कैसे तय करना है। थ्रीडी की तकनीक  कैसे कलाकार की संवेदनाओ को आप तक पहुंचा देती है इसका खुबसूरत उदाहरण एक सीन में देखने को मिलता है। स्टोन केप्सूल में बैठी रो रही है, उसके नमकीन आंसू  चारो ओर बिखर रहे हैं और उनमे से एक आंसू बहता हुआ हमारी आँखों के बहुत करीब आ जाता है। हर आस्ट्रोनॉट जानता है कि ऑर्बिट में प्रवेश उसके पुरे सफ़र का सबसे महत्वपूर्ण और खतरनाक हिस्सा होता है। स्टोन की धरती पर वापसी को निर्देशक ने बहुत सच्चाई के साथ फिल्माया है।

और अंत में
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अपनी आखिरी साँसों को समेट कर मेट स्टोन से कहता है '' यदि तुम स्पेस स्टेशन तक पहुंचने में कामयाब हो गई तो पृथ्वी पर वापसी पर तुम गंगा के किनारों से सूरज उगता देखोगी।'' जब स्टोन वापस लौटती है तो गंगा के किनारो से निकलता सूरज एक विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। उस वक्त स्टोन को ग्रेविटी का असल मतलब समझ में आता है।

'' धरती जानती है कि उसकी गोद से निकलने के बाद
गहन अन्धकार और अथक सूनापन छाया है
चहुँ ओर बस ख़ामोशी और अन्धकार का राज
और इसीलिए ......
रोक लेती है वो दूर जाने वालो को
शायद ये गुरुत्व नहीं उसका प्यार है''






Saturday, October 19, 2013

सिग्नेचर ट्यून में शिव का तांडव

 राजेश रोशन ने अपने लम्बे करियर में अधिकांश फिल्मे अपने भाई के साथ ही की हैं। एक बार फिर वे कृष-3 का संगीत लेकर हाज़िर हुए हैं और महसूस हो रहा है कि लम्बे वक्त के बाद संगीत प्रेमी झूम भी सकते हैं और मदहोश भी हो सकते हैं। राजेश ऐसी श्रेणी के संगीतकार हैं, जो फिल्म का मिजाज़ समझने के बाद ही काम शुरू करते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल,  खय्याम,  ए आर रहमान की तरह अपना काम शुरू करने से पहले इस तरह की 'थिंकिंग प्रोसेस ' में चले जाते हैं। कृष की तीसरी किश्त के गीत मैंने कई बार सुने और इस नतीजे पर पहुंचा कि इस दिवाली संगीत के आकाश पर केवल कृष की सुरीली आतिशबाजी की ही धूम रहने वाली है। चूँकि रहमान की राँझना के बाद फिर से यो यो टाइप के बरसाती गीतों का चलन बढ़ने लगा था लेकिन राजेश रोशन के गीतों ने नकली सोने की चमक को फीका कर दिया है।  मिसाल के तौर पर बेशर्म और बॉस के गीत इसके सामने कही दौड़ में नज़र ही नहीं आ रहे हैं।  कृष के  केवल दो गीत ही फ्लोर पर आये और समझ में आ गया कि दो मिनट के नूडल्स और छप्पन भोग बनाने में कितना फर्क है।  कोई मिल गया और कृष का संगीत सुपरहिट रहा था। दोनों के संगीत को देखे तो कहानी बदलने के साथ संगीत का मिजाज़ भी बदल जाता है। तीसरे भाग में भी आपको कृष की झलक जरुर मिलेगी लेकिन गा
नों में बिलकुल नयापन है और इसकी वजह ये भी है कि दो फिल्मों के बाद अब कृष की कहानी ' डार्केस्ट ऑवर ' में प्रवेश कर रही है।  सबसे पहले मैं ' दिल तू ही बता ' का जिक्र करना चाहूँगा। रोमांटिक गीत हमेशा ठहराव वाले होने चाहिए, यदि उनमे बेवजह गति डाल दी जाये तो सारा रोमांस खत्म हो जाता है। इस गीत में बेहतरीन बीट्स होने के साथ अजीब सा ठहराव है, जो अच्छा लगता है। नीरज श्रीधर और मोनाली ठाकुर ने इसे गाते समय अभिनय पक्ष का खासा ध्यान रखा है। समीर अनजान ने आसान  शब्दों का इस्तेमाल करते हुए शायरी की है और नतीजे भी अच्छे रहे हैं। इसमें नीरज की आवाज का 'थ्रो' जबरदस्त इफेक्ट पैदा करता है। जब इसे परदे पर देखते हैं तो सुनने का मज़ा और बढ़ जाता है। 'रघुपति राघव' एक फ़ास्ट ट्रेक है।  अभी ये गीत सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। गाँधीजी के एक भजन को एक पार्टी गीत में उन्होंने बखूबी तब्दील कर दिया है। मूलतः ये गीत विजुअल ज्यादा है क्योकि इसमें ऋतिक का जबरदस्त डांस रखा गया है। 'गॉड अल्लाह और भगवान' मुझे बहुत पसंद आया। शायद ये गाना फिल्म में क्लाइमेक्स में डाला गया है। गाना सुनते हुए लगता है जैसे कोई महानायक निर्णायक लड़ाई पर जाने की तैयारी में है। पिछली फिल्म में जब कृष को अपनी ताकतों का अंदाज़ा हुआ था तो उस पल के लिए राजेश रोशन ने एक ख़ास टुकड़ा तैयार किया था। ये म्यूजिकल पीस इस फिल्म को कृष के  पुराने संस्करणों से जोड़ता है। इस करिश्माई टुकड़े को वे निश्चित रूप से फिल्म के अंत में प्रयोग करेंगे। कुछ संगीत सृजन फिल्मो के नायको से इस कदर जुड़ जाते हैं कि उसे अमुक नायक की सिग्नेचर ट्यून कहा जाने लगता है। उदाहरण के तौर पर सुपरमैन का इंट्रो म्यूजिक हो या फिर मिशन इम्पॉसिबल का थीम म्यूजिक। जो सभी फिल्मो में एक सा रहता है, नायक की पहचान बनकर। मुझे इस सिग्नेचर ट्यून में शिव का तांडव नज़र आता है।
अंत में 
 'गॉड अल्लाह और भगवान' सुनते समय आपको अहसास होगा कि इस समय सारे भारत की मनोदशा यही है कि देश की नाव में छेद कर रहे घोटालो के महादानवो को कोई महानायक आकर सबक सिखा दे। और हम किसी दाढ़ी वाले में वो महानायक देख भी रहे है। कितना अजीब संयोग है कि कृष की वापसी के साथ देश में भी एक नए युग के आरम्भ के संकेत हम देख रहे हैं और क्या ये भी अजब संयोग नहीं कि इस गीत की ये पंक्तिया भी उसी मनोदशा को उजागर करती है। '' वो तुझमे भी है। वो मुझमे भी है, कही ना कही वो हम सब में है, सबमे वो छुपा है उसे पहचान ले, उसका जो इरादा है वो हम ठान ले 



Friday, August 9, 2013

फिल्म समीक्षा : पटरी से उतरी चेन्नई (राहुल) एक्सप्रेस

'' मैं राहुल हूं, नाम तो सुना होगा''। ये संवाद १९९५ में दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे और १९९८ में दिल तो पागल है में हम सभी ने सुना है। तब से लेकर अब तक ये राहुल नाम का किरदार  शाहरूख खान की परछाई बन गया।  किसी भी फिल्म में वे किसी भी किरदार में हो, परछाई राहुल की ही होती है। अपनी महात्वाकांक्षी होम प्रोडक्शन फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में भी शाहरूख राहुल के किरदार में पेश होते हैं। कहानी कुछ यूं है कि राहुल अपने दादाजी जो जिंदगी की सेंचुरी पूरी नहीं कर पाते, एक मैच देखते हुए सचिन के ९९ रन पर आउट होना उन्हें जिंदगी से आउट कर देता है। दादाजी की अस्थियां लेकर ४० साल का अविवाहित राहुल रामेश्वरम की ओर रूख करता है। किस्मत उसे चेन्नई एक्सप्रेस में पहुंचा देती है और ये सफर उसे अपनी हमसफर से मिलाता है। कहानी सुनकर कई फिल्में जेहन में उमड़ जाती हैं। इस फिल्म को देखते हुए कई बार मुझे भ्रम हुआ कि मैं तमिल में सन ऑफ सरदार देख रहा हूं या जब वी मेट के सफर को चेन्नई में घटते देख रहा हूं। वाकई यदि सन ऑफ सरदार के सारे सरदारों को हटाकर उनकी जगह मुस्टंडे तिलकधारी दक्षिण भारतीय पहलवानों को रख दिया जाए तो भी कहानी में कुछ ज्यादा फर्क नहीं आएगा। निर्देशक रोहित शेट्टी कहानी की शुरुआत तो बहुत माहिर खिलाड़ी की तरह करते हैं लेकिन बीस मिनट बाद ही हमें गोलमाल, बोल बच्चन और सिंघम की उबकाइयां आने लगती है। वैसे भी बहुत ज्यादा फिल्में करके और एक जैसे गाड़ी उड़ाऊ फार्मुले दिखाकर वे खतरे की सीमा को पहले ही पार कर चुके हैं। चेन्नई एक्सप्रेस उनके और शाहरूख खान के लिए एक अवसर था, जिसका सही लाभ उठाकर वे खुद को कुछ और समय के लिए स्थापित कर सकते थे। शाहरूख खान हर सीन में एक से नजर आते हैं और छोटे से छोटे सीन, जिनके लिए केवल आंखों की पुतलियां घुमाने से ही काम हो जाता, वहां भी उन्होंने बेवजह उर्जा उड़ेली है। इसका नतीजा ये होता है कि वे अधिकांश दृश्यों में ओवर एक्टिंग का शिकार हुए हैं। वे राहुल के किरदार में इतने टाइप्ड हो चुके हैं कि नए किरदार के लिए प्रयोग ही नहीं करना चाहते। थिएटर में फिल्म चलती रहती है और एक अजीब सी खामोशी के साथ बिना प्रतिक्रिया के दर्शक फिल्म देखता चला जाता है। इसका मतलब साफ है कि दर्शक आपकी फिल्म के साथ जुड़ ही नहीं पाया है। जब तक है जान के बाद शाहरूख दूसरी बार अपने प्रशंसकों को निराश करते हैं। जन्नत में रहने वाले इस बादशाह के तरकश में क्या इतने ही तीर बचे थे। चक दे इंडिया की सफलता के बाद ही ये संकेत मिल गए थे कि उन्हें अब इसी तरह की चरित्र भूमिकाओं में प्रस्तुत होना चाहिए लेकिन उन्होंने अपना राहुल चोगा फिर भी नहीं छोड़ा, नतीजा चेन्नई एक्सप्रेस की रफ़्तार  से हम रोमांचित नहीं होते। अपने से चार गुना बड़े पहलवान को लहुलुहान राहुल जब उछल-उछल कर मारता है, तो कोई तालियां नहीं बजती, क्या शाहरूख को मालूम नहीं कि बाजीगर का जमाना अब बीत चुका है। राहुल और रोहित शेट्टी की गलतियों के बावजूद हिचकोले लेती ये चेन्नई एक्सप्रेस यदि थोड़ा बहुत मनोरंजन भी करती है तो उसका श्रेय दीपिका पादुकोण को मिलना चाहिए। एक दक्षिण भारतीय लडक़ी की भूमिका को वे इतनी विश्वसनीयता के साथ जीती हैं कि सामने खड़े सुपरस्टार भी मात खाते हैं। इसे ही तो अदाकारी कहते हैं। पिछली बार निभाए किरदार के प्रभाव से मुक्त होकर नए किरदार में जान डाल देना। रोहित शेट्टी और शाहरूख को ये भ्रम है कि अपनी फिल्म में जरूरत से ज्यादा इडली और सांभर डालने से फिल्म दक्षिण भारतीय सर्किट में चल जाएगी। शायद शाहरूख को ये नहीं मालूम कि अब दक्षिण भारतीय सिनेमा लुंगी डांस से बहुत आगे बढ़ चुका है और उनका दर्शक वर्ग भी पहले से प्रबुद्ध हुआ है। आप सिर्फ लुंगी डांस करके और रजनीकांत की फोटो दिखाकर उस दर्शक की निष्ठा नहीं लूट सकते। फिलहाल यही कहना होगा कि स्टेशन से रफ्तार में निकली चेन्नई एक्सप्रेस कुछ दूर जाकर पटरी से उतर जाती है। भारी भरकम बजट वाली इस  फिल्म का  सुपरहिट होना तो बहुत मुश्किल दिखाई दे रहा है, शायद शाहरुख़ की पिछली फ्लॉप फिल्म रॉ वन का भूत फिर जिन्दा हो गया है, जिसने चलती  चेन्नई एक्सप्रेस की  जंजीर खींच दी, अफसोस।